आप शब्द हैं अभिव्यक्ति हैं आसक्ति हैं
स्वीकारिए या नकारिये आपकीं मर्जी
दिल भावनाओं का चितेरा है एक आम सा
बुनता है कल्पनाएं सिलता जैसे दर्जी
उम्र की उलझनें मष्तिष्क की कतरनें है बोलती
जीवन है भिन्न-भिन्न अनेक प्रकार की खुदगर्जी
जियो तो ऊष्मा सकारात्मकता है चहुँओर फैला
अन्यथा उलझनें, चुनौतियां अनुभूति की सर्दी
तर्क क्या है समाज रचित एक परिकल्पना
मर्म क्या है निजता जड़ित एक युग्म अर्जी
व्यक्ति भावुकता को छोड़ दुनिया की सोचता
व्यक्ति है कहाँ सम्पूर्ण टुकड़ों में भाव दर्जी
सुगंध का एक चितेरा पर कहीं दूर बसेरा
जीवन का यही क्रम कहां टूटी कहीं लरजी
क्या खूब दबाया है संस्कार में जीवन भी
जब अवसर मिला चाहतें क्या खूब हैं गरजी।
धीरेन्द्र सिंह
31.08.2026
16.42
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