कामना की याचना है और सृष्टि है
सब पढ़ लिए है क्या ऐसी दृष्टि है
आप अपनी उलझनों के हैं पहरेदार
दूसरा अपनी समस्याओं का तारणहार
भावनाओं की सतत विभिन्न वृष्टि है
सब पढ़ लिए है क्या ऐसी दृष्टि है
मोहक, सम्मोहक संवेदक विभेदक
चेतना के चपल चाह विज्ञ सचेतक
अभिलाषाएं पलक पर चंद्र समिष्ट है
सब पढ़ लिए है क्या ऐसी दृष्टि है
पढ़ना सब वस्तुतः असम्भव ही है
क्या सोचना बुरा यदि पराभव भी है
कर्मों का यह एक स्पष्ट प्रविष्टि है
सब पढ़ लिए हैं क्या ऐसी दृष्टि है।
धीरेन्द्र सिंह
25.08.2026
23.35
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