सईयां सात जनम नही धाए संग एहि जनम भाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीं जी पाए
सकल समाज हेरि लिए शक्ल नहीं दिखा पाए
हिया जिया संग पिया-पिया बोले क्यों ऐसा तरसाए
एक दरस की अरज है मेरी जन्मों में क्यों बहलाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीं जी पाए
चाहत की नई आहट थी नयन भरी जगमगाहट थी
रचि सुगन्ध परिवेश शुचि अकुलाहट मोह बुलाए
आप गरज को मरज ही समझे कितनी देर लगाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीं जी पाए
पल-पल कल-कल बहता हरदम मिलती नहीं फुहार
छल-छल ढल-ढल रहता संगम लौ भी लपक ना पाए
आज ही जीवन की दुनिया कल पर क्यों आंख लगाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीँ जी पाए।
धीरेन्द्र सिंह
23.08.2026
10.23
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