स्मृति में उभरे आपके भाव टटोलता रहूं
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं
यह कैसे आज आप अचानक उभर गईं
विस्तृत सुजान नभ में विद्युत सी निखर गई
आह्लाद के संवाद के भाव समेटता रहूं
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं
संकल्प कभी आप थे ना था कहीं विकल्प
ना जाने कैसे होते गया परिवेश सघन तल्ख
कोशिश यही थी जीवन में एक विशेषता रहूं
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं
नयनों के चमक में है स्वागत आपका आगमन
अधरों पर बसी मुस्कराहट करे आपका नमन
चेहरे पर आप ही बसी हैं इसे मैं योग्यता कहूँ
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं।
धीरेन्द्र सिंह
16.19

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