मन के पालने में अभिलाषाओं का बिछावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है
चल पड़े हैं लोग निर्धारित श्रेष्ठता की चाह में
निज श्रेष्ठता अचर्चित अचंभित पड़े राह में
मन पालना का झूलना लगे प्रतिपल पावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है
झूलना नियति है या झूले की स्वाभाविक गति है
भविष्य की चिंताएं हैं यही आज की नियति है
वर्तमान भ्रमित करता न्यायोचित तथ्य जलावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है
एक ही समाज की एकमत नहीं लगती बोलियां
एक सिद्ध मार्ग लगे दर्द निवारण के लिए गोलियां
प्रगति है प्रताप है जीवन कई अज्ञात बुझावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है।
धीरेन्द्र सिंह
17.07.2026
19.00
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