बुधवार, 11 सितंबर 2019

अतुकांत

अधूरी रचनाओं की पंगत में
कहीं खोई सी
एक तरफ लुढ़की
हताश सा विश्वास
भावों को गढ़ रही हो,
अनगढ़ क्या होता है
यदि घट पर हो लहरें
असंभव क्या होता है
यदि लहरों पर हो तिनके
तुम लहर ही तो हो
मेरी सोच का, रचनाओं का
पर न जाने क्यों लुढ़की हो,

लेखन की तुकांत विधा मेरी
कर दोगी विदा ओ चित मेरी
पर हां मानूंगा कहना तुम्हारा
एक चुनौती की तरह
जब तुम कहोगी
कविता वही होती हो
जिसमें रसधार हो
तुकांत हो या अतुकांत
अलहदा खुमार हो,

मेरे लिख देने की क्षमता
संशय के घेरे में
न जाने क्यों
तुम्हारी जुल्फों से
पहचाने शैम्पू की खुश्बू न आए
न लटें बौराएं
न ही वह खिलखिलाहट दिखे
अतुकांत लिखने का संकेत
बोल ही देती हो आजकल,

जब से तुम मिली
कविता कहां लिखा
लिखता भी कैसे
जिए जा रहा था कविता
बस शाब्दिक छींटे द्वारा
संभालने का प्रयास था शब्द सामर्थ्य
कविता जी लेना भी कौशल
यह न तो काव्य विधा
न समीक्षक का विचार बिंदु
फिर भी
लिख ही दिया अतुकांत
क्योंकि न जाने कब से
तुम लुढ़की हो
अधूरी रचनाओं की पंगत में।

धीरेन्द्र सिंह

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