गुरुवार, 18 जून 2026

क्या कमी है

नयनों में नमी है कहिए क्या कमी है
कुछ दर्द है उलझा या खिसकी जमीं है 




यह सोच रोज पसरती है लेकर जिंदगी
कोई न कोई उलझता इसमें पा हुड़दंगगी
सभी गुजरते हैं इससे खुशियां तो गमी है
कुछ दर्द है उलझा या खिसकी जमीं है

नयनों को यदि कहें आत्मचेतना से निरखो
सपनों को यदि कहें विवेचना में न उलझो
आत्मबल यदि हो जागृत तो हौवा, आदमी है
कुछ दर्द है उलझा या खिसकी जमीं है

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