शुक्रवार, 19 जून 2026

जग रीत

जो बहता है वह सहता है यही जग रीत

कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत


बहता है जो मन साफ है मान प्रतिष्ठा साख है

संयमित प्रवाह से संचालित अप्रयोज्य साफ है
अपनी लय में चलता, बढ़ता है अघोषित उम्मीद
कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत

उत्सव से वह अप्राभावित जीत में रहे निष्काम
कर्म ही उसकी पूजा सभी लक्ष्य हों जैसे धाम
अवसरवादी घर के कहते उनके प्रयास की प्रीत
कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत

अनबोले अनचीन्हे रहते कर्म राह के दीवाने
अपनों को सुख सुविधा देते यह अथक परवाने
हर घर में एक ऐसे व्यक्तित्व हरदम हों प्रतीत
कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत।

धीरेन्द्र सिंह
20.06.2026
04.02




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