रविवार, 21 जून 2026

बदरिया

बदरिया भरकर बरसने को आ रही
मन भींगने के लिए तैयार हो रहा है 
एक प्यास धरा का व्यक्ति का भी, कहे
गर्जना, पूरब दूर से पुकार हो रहा है






कुछ भी न होता अचानक, भूमिका बने
खुद को न हो पता यह क्या हो रहा है
व्योम में बदलियों भरी हुई असंख्य हैं
क्या बात बूंद एक बदली का भिंगो रहा है

कहां से चली कहां छाई कहां पर बरसी
दूजी बदरी टकराई विद्युत बरस रहा है
आकर्षण कहें या चाहत या जन्मों का खेल
सब कुछ तो पास है पर मन तरस रहा है

घर के शॉवर से भींगना भी जैसे बरसात
फिर क्यों मन उन्मुक्त बदरी निरख रहा है
बंधनहीन उन्मुक्त छाँवमुक्त जीना चाहे
आदिकाल से ही जीवन मौसम परख रहा है।

धीरेन्द्र सिंह
22.06.2026
07.25

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