संकुचित मर्यादाएं
दबंग संस्कार
व्यथित मनोकामनाएं
भूसकल त्यौहार
हर किसी का बाड़ा
लुकछुप व्यवहार
किसका किसपर उधार
कहां कब अख्तियार
सब जिएं ऐसे ही
जीवन लौ को दे बयार
सत्य उभरता ही कहाँ
सत्यवादी यह संसार
अकुलाहट विश्राम चाहे
सुखकर गोद की दरकार
चल बैरागी ठौर वही
जहां चिंगारियों का चटकार।
धीरेन्द्र सिंह
31.08.2025
06.31
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें