शनिवार, 30 अगस्त 2025

चल बैरागी

 संकुचित मर्यादाएं

दबंग संस्कार

व्यथित मनोकामनाएं

भूसकल त्यौहार


हर किसी का बाड़ा

लुकछुप व्यवहार

किसका किसपर उधार

कहां कब अख्तियार


सब जिएं ऐसे ही

जीवन लौ को दे बयार

सत्य उभरता ही कहाँ

सत्यवादी यह संसार


अकुलाहट विश्राम चाहे

सुखकर गोद की दरकार

चल बैरागी ठौर वही

जहां चिंगारियों का चटकार।


धीरेन्द्र सिंह

31.08.2025

06.31

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