रोज ऐसे अगर आएंगे
हम बेपनाह संवर जाएंगे
मुझे दिखती है जिंदगी
बंदगी में उमर बिताएंगे
आने का है कई तरीका
सलीका भी बुदबुदाएँगे
अदाओं की देख आदत
उम्मीदगी का असर पाएंगे
आती है भोर किरणें
उसमें ही नजर आएंगे
किरणों पर जीवन आश्रित
आनंदिगी से भर जाएंगे
सुबह राह तकती आंखें
वह आकर गुनगुनाएंगे
रच जाती नित कविता
पढ़ इसको मुस्कराएंगे।
धीरेन्द्र सिंह
31.08.2025
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