शनिवार, 6 जून 2026

धुन

आज में डूबकर उम्र जीते रहें

अपनी धुन में ही रहा कीजिए
मुग्ध होकर कई सुन रहें आपको
जैसे कहते हैं अक्सर कहा कीजिए




क्यों चुपचाप हैं बोलते पदचाप हैं
सुननेवाले कहें भाव बहा दीजिए
मिलते पागल भी हैं जिंदगी में बहुत
शब्द की चांदनी को गढ़ा कीजिए

जिससे टूटे हैं वह रह गए हैं कहीं
जख्म सूखे पल्लवन हरा कीजिए
हो रही है घुटन लंबी खामोशी से
नज़्म टूटे हुए हैं दवा दीजिए

आपकी खातिर लिख रहा है हृदय
स्वर में अपने इसे गुनगुना लीजिए
शब्द की बानगी को धुन तो दीजिए
फिर आपकी मर्जी जितनी सजा दीजिए।

धीरेन्द्र सिंह
07.06.2026
08.25


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