शुक्रवार, 1 मई 2026
खामोश आंधियां
नयन की नयन से सुगंधित शरारत
शिष्ट, शालीन, व्यक्तित्व करता है मोहित
हृदय के पंख पर बिठाकर आपको उडें
कुशलता से छिपा लेती अपने सारे बवंडर
धीरेन्द्र सिंह
गुरुवार, 30 अप्रैल 2026
मजदूर दिवस
मजदूर दिवस है ना होइए मगरूर
भारत है निर्माता विभिन्न्न से मजदूर
पसीना बहानेवाले ही लगते हैं श्रमिक
पढ़े-लिखे भी मजदूर कर मौलिकता शमित
भारत श्रमिकों का निर्यातक है मशहूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर
आई टी का बोलबाला सब पढ़ते प्रौद्योगिकी
पूर्ण कर यह शिक्षा सेवा प्रदाता की लायिकी
कम्प्यूटर की गैर भाषा न अपना सर्च इंजन नूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर
हम विश्व के श्रेष्ठ एक शिक्षित मजदूर
मजदूर दिवस आज भी रहा हमें घूर
बहुसंख्य विदेशों में हैं जाने को प्रणपूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर।
धीरेन्द्र सिंह
01.05.2026
08.02
बुधवार, 29 अप्रैल 2026
जीवन
उम्र तन्मय हो गया है आस का उन्माद
जीवन झंझावात में कहां मधुर संवाद
आर्थिक आजादी ही सर्वप्रमुख अभियान
स्वार्थ सिद्ध के खातिर करते हैं गुणगान
जीवन ऊर्जा सूख रही मिले न पानी खाद
जीवन झंझावात में कहां मधुर संवाद
देह तलक ही नेह है नखशिख सौंदर्य
भौतिकता में उलझे ना आत्मिक सौकर्य
नेह डगरिया नहीं गगरिया मन पनघट नाद
जीवन झंझावात में कहां मधुर संवाद
उम्र गुजरती राह बदलती और बदले चाल
आज सुन रहे कल बदलती उम्र अपनी ताल
पकड़-धकड़ कर उम्र को रोकें यौवन विवाद
जीवन झंझावात है कहाँ मधुर संवाद।
धीरेन्द्र सिंह
30.04.2026
08.27
मंगलवार, 28 अप्रैल 2026
आप
आप इस दिल की जिंदगानी हैं
प्यार की हम भी एक कहानी हैं
आपकी हलचलें खामोश हो रहीं
ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं
गहन गहराई में भाव तुरपाई करें
अदृश्य देह आत्मा की रवानी है
आप हर बार हवा सा छू रहे हैं
ऐसा लगता हम उबलते पानी है
कहां से राह चली और शाम ढली
जिंदगी हतप्रभ सी अनजानी है
आज भी आस प्यास साँसों में
ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं
आपकी ऊष्मा आपकी ऊर्जा है
एक गति मति में संगती ठानी है
प्यार के गुबार में आपका बुखार
ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं।
धीरेन्द्र सिंह
29.04.2026
05.56
सोमवार, 27 अप्रैल 2026
गर्मी
मौसम आक्रामक नहीं कहीं है नर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी
घर से बाहर सूर्य प्रखरता से मिलता है
पसीने में मजदूर निडरता से चलता है
धरा की उष्णता गुम्बद में फंसी चर्खी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी
आग बरस रही श्रमिक को लगे है फाग
तरबतर पसीने से भींगा सजाता है आज
हमेशा मौसम न रहा जिजीविषा धर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी
सतत संघर्ष में निहित मानवता का उत्कर्ष
जूझते जीवन से उन्हें क्या मौसम का विमर्श
मौसम प्रणय करता कभी चुहल बेशर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी।
धीरेन्द्र सिंह
28.04.2026
08.45
रविवार, 26 अप्रैल 2026
प्रबुद्ध
प्रबुद्ध हैं तो सर्वत्र ज्ञान बांटिए
निबद्ध हैं तो यत्र-तंत्र संज्ञान बांटिए
संज्ञान उत्तर प्रदेश गृहित शब्द है
विकासशील राज्य का जनित प्रारब्ध है
धर्म और राजनीति यहां जांचिए
निबद्ध हैं तो यत्र-तत्र संज्ञान बांटिए
थार के गुबार में लिप्त लगता व्यवहार
संशय में उबरता सूर्यरश्मि सा त्यौहार
विस्थापन यहां विवशता कागज पर नापिए
निबद्ध हैं तो यत्र-तत्र संज्ञान बांटिए
इतर राज्य-राष्ट्र में दीप्तिमान हैं रहिवासी
नोएडा, लखनऊ, अयोध्या आदि काशी
संज्ञान विज्ञान है तबियत से तो झांकिए
निबद्ध हैंबतो यत्र-तत्र संज्ञान बांटिए।
धीरेन्द्र सिंह
27.04.2026
09.14
शनिवार, 25 अप्रैल 2026
उलझन
अपने विश्व की उलझन में दगा दे देना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना
कश्तियाँ दोनों की मगन साथ-साथ थीं
हस्तियां अपनी भी सबरंग बेहिसाब थीं
कुतर दिया समाज ने जुड़ाव दे पैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना
अपने विश्व में भी हैं आधे-अधूरे व्यक्तित्व
अपने को देखे या सहेजे तीरे अस्तित्व
टपक रहे हैं भाव पर मुस्कराहट के छैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना
क्षद्म व्यवहार रूप भी तो लगे बहुरूपिया
महल की बात करे जीर्ण हो रही कुटिया
प्यार अवसर है स्नेह सुप्त ताल की मैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना।
धीरेन्द्र सिंह
26.04.2026
10.24
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