शनिवार, 9 मई 2026
मनमर्जियाँ
मनोभाव की होती हैं नित कितनी सरगर्मियां
टुकड़े-टुकड़े, गिरते-पड़ते कुछ भाव कह दिए
कुछ कह दिए कुछ रोक लिए रोज ऐसा होता
व्यक्तिगत जीवन हो या किसी समूह की धरती
धीरेन्द्र सिंह
गुरुवार, 7 मई 2026
समूह पुकार
पोस्ट आपकी महत्वपूर्ण लिए सरोकार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार
आपकी सोच अच्छी भाव में हैं नवीनता
आपका लेखन अभिनव लिए प्रवीणता
कुछ लोग तो करते आपकी रचना सत्कार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार
अन्य पोस्ट भी चाहें आपका भी प्रोत्साहन
एक लाइक या टिप्पणी देती नवीन मनन
जुड़िए न समूह से करते प्रसारित सुविचार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार
क्या समूह दायित्व संवाहक एडमिन, मॉडरेटर
सदस्य भी तो हैं समूह के दीप्तिमान दिवाकर
यह सलाह नही हिंदी समूह का विनीत पुकार
क्या अन्य की पोस्ट नहीं अभिनव प्रकार।
धीरेन्द्र सिंह
07.04.2026
21.07
बुधवार, 6 मई 2026
विवाह
कुछ भावना कुछ सामाजिक चलन प्रवाह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह
जो कहते खुशियों भरी है वैवाहिक जिंदगी
वह डरते यह कहने में झेले हैं जो शर्मिंदगी
आरम्भ गर्मजोशी से फिर अदृश्य सोई दाह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह
सामाजिक बंधनों का है दबाव प्रखर जोड़
दिखावा प्रदर्शन खूब भीतर रोज रिश्ते तोड़
एक-दूजे से उदासीनता निकलती मुई आह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह
जो खींच रहे बलभर वह हैं साथ चलन क्रम
हर मोड़ पर उभरता है शंका लिए नया भ्रम
विवाहेत्तर संबंधों में हैं अभी भी छुईमुई पनाह
बदल रहा है रूप सफल नहीं, रोशनाई विवाह।
धीरेन्द्र सिंह
06.04.2026
14.05
मंगलवार, 5 मई 2026
पोस्ट
दिखती कम मौलिकता नकल का है ताना-बाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना
हर सामान्य पोस्ट में दिखे यौवन की ही लयकारी
यौवन कहां है न दिखता लगे यथार्थ से है पर्देदारी
चापलूसी उथले मजाक से संभव है क्या जीत जाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना
कॉपी-पेस्ट का बढ़ते चलन में पोस्ट का पुनरावर्तन
मौलिक लेखक का नाम मिटा उसपर करते कई नर्तन
जैसा है वैसा नहीं दिखते कैसे लोगों का यह जमाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना
अधिकांश पोस्ट लगती वासना की कुंठा वर्जनाएं
बस सेक्स ही है जीवन जीव सेक्स में हैं भरमाए
प्यार सहज सेक्स उपज हर हृदय का है ताना-बाना
एक ने जो मूल गाया उसको ही गाना-गुनगुनाना।
धीरेन्द्र सिंह
06.05.2026
06.01
शनिवार, 2 मई 2026
वेदनाएं
छूकर कह रही हैं यह आपकी चेतनाएं
हंसिए, खिलखिलाईए घटेंगी न वेदनाएं
शब्दों में सिमटकर मनोभाव चल पड़े
अर्थों में बिखरकर सद्भाव निकल पड़े
क्या हुआ, कैसे हुआ यह समझ न पाएं
हंसिए, खिलखिलाईए घटेगी न वेदनाएं
चौरंगी मन में चतुर्भज है कंपित चेतना
मन आपका न छू लूँ संशय हो तो देखना
संपर्क में होती हैं निर्मित अचानक कामनाएं
हंसिए,खिलखिलाईये घटेगी न वेदनाएं
कब हो सका चलती रहे अपनी मनमर्जियाँ
दूसरी आफत प्रणय की आती रहती अर्जियां
छोड़िए जग की बातें क्या है सोच तो बताएं
हंसिए, खिलखिलाईए घटेगी न वेदनाएं।
धीरेन्द्र सिंह
03.05.2026
06.25
शुक्रवार, 1 मई 2026
धक-धक
धक-धक, धीरे-धीरे, साथ-साथ, कुछ-कुछ
लखि-लखि, तीरे-तीरे, सांस-सांस, सचमुच
आप कई आवरण के प्रकरण परे हैं विद्यमान
थाप जिंदगी के कई आवरण धरे हैं निदान
मति-मति, दौड़े-दौड़े, आस-आस, हँसमुख
लखि-लखि, तीरे-तीरे, सांस-सांस सचमुच
यथार्थ के विचार में आपका ही नित संचार
परमार्थ है स्वीकार जाप का ही मीत प्रकार
रचि-रचि, हौले-हौले, खास-खास, अभिमुख
लखि-लखि, हौले-हौले, सांस-सांस सचमुच
क्रिया की प्रतिक्रिया में सक्रिय है भाव क्रिया
दिया है मन में जला विनयी है चाह प्रिया
सखि-सखि, तौले-मोले, रास-रास गुपचुप
लखि-लखि, हौले-हौले, सांस-सांस सचमुच।
धीरेन्द्र सिंह
02.04.2026
09.49
खामोश आंधियां
नयन की नयन से सुगंधित शरारत
मुस्कराहट में आपको मिली महारत
जुल्फ गर्दन की अठखेलियाँ भी हों
वाचाल उभरती जाए सुगंधित इबारत
शिष्ट, शालीन, व्यक्तित्व करता है मोहित
प्रभाव ऐसा हो लयबद्ध सी थरथराहट
गीत बन जाती है निहारती यह दुनिया
स्वर दें आप उसे उभरे मीठी छटपटाहट
हृदय के पंख पर बिठाकर आपको उडें
गगन कर नमन दर्शाता रंगों की महारत
आपके रंग देख मेघ भी एकटक हो तकें
नशीले रंगों की स्वामिनी फाग सी शरारत
कुशलता से छिपा लेती अपने सारे बवंडर
उड़ता जाता है परिवेश करती जाती आहत
समझने के प्रयास में होते जाते सब बदहवास
आप खामोश आंधियों में उड़ाती हैं चाहत।
धीरेन्द्र सिंह
02.05.2026
05.36
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