गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

कोरा कागज

कोरा कागज ही दिल तो रहता है

जब कोई दिलदार मिल जाता है

नई अनुभूतियों के स्पंदन से उभर

नए कोने से नया फूल खिल जाता है


शुरू होती हैं शालीनभरी सूक्तियाँ कई

शब्द, भाषा में भी चमक-दमक आता है

भाव के अर्थ कई निकालता है नित मन

एक अनजाना भी करीब कैसे आता है


प्यार बस एक बार ही होता है अर्धसत्य

तथ्य जीवन के परिणाम नए लाता है

मन अनुरूप मिल जाती अभिव्यक्तियाँ तो

एक गुलाबी सा आवरण सा छा जाता है


हो सायास कुछ प्रयास नई कोशिश भी

तर्ज तब फ़र्ज़ बन खुदगर्ज हो जाता है

अब इसे भाव समझें या कि असभ्यता

खिलता है मन तो दीवाना सा कह जाता है।


धीरेन्द्र सिंह

20.02.2026

06.45

बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

गलगोटिया

गलगोटिया विश्वविद्यालय का आतिथ्य है

रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है


मौलिकता की हो रही है भूख हड़ताल

नैतिकता की इसमें करे कौन पड़ताल

आवरण आकर्षक लगे क्षद्म व्यक्तित्व है

रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है


भूत-भविष्य नहीं वर्तमान की है बातें

हिंदी वाले समझें आग सा न इसे बांटे

चीन का रोबोट कुत्ता में क्या लालित्य है

रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है


सजता है मंच रहते बैठे कई हिंदी डॉक्टर

उबासी लेती पुस्तकों पर बातें तथ्य हटकर

बजती हैं थकी तालियां ऐसा ही कृतित्व है

रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है।


धीरेन्द्र सिंह

19.02.2026

08.15


मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

तड़के

आप मेरे मन में

होती हैं उदित कई बार

जैसे सागर से उभरे

सूर्य लिए ऊर्जा द्वार


तर्क की कसौटियां लुभावनी

भावना तो बयार पावनी

आप भी पुरवैया बयार

सुगंध की लिए कतार


मन में उभरे लिए छटाएं

भाल तक पहुंच गुनगुनाएं

स्पंदित हो जगे सहस्त्रधार

यही है आपके उभरने की कतार


तड़के खुली पलकें था प्रकाश

मन आलोकित सत्य करता तलाश

आप उभरें मन तत्पर करे करार

कल्पनाओं को करे कौन स्वीकार।


धीरेन्द्र सिंह

18.02.2026

04.46


सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

छोड़ जाता हूँ

अपने लिए जो रचता हूँ

जुड़ खूब उससे सजता हूँ

लचकती डाल सा मोड़ लेता हूँ

फिर वह रचना छोड़ देता हूँ


नित संपर्कियों को पढ़ता हूँ

उत्कर्ष हो ध्येय लेकर रचता हूँ

भटकते भाव लेकर ओढ़ लेता हूँ

फिर वह रचना छोड़ देता हूँ


प्रतिष्ठा को कनिष्ठा सा समझता हूँ

निष्ठा को समझ ऊर्जा दहकता हूँ

अगन के दहन में दिए जोड़ लेता हूँ

फिर वह रचना छोड़ देता हूँ


न छोडूं तो कैसे जी सकता हूँ

अटक जाऊं धीमी आंच पकता हूँ

निरन्तर नित नया रच दौड़ जाता हूँ

फिर वह रचना छोड़ जाता हूँ।


धीरेन्द्र सिंह

17.02.2026

10.31

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

प्रतिकार

अस्वीकार जब तिरस्कार हो

बिन बोले तब धिक्कार हो

मुहँ मोड़ना होता है तभी

जब संचित घड़ा प्रतिकार हो


तत्क्षण का विरोध अस्थाई

रोष संग यह साथ निभाई

अनियंत्रित उठता गुबार हो

जब संचित घड़ा प्रतिकार हो


अपनापन कोई भेद न माने

ऊंच-नीच हो जाय अनजाने

आकर देहरी अस्वीकार हो

जब संचित घड़ा प्रतिकार हो


अर्थ का अनर्थ निकाला जाए

भाव कलुषता डाल भड़काए

जब छूटता लगे अधिकार हो

जब संचित घड़ा प्रतिकार हो।


धीरेन्द्र सिंह

14.02.2026

16.09


मंगलवार, 13 जनवरी 2026

कूद-फांद

कूद-फांद कर निनाद

जाने कौन छुपा मांद


समय बदल रहा क्या

अभय मचल रहा क्या

पिघल रहा अब विषाद

जाने कौन छुपा मांद


शब्द हैं कालिख पुते

भाव घृणा को जपे

असुरा गूंजे है निनाद

जाने कौन छुपा मांद


शब्दभेदी क्या चले बाण

एकलव्य हैं कई निष्णात

तड़पन बने धड़कन संवाद

जाने कौन छुपा मांद।


धीरेन्द्र सिंह

14.01.2026

06.18




सोमवार, 12 जनवरी 2026

परछाईं

जी रहे हैं खुल जीवन जुगत भरी चतुराई में 

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में


अपने दिल की धड़कन की चिंता सबको है

अपने खिल हो जाएं पुलकित निजता वो है

क्या-क्या रहे छुपाते जीवन की तुरपाई में

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में


यादें रंग-बिरंगी फीके प्रभाव में करें आलोड़न

पीड़ाएं दुबकाए कोने हृदय करे प्रायः प्रभु भंजन

जीवन कितना दिया -लिया पारस्परिक बहुराई में

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में


क्या समझे कितना समझे जब चिंतन हो उथले

जिसको जितना समझा जीवन वैसे थापे उपले

जीवन जोड़-घटाना कर भरी अकुलाहट रंगराई में

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में।


धीरेन्द्र सिंह

13.01.2026

14.45