गोवा
एक संस्कृति
एक सभ्यता
मानवता का
अभिव्यक्ति का
स्वतंत्रता का,
सागत के तट
विशिष्ट पहचान
लिए अपना आसमान
विविध विधान
नए मूल्य विज्ञान
चेतना के,
यहां व्यक्तित्व निर्द्वंद्व
स्वयं को अभिव्यक्त करता
नहीं परतंत्र
यौवन चहुंओर पसरा
भावनाओं का गणतंत्र
स्वयं की सेवा
गोवा,
मदिरा, मैथुन, मनोकामना
कल्पना का यथार्थ सामना
परिधान में परिणय
परिणय में विधान
जीव का सत्य से सामना
उर मेवा
गोवा,
सहज सुविज्ञ बन आइए
स्वयं को स्वयं से छाईए
अंतर्चेतना प्रज्वलित हो
अभिव्यक्त अपने गाइए
आत्मसेवा
गोवा।
धीरेन्द्र सिंह
21.03.2026
21.46
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