बुधवार, 15 दिसंबर 2010

रूसवाई

आज शबनम भी उबलने लगी है
रोशनी भी बर्फ सी लगने लगी है
इस सुबह का खो गया आफताब
सांसो में आह सी चलने लगी है

ज़िंदगी रूसवा हुई पग खोल गई
बंदगी घुटनों पर मचलने लगी है
सूना-सूना खोया-खोया मंज़र हुआ
तरन्नुम भी अब बहकने लगी है

आपकी इनायत की है दरख्वास्त
धड़कनें भी अब तड़पने लगी हैं
बमुश्किल ज़िंदगी से हुआ था सामना
अब यह कैसी हवा चलने लगी है.



भावनाओं के पुष्पों से,हर मन है सिज़ता
अभिव्यक्ति की डोर पर,हर धड़कन है निज़ता,
शब्दों की अमराई में,भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई मे,एक तड़पन है निज़ता.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें