शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

उपवन मौन है

डंठलों को पूछता कौन है
उपवन यहां पर भी मौन है



पुष्प का अपार भार है संभाले
कंटकों की धार को भी सँवारे
सुगंध चहुँओर तरंग आध पौन है
उपवन यहां पर भी मौन है







बागबानी में डंठलों को दाना-पानी
पुष्प और कंटक की है जिंदगानी
कैंची कटा पुष्पडंठल सम्मान छौन है
उपवन यहां पर भी मौन है







है न कराहता ना उन्माद दहाड़ता
मौसमी प्रहार को मौन पछाड़ता
डंठल अनदेखे से सपनों का गौन है
उपवन यहां पर भी मौन है।







धीरेन्द्र सिंह
04.07.2026
07.57

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