शनिवार, 1 अगस्त 2026

सावन

शब्द चुपके आ पहुंचा भावनाओं का बन संवाहक

आप संशय में हैं उलझे समस्या यह उत्पन्न नाहक


बदलती है प्रीत रीत कल्पनाओं से परे अकस्मात
जैसे तपती दोपहरी में हो रिमझीम सावन बरसात।

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

गठरी

अपनी उमर अपनी गठरी दौड़ रही अपनी पटरी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी



मंडरा रहे घनेरे बादल तोड़ने को उष्माभरी सांखल
अपने श्रम से जोड़ रहा व्यक्ति जीवन सुरभि प्रांजल
बूंदों में एक नई उमंग अर्पित करती घर्षण की बिजुरी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी

अभिलाषाओं के पवन झकोरे चाँदनी दहके भोरे
कब सपनों में चाह उठेगी होंगे जो चाहें सब पूरे
आकाश मुस्काता कहता व्योम भरो निजी अंजुरी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी

उमर की अपनी गति है काया कहती क्यों दुर्गति है
पटरी उबड़-खाबड़ मिलती, लक्ष्य-दौड़ में सहमति है
दौड़ बादलों का नभ में गीत सावन संग बजे खंजड़ी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी।

धीरेन्द्र सिंह
31.07.2026
08.08



मंगलवार, 28 जुलाई 2026

कहाँ हो

तुम मुझसे ख़फ़ा होकर दगा दे गई
मंज़िल का ना पता क्या सदा दे गई

गूंज है अनुगूंज है दूरस्थ की सूझ है
पुंज भावनाओं का परिणाम अबूझ है
नाराजगी भी ऐसी कैसी अदा दे गई
मंजिल का ना पता क्या सदा दे गई

पलकों में नमी है तुम्हारी ही कमी है
अलकों में सितारों की महफ़िल जमी है
अनुभूतियां आसक्ति की वफ़ा दे गई
मंजिल का ना पता क्या सदा दे गई

कुछ कहती कुछ सताती हैं यह सदाएं
तुम कहाँ हो कैसे दिल का हाल बताएं
जीवन के राग बीच धुन धता दे गई
मंजिल का ना पता क्या सदा दे गई।

धीरेन्द्र सिंह
29.07.2026
06.49

आज

तथ्य कह रहा है कि सत्य नाराज है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है



सच में बदल रहा या हवा का है बदलाव
टहनियों को रहे काट दौड़-भाग रहा छांव
परिवर्तन की लहर है या परितृप्त साज है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है

कितना जटिल है जो है को बदल देना
फट जाता कहीं दूध बना लेते हैं छेना
युक्तियों की सूक्तियाँ भी लाजवाब हैं
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है

सघन को सहन का वहन करना ही होगा
दहन की तपन में यूँ ना कहीं जलना होगा
समझिए न मनुष्य का प्रखर कितना ताप है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है।

धीरेन्द्र सिंह
28.07.2026
21.15

अस्तित्व

कुछ गीत गुनगुनाइए प्रतीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो



जीवंतता केवल श्वासों का नहीं सरगम
सुगंधता कर्मों का श्वास मिश्रण रहे हरदम
एक धुन, एक लय का मोहक मीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो

हर क्षेत्र के यहां हैं विभिन्न उन्नत धुरंधर
हर नेत्र में बसा है नए लक्ष्य का समुंदर
कुछ करना ऐसा समाज की नई रीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो

सहजता से कहीं रहना अकर्मण्यता लगे
पलकें खुलीं हों जिसकी क्या हैं वह जगे
आकर्षक हो, अनूठा हो जगी प्रीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो।

धीरेन्द्र सिंह
28.07.2026
13.33

रविवार, 26 जुलाई 2026

जेन-जी और भाषा

जेन-जी हुजूम जंतर-मंतर परिवर्तनीय ले जिज्ञासा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा



प्रजातंत्र में विरोध भी तो है एक मौलिक अधिकार
पर भाषा में शब्द चयन बतलाते हैं व्यक्ति संस्कार
असामाजिक असभ्य शब्द से क्या टूटती निराशा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा

वस्त्र की आजादी है अभिव्यक्ति की भी स्वतंत्रता
जेन-जी आप न भूलिए आप भारत देश के नियंता
आप पर निर्भर देश है आप ही हैं सबकी नव आशा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा

संयोजन, आयोजन में जेन-जी है अति तेज प्रखर
पर यह क्या लक्ष्य प्राप्ति हेतु अशोभनीय शब्द डगर
भाषा से झुक गयी आशा जेन-जी क्यों की तमाशा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा।

धीरेन्द्र सिंह
27.07.2026
08.28

शनिवार, 25 जुलाई 2026

त्रिभुजी पत्रकार

त्रिभुज का अपना विशेष महत्व है जो दर्शाता है कि जिस को से भी देखी जाए उर्ध्वगामी ही दिखती है। पत्रकार यदि त्रिभुजी रूप में कार्यरत रहते हैं तो वह सामाजिक चेतना को विभिन्न आयाम देते हैं जिससे समाज यथोचित प्रगति, सहमति और प्रदर्शन कर पाता है। त्रिभुज का एक दूसरा रूप भी है जिसमें पंख पसारे व्योम को चूमने या लक्ष्य को भेदने की अभिलाषा नजर आती है। डॉ अरविंद सिंह को मैंने हमेशा त्रिभुजी के रूप में ही पाया है। त्रिभुजी पत्रकार के प्रमुख तीन अंग होते हैं सत्य के संग, सामान्य जनता की ओर तथा नएपन की उपलब्ध संसाधनों में पहचान। 

त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह अपने पत्रकारिता जीवन में सत्य का साथ पकड़कर समय-समय पर सत्य का साथ दिया। पत्रकारिता में सत्य को दस्तावेजी रूप देने के लिए इन्होंने "सामयिक ब्लिट्ज" नामक साप्ताहिकी का प्रकाशन वाराणसी से आरम्भ किया। यहां त्रिभुजी पत्रकारिता का एक पक्ष "सत्य" प्रमाणित हो रहा है। दूसरा पक्ष है सामान्य जनता की ओर बढ़ना। यहां सामान्य जनता की विभिन्न परिभाषाएं हो सकती हैं किंतु यदि वाराणासी को ध्यान में रखकर सामान्य जनता की पहचान की जाए तो ग्रामीण जनों का पक्ष प्रमुख रहेगा। इस पक्ष को प्रमाणित करता है त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह का नियमित अपने साप्ताहिकी "सामयिक ब्लिट्ज" को निःशुल्क कुछ गांव को उपलब्ध कराना। प्रसंगवश उल्लेख किया जा रहा है कि ग्रामीण साप्ताहिकी की प्रतीक्षा उत्सुकतापूर्वक करते हैं। उपलब्ध संसाधनों में नएपन का प्रमाण इस त्रिभुजी पत्रकार के वाराणसी में आयोजित विभिन्न कार्यक्रम तथा अनेक मंदिर निर्माण, गरीबोंनको भोजन एवं कंबल आदि वितरण से जुड़ा है।

वाराणसी के स्पंदनों को जितनी कुशलता से इस त्रिभुजी पत्रकार ने अपनी पुस्तकों में समेटा है ऐसा उदाहरण वर्तमान में कहीं देखने को नहीं मिल रहा है। प्रत्येक अच्छे और बड़े काम में एक धुन होती है लय होती है जिसके आधार पर कार्यों में लयबद्धता बनी रहती है। यदि इन त्रिभुजी पत्रकार महोदय की धुन की बात करें तो वह हैं वाराणसी के सांसद  और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी तथा लय है विशेषकर वाराणसी के समग्र विकास गति। पिछले कुछ वर्षों से लगातार पुस्तकों का प्रकाशन वाराणसी के पल-पल, छिन-छिन का पारदर्शी दस्तावेज सा है। यह पुस्तक पत्रकार की डायरी की त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह के काशी के प्रति समर्पण और अनुराग को दर्शाता है। यह पुस्तक भी एक पारदर्शी दस्तावेज की तरह है। 

धीरेन्द्र सिंह

कवि और ब्लॉगर

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

रिश्ते

रिश्तों की डोर में न मिलता ओर-छोर
भोर जिंदगी का बंदगी करे भी तो क्या
सूर्य किरणें जगाती सजाती हैं निसदिन
पक्षियों की चहचआहट लगे क्या नया






संवेदनाएं सिमट रहीं चिमटी से उगें भाव
कामनाएं टिड्डी दल मन के फसल का क्या
प्रतियोगिता में स्वार्थ का समय-समय हवन
धुआं उठता बहुत घनेरा हवा का इसमें क्या

इंटरनेट से ही प्रायः अपनों से होती भेंट
दरवाजे पर दें दस्तक द्वार खुल रहा क्या
दो-तीन दिन ठहर लिए तो वर्ष भर छुट्टी
बर्तन को कोई साझा अब कर रहा है क्या

यह प्रवाह है समय का जय-जय तो कीजिए
एक उम्र चुकाने का समय रह गया ही क्या
ढल जाना समय संग जैसे उड़ती चले पतंग
रुख मोड़ने की जिद में कुछ मिल सका है क्या।

धीरेन्द्र सिंह
25.07.2026
08.16

डायरी क्यों

 डायरी क्यों

एक स्वाभाविक प्रश्न सहज ही इस पुस्तक के प्रबुद्ध पाठक के मन में उभर सकता है कि पत्रकार की डायरी क्यों ? इसे कदापि न स्वीकारा जाए कि इस पुस्तक के लेखक व पत्रकार की यह कोई निजी डायरी है। सामान्यतया प्रत्येक पत्रकार की अपनी डायरी होती है जिसके आधार पर वह पत्रकारिता को गतिशील बनाने में होता है। यदि इस पुस्तक विशेष की बात की जाए तो यह डायरी सार्वजनिक जीवन के सार्वजनिक समाचार का सार्वजनिक हित सूचक है। ज्ञातव्य है कि प्रत्येक पत्रकार की अपनी डायरी होती है किंतु कभी-कभी ऐसे व्यक्तित्व का प्रादुर्भाव होता है कि एकल व्यक्तित्व आधारित डायरी निर्मित हो जाती है।

"माँ गंगा ने बुलाया है" यह आस्थापूर्ण वाक्य भारतीय जनमानस के पटलनपर एक चेहरा उभरता है जिसे विश्व नरेंद्र मोदी के नाम से पहचानता है। काशी में इतना प्रबल, प्रखर और प्रियग्राही वाक्य गंगा तट पर नहीं गूंजा था। इसे वाक्य कहना भी इस वाक्य में निहित आस्था, सम्मान और समर्पण के प्रति न्यायोचित नहीं होगा। यह एक वाक्यबनाहीं बल्कि वाराणसी के लिए विशेष तौर पर एक सूक्ति बन गया था जो अब भी बनारस की हवाओं में गूंज रहा था। यहीं से पत्रकार दृष्टिकोण ने चेताया कि अब काशी में कुछ अति विशिष्ट होने की प्रबल संभावनाएं है। पत्रकारिता धर्म ने नरेंद्र मोदी को वाराणासी में गहनता से समझना और प्रत्येक गतिविधियों को सहेजना आरम्भ किया और निर्मित हो गयी पत्रकार की डायरी जो आपके समक्ष प्रस्तुत है।

डायरी की यह प्रस्तुति धरा पर गंगा अवतरण के उल्लेख के बिना अपूर्ण कहा जा सकता है। भगीरथ या भागीरथ की घोर तपस्या और दृढ़ निश्चय के बल पर ब्रह्मा के सुझाव पर शंकर ने अपनी जटा के द्वारा गंगा के असाधारण वेग को नियंत्रित कर धरा पर प्रवाहित किया। जटा जो वर्तमान में बुद्धिबल और दृष्टिकोण बल के समानार्थी है उसका प्रदर्शन नरेंद्र मोदी ने काशी में किया। इस बल के परिणामस्वरूप वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर का ही निर्माण नहीं हुआ बल्कि अयोध्या में राम मंदिर भी अपनी भव्यता और दिव्यता के साथ पुनर्स्थापित हुआ। यदि कहा जाए कि सनातन धर्म के लिए नरेंद्र मोदी का प्रयास भगीरथ प्रयास था तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

इसे योगायोग कहा जाए या सुखद संयोग कि जिस कुल में भगीरथ का जन्म हुआ वही कुल इस पुस्तक के लेखक का भी है। परंपराओं के गौरव का उल्लेख हर कोई करता है इसलिए प्रसंगवश इस तथ्य का भी उल्लेख किया गया। गंगा सदियों से काशी से सटी हुई गतिमान हैं किंतु नरेंद्र मोदी के वाराणसी का सांसद बनने के बाद जो अभिमान काशी को हुआ है वह भगीरथ प्रयास ही तो है। बनारसी साड़ी की तरह नरेंद्र मोदी काशी को नए धागे से बुनते और संवारते गए जिससे भारत देश ही नहीं बल्कि विश्व का भी ध्यानाकर्षण हुआ। बदला हुआ आकर्षक काशी पहले से बहुत अधिक लोगों को आकर्षित कर रही है। तमिल संगमम के द्वारा उत्तर भारतौर दक्षिण भारत के बीचेक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक पुल निर्मित करना नरेंद्र मोदी की ही दूरदर्शिता है।

समय कभी टूटता नहीं है बल्कि वह परिवर्तित होता है नए रंग और ढंग में और निरंतर गतिमान रहता है। इस गतिमान समय पर काशी की मूल प्रवृत्ति को बरकरार रखते हुए नई चित्रकारी कर देना नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्तित्व के लिए ही संभव है। बनारस नरेंद्र मोदी को नव रचयिता के रूप में भी जानता है। एक पत्रकार घटित लगभग सभी घटनाओं का साक्षी होता है। तथ्य ही नहीं बल्कि सत्य आधारित तथ्य को समाज के समक्ष प्रस्तुत करना पत्रकार का धर्म है। एक पत्रकार की दृष्टि जब समाज और उसके परिवेश में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की सफल उपलब्धियों का क्रम निर्मित करता है तब कहीं जाकर एक पत्रकार की डायरी सजती है। उल्लेखनीय है कि गंगा और शिव आधारित काशी है जिसे नरेंद्र मोदी ने संवारा है अतएव भगीरथ, शिव, गंगा, विश्वनाथ धाम, अयोध्या का राम मंदिर आदि डायरी के प्रेतक ऊर्जा हैं। आपके समक्ष इस डायरी को प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता हो रही है।

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

निर्मुक्त हो जीवन

आस जब तुम्हारी है प्यास जब तुम्हारी है
कहो क्यों न करूँ मैं फिर तुम्हारी अर्चना
सृष्टि जब दुलारी है दृष्टि की जब लयकारी है
कहो क्यों न हृदय तब करे मुग्धित गर्जना






शक्ति की सब करें अर्चना अद्भुत है सर्जना
पुष्प, दीप यही सब सीख क्यों नही हो कामना
ध्यान का ही गान चलता जीवन है इसमें पलता
कहो क्यों न हो व्यथित कथित का हो सामना







स्वयं को बांधकर अभिलाषाएं बांटकर गतिशील
कहो क्यों न करूं में फिर बंधनों का मर्दना
सत्य हो तुम शिष्ट हो पर एक परिशिष्ट हो
कहो क्यों न नव पृष्ठ रचूं लेकर प्रखर रचना







कठिन नहीं शब्द हैं भाव भी नहीं हैं स्तब्ध
कहो फिर क्यों न गढूं शब्द निहित अभ्यर्थना
बोलती ही तुम कितनी संतुलन के बाद भी
उन्मुक्त जीवन के लिए निर्मुक्त हो जीवन व्यंजना।







धीरेन्द्र सिंह
24.07.2026
05.49
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मंगलवार, 21 जुलाई 2026

पथिक हूँ

मैं ही कारवां, मैं ही गति, मैं ही पथिक हूँ
संघर्ष है, समस्या हैं किंतु मस्त व्यथित हूँ




जग जाग रहा लगता पर प्रायः उनींदा है
दृग ताक रहा अक्सर पर स्वप्न सरीखा है
कुछ कर्म कुछ भाग्य से लगता समर्थित हूँ
संघर्ष है, समस्या है किंतु मस्त व्यथित हूँ

जो भी जुड़ा चलता रहा कुछ रिश्ते चुरा
निरपेक्ष मैं रहा पर कह गया मुझको बुरा
मैं जैसा था वैसा हूँ वह कहते परिवर्तित हूँ
संघर्ष है, समस्या है किंतु मस्त व्यथित हूँ

कांटे नहीं तो गुलाब की परिकल्पना कठिन
बांटे नहीं तो श्वासों की अभ्यर्थना मलिन
शुचिता से जी रहा हूँ समाधान समर्पित हूँ
संघर्ष है, समस्या है किंतु मस्त व्यथित हूँ।

धीरेन्द्र सिंह
22.07.2026
08.37

सोमवार, 20 जुलाई 2026

स्वीकार्य जिंदगी

समझकर भी नासमझ सी है कार्य बंदगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी




जुड़े हुए हैं जो कुछ मुड़े भी लगते वो
अपनेपन की भावना में रहता जीवन बो
सब कुछ सहज हो जैसे भीतर तो शर्मिंदगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी

दांतों के बीच जीभ कटती है पर न बोलती
कड़वाहट भी हो कितनी जिह्वा मीठा बोलती
सहन के गगन में रहे परिवेश परिवार बुलन्दगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी

सबका जीवन अलग भिन्न तंत्र-मंत्र, आराधना
अपनों की खातिर जीना पिघलती सी कामना
झर चुके हैं खुद लुटे हैं पर अपनों बीच हदबन्दगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी।

धीरेन्द्र सिंह
21.07.2026
11.10

आप हैं बस सोचती

सींचता है हृदय हरदम बनकर पुनीत पावन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन

आप नयनों में नहीं झांकती बस ताकती है
मेघ पुतली में सघन हैं सत्य यह नहीं मानती हैं
नयन भर नमी हमेशा पलकों का रहता है छावन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन

चमकती हैं पुतलियां होता है जब नेह गर्जन
आप ही कारण हैं आप ही हैं भाव बूंद नर्तन
झमाझम भाव वर्षा में हो जाता जलमग्न तन आंगन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन

हृदय सूर्य सा दग्ध मेरा आप भावना का सागर
वाष्पित होती मन में बसती रचती रहती बादर
हृदय बरसता लिए सहजता और भींगता दामन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन।

धीरेन्द्र सिंह
21.07.2026
03.49

शनिवार, 18 जुलाई 2026

आत्मिक संघर्ष

पकड़ना चाहते इतना पर कितना छूटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है




प्यार के हिलोरे हैं अनुराग के बेचैन किनारे
वह अपना है तो अनवरत अपने को दुलारें
जिंदगी उपद्रव भी लगे और समय लूटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है

बादलों सा उड़ता नभ से जुड़ता चित्त चंचल
कभी बाहों का घेरा तो कभी उड़ता आँचल
विचारों में बंधा जीवन अपने में ही घुटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है

धधकती आग भीतर पर मंद होता प्रकाश है
वृष्टि की चर्चे बहुत हैं पर दिखती नई प्यास है
तन की कहें मन की सुने व्यक्ति इसमें लुटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है।

धीरेन्द्र सिंह
19.07.2026
16.42

जीवन

मिल रहे हैं दर्द मगर मर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं




हैं जो अपने क्यों लगे गलत पनपने
लगाव था निभाव भविष्य के सपने
फिसल गए स्वार्थ का यूँ तर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं

भावुकता भर स्वभाव वही हाव-भाव
अपनों के बीच खोजते पहचानी छांव
ऐसे बन गयी दूरियां लिए कर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं

मन है टूटता फिर बनता जैसे कोशिकाएं
अपनों का दर्द कितना कोई ना बता पाए
जीना यही है जीवन दर्द यूँ दर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं।

धीरेन्द्र सिंह
18.07.2026
20.27

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

मनभावन

मन के पालने में अभिलाषाओं का बिछावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है




चल पड़े हैं लोग निर्धारित श्रेष्ठता की चाह में
निज श्रेष्ठता अचर्चित अचंभित पड़े राह में
मन पालना का झूलना लगे प्रतिपल पावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है

झूलना नियति है या झूले की स्वाभाविक गति है
भविष्य की चिंताएं हैं यही आज की नियति है
वर्तमान भ्रमित करता न्यायोचित तथ्य जलावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है

एक ही समाज की एकमत नहीं लगती बोलियां
एक सिद्ध मार्ग लगे दर्द निवारण के लिए गोलियां
प्रगति है प्रताप है जीवन कई अज्ञात बुझावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है।

धीरेन्द्र सिंह
17.07.2026
19.00

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

सत्य-असत्य

सत्य पिघला सरलता से तरलता का बोध है
असत्य का प्रयास है पर सत्य का जयघोष है




प्रदर्शन, विज्ञापन विभिन्न तरह की बनती रील
क्षद्म हवा का झोंका निर्मित पतंग को देते ढील
जनमानस की चेतना में काल्पनिक असंतोष है
असत्य का प्रयास है पर सत्य का जयघोष है

सोशल मीडिया महाभारत में भांति-भांति योद्धा
अनचीन्हे से अस्त्र-शस्त्र से निर्मित होती श्रद्धा
धर्मशास्त्र से राजनीतिशास्त्र प्रचलित कोष है
असत्य का प्रयास है पर सत्य का जयघोष है

व्यक्ति अपनी लंबाई से छुपाए अपनी बिवाई
दर्द-दर्द बहका-भटका क्या कर पाएगी दवाई
कर्म कहार कांधे डोली में अभिलाषा निर्दोष है
असत्य का प्रयास है पर सत्य का जयघोष है।

धीरेन्द्र सिंह
मूल लेखन :-16.07.2026 
19.08
समूह में पोस्ट:- 17.07.2026

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

धड़कन-धड़कन

कहीं न कहीं तो बंधना मन के लिए जरूरी है
साँसों का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है

पग भी चले थे राह में कंकड़ियों से नित उलझते
कई लक्ष्य गए गुजर कथ्य जीवन के भी समझते
सबकुछ बसा है दिल में उदासी तो कभी मगरूरी है
साँसों का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है

जीवन के कटोरे में भर-भर के मिले है दूध-भात
कटोरे को है रहता भरता कोई तो हितैषी अज्ञात
हर सांस जो चले साथ कोई रिश्ता हो, ना धूरी है
सांसो का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है

बंधता है मन जहां वही लगता सुखकर ठाँव है
यदि देखें गहनता से तो मन भी तन का निभाव है
हर तड़पन एक यात्रा, लगती पूरी कभी अधूरी है
सांसो का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है।

धीरेन्द्र सिंह
15.07.2026
08.40


सोमवार, 13 जुलाई 2026

बस प्यार

आपकी परिभाषा कुछ हो पर प्यार है बस प्यार
नयनों का मस्तूल है, हृदय-हृदय सुधि पतवार




वासना से लेकर प्यार जापना का ही चलन है
जिसका जैसा परिवेश वैसा प्यार का नमन है
युक्तियां सारी आजमाइए अभ्युक्तियाँ दे प्यार
नयनों का मस्तूल है, हृदय-हृदय  सुधि पतवार

हर हृदय में हार सुगंधित भावनाओं के पुष्प
किसको पहनाता, रिझाता बात तो यह गुप्त
चेतना में प्यार मुखर तो हावभाव में झंकार
नयनों का मस्तूल है, हृदय-हृदय सुधि पतवार

आपकी परिभाषा में जुड़ गई मन की आशा
मन से मन को जोड़कर पूर्ण करें हम जिज्ञासा
मैं तो स्पष्ट लिख चुका कहिए क्या है इकरार
नयनों का मस्तूल है, हृदय-हृदय सुधि पतवार।

धीरेन्द्र सिंह
14.07.2026
07.51

रविवार, 12 जुलाई 2026

सेवानिवृत्ति

अपने घर में सबसे बड़ा होना तो सम्मान है
सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है

संपन्नता की ध्वजा व्यवस्थित विधिवत सजा                      फुरसत की टोपी पहने कहें जिंदगी दे मजा                        जीवन कहे राग, द्वेष, विषाद का बहे तूफान है                      सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है                     


                        

 





लोग घर में ही हैं घर डगर सा लग रहा है                          नजर कई हैं दौड़ती सबर वहां थक रहा है
आ रहे हैं जा रहे हैं बदला घर का विज्ञान है
सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है
                      
खट से कप रख चले जैसे कार्यालय परिवेश है
बोलते बढ़ चले जैसे कार्यपालकीय आदेश है
भौतिक सुविधाएं सभी न मिलती अपनों की तान है
सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है।

धीरेन्द्र सिंह
12.07.2026
19.37