शनिवार, 2 मई 2026

वेदनाएं

छूकर कह रही हैं यह आपकी चेतनाएं
हंसिए, खिलखिलाईए घटेंगी न वेदनाएं

शब्दों में सिमटकर मनोभाव चल पड़े
अर्थों में बिखरकर सद्भाव निकल पड़े
क्या हुआ, कैसे हुआ यह समझ न पाएं
हंसिए, खिलखिलाईए घटेगी न वेदनाएं

चौरंगी मन में चतुर्भज है कंपित चेतना
मन आपका न छू लूँ संशय हो तो देखना
संपर्क में होती हैं निर्मित अचानक कामनाएं
हंसिए,खिलखिलाईये घटेगी न वेदनाएं

कब हो सका चलती रहे अपनी मनमर्जियाँ
दूसरी आफत प्रणय की आती रहती अर्जियां
छोड़िए जग की बातें क्या है सोच तो बताएं
हंसिए, खिलखिलाईए घटेगी न वेदनाएं।

धीरेन्द्र सिंह
03.05.2026
06.25

शुक्रवार, 1 मई 2026

धक-धक

धक-धक, धीरे-धीरे, साथ-साथ, कुछ-कुछ
लखि-लखि, तीरे-तीरे, सांस-सांस, सचमुच


आप कई आवरण के प्रकरण परे हैं विद्यमान
थाप जिंदगी के कई आवरण धरे हैं निदान
मति-मति, दौड़े-दौड़े, आस-आस, हँसमुख
लखि-लखि, तीरे-तीरे, सांस-सांस सचमुच


यथार्थ के विचार में आपका ही नित संचार
परमार्थ है स्वीकार जाप का ही मीत प्रकार
रचि-रचि, हौले-हौले, खास-खास, अभिमुख
लखि-लखि, हौले-हौले, सांस-सांस सचमुच


क्रिया की प्रतिक्रिया में सक्रिय है भाव क्रिया
दिया है मन में जला विनयी है चाह प्रिया
सखि-सखि, तौले-मोले, रास-रास गुपचुप
लखि-लखि, हौले-हौले, सांस-सांस सचमुच।


धीरेन्द्र सिंह
02.04.2026
09.49

खामोश आंधियां

नयन की नयन से सुगंधित शरारत
मुस्कराहट में आपको मिली महारत
जुल्फ गर्दन की अठखेलियाँ भी हों
वाचाल उभरती जाए सुगंधित इबारत

शिष्ट, शालीन, व्यक्तित्व करता है मोहित
प्रभाव ऐसा हो लयबद्ध सी थरथराहट
गीत बन जाती है निहारती यह दुनिया
स्वर दें आप उसे उभरे मीठी छटपटाहट

हृदय के पंख पर बिठाकर आपको उडें
गगन कर नमन दर्शाता रंगों की महारत
आपके रंग देख मेघ भी एकटक हो तकें
नशीले रंगों की स्वामिनी फाग सी शरारत

कुशलता से छिपा लेती अपने सारे बवंडर
उड़ता जाता है परिवेश करती जाती आहत
समझने के प्रयास में होते जाते सब बदहवास
आप खामोश आंधियों में उड़ाती हैं चाहत।


धीरेन्द्र सिंह
02.05.2026
05.36


गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

मजदूर दिवस

मजदूर दिवस है ना होइए मगरूर
भारत है निर्माता विभिन्न्न से मजदूर

पसीना बहानेवाले ही लगते हैं श्रमिक
पढ़े-लिखे भी मजदूर कर मौलिकता शमित
भारत श्रमिकों का निर्यातक है मशहूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर

आई टी का बोलबाला सब पढ़ते प्रौद्योगिकी
पूर्ण कर यह शिक्षा सेवा प्रदाता की लायिकी
कम्प्यूटर की गैर भाषा न अपना सर्च इंजन नूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर

हम विश्व के श्रेष्ठ एक शिक्षित मजदूर
मजदूर दिवस आज भी रहा हमें घूर
बहुसंख्य विदेशों में हैं जाने को प्रणपूर
भारत है निर्माता विभिन्न से मजदूर।


धीरेन्द्र सिंह
01.05.2026
08.02

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

जीवन

 उम्र तन्मय हो गया है आस का उन्माद
जीवन झंझावात में कहां मधुर संवाद

आर्थिक आजादी ही सर्वप्रमुख अभियान
स्वार्थ सिद्ध के खातिर करते हैं गुणगान
जीवन ऊर्जा सूख रही मिले न पानी खाद
जीवन झंझावात में कहां मधुर संवाद

देह तलक ही नेह है नखशिख सौंदर्य
भौतिकता में उलझे ना आत्मिक सौकर्य
नेह डगरिया नहीं गगरिया मन पनघट नाद
जीवन झंझावात में कहां मधुर संवाद

उम्र गुजरती राह बदलती और बदले चाल
आज सुन रहे कल बदलती उम्र अपनी ताल
पकड़-धकड़ कर उम्र को रोकें यौवन विवाद
जीवन झंझावात है कहाँ मधुर संवाद।

धीरेन्द्र सिंह
30.04.2026
08.27

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

आप

आप इस दिल की जिंदगानी हैं

प्यार की हम भी एक कहानी हैं

आपकी हलचलें खामोश हो रहीं

ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं


गहन गहराई में भाव तुरपाई करें

अदृश्य देह आत्मा की रवानी है

आप हर बार हवा सा छू रहे हैं

ऐसा लगता हम उबलते पानी है


कहां से राह चली और शाम ढली

जिंदगी हतप्रभ सी अनजानी है

आज भी आस प्यास साँसों में

ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं


आपकी ऊष्मा आपकी ऊर्जा है

एक गति मति में संगती ठानी है

प्यार के गुबार में आपका बुखार

ऐसा लगता हम उबलते पानी हैं।


धीरेन्द्र सिंह

29.04.2026

05.56

सोमवार, 27 अप्रैल 2026

गर्मी

 मौसम आक्रामक नहीं कहीं है नर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी



घर से बाहर सूर्य प्रखरता से मिलता है
पसीने में मजदूर निडरता से चलता है
धरा की उष्णता गुम्बद में फंसी चर्खी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी

आग बरस रही श्रमिक को लगे है फाग
तरबतर पसीने से भींगा सजाता है आज
हमेशा मौसम न रहा जिजीविषा धर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी

सतत संघर्ष में निहित मानवता का उत्कर्ष
जूझते जीवन से उन्हें क्या मौसम का विमर्श
मौसम प्रणय करता कभी चुहल बेशर्मी
सुना है गर्म गुम्बद है उफन रही गर्मी।

धीरेन्द्र सिंह
28.04.2026
08.45

रविवार, 26 अप्रैल 2026

प्रबुद्ध

प्रबुद्ध हैं तो सर्वत्र ज्ञान बांटिए
निबद्ध हैं तो यत्र-तंत्र संज्ञान बांटिए

संज्ञान उत्तर प्रदेश गृहित शब्द है
विकासशील राज्य का जनित प्रारब्ध है
धर्म और राजनीति यहां जांचिए
निबद्ध हैं तो यत्र-तत्र संज्ञान बांटिए

थार के गुबार में लिप्त लगता व्यवहार
संशय में उबरता सूर्यरश्मि सा त्यौहार
विस्थापन यहां विवशता कागज पर नापिए
निबद्ध हैं तो यत्र-तत्र संज्ञान बांटिए

इतर राज्य-राष्ट्र में दीप्तिमान हैं रहिवासी
नोएडा, लखनऊ, अयोध्या आदि काशी
संज्ञान विज्ञान है तबियत से तो झांकिए
निबद्ध हैंबतो यत्र-तत्र संज्ञान बांटिए।


धीरेन्द्र सिंह
27.04.2026
09.14

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

उलझन

अपने विश्व की उलझन में दगा दे देना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना



कश्तियाँ दोनों की मगन साथ-साथ थीं
हस्तियां अपनी भी सबरंग बेहिसाब थीं
कुतर दिया समाज ने जुड़ाव दे पैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना







अपने विश्व में भी हैं आधे-अधूरे व्यक्तित्व
अपने को देखे या सहेजे तीरे अस्तित्व
टपक रहे हैं भाव पर मुस्कराहट के छैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना






क्षद्म व्यवहार रूप भी तो लगे बहुरूपिया
महल की बात करे जीर्ण हो रही कुटिया
प्यार अवसर है स्नेह सुप्त ताल की मैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना।







धीरेन्द्र सिंह
26.04.2026
10.24

गजब लिखते हैं

 
गजब लिखते हैं सरकार जी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी

भावनाओं की हो पल्लवित फुनगिया
कामनाएं खिलें लेकर विचार दुनिया
अभिव्यक्तियाँ जैसे हवन विचार घी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी

मेरे हर लेखन की ऊर्जा हैं पाठक
सबकी अपनी शैली लेखन जातक
पाठक-पाठिका रचना रत्नहार जिय
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी

यह रचना प्रतिक्रिया का प्रभाव
प्रतिक्रिया मस्तक रखना स्वभाव
आप महत्वपूर्ण सत्कार करे जी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी।

धीरेन्द्र सिंह
25.04.2026
21.52



शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

देह मिलन

देह से देह मिलन भी एक जतरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है

कितनी देह करती नित अपनी पूजा
स्वयं का श्रृंगार का आधार नहीं दूजा
स्वयं सुशोभित सज्जित नहीं नखरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है

साहित्य यह पक्ष प्रखर दर्शाता नहीं
ऐसा लगे प्रचुर श्रृंगार इसे भाता नहीं
प्रणय तो पूजा है प्रकृति में पसरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है

दूर से लगता आकर्षण अति चुम्बकीय
नयन लहक उठे महक उठे चहक हिय
घटाएं घिर आएं बदन लगे कि बदरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है।

धीरेन्द्र सिंगज
25.04.2026
11.15


शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

व्यक्ति

इतना रीता भी नहीं कि

ढूंढू व्यक्ति करने को बात

इतना भरा भी नहीं कि

कर सकूं अनदेखा जज्बात


मन की कूंची है तत्पर

बहुरंगी भावनाओं की सौगात


रविवार, 22 मार्च 2026

उम्र

 उम्र मुझसे मांगती है सरसराती रीति

अन्य प्रपंच ना भाए प्रणय जीवन गीत

कब कहां चूका रीता सा है लगता कहाँ

तार झंकृत हैं सभी सुप्त आपका प्रतीत


तार के कसाव का कौशल यदि छूटे

भरभराती सी लगे चट्टान निर्मित भीत

वर्तमान के सरगम में नवीनताएँ अनेक

क्या मिलेगा सोचकर कैसा था अतीत


भावनाएं पक जाने पर बदल देती रूप

सुगंध, मिठास, अहसास रहते वैसे मीत

उम्र एक बदलाव है रूप, रंग, तरंग का

रुनझुन मादकता ना बदले माथा ना पीट।


धीरेन्द्र सिंह

23.03.2026

09.12

शनिवार, 21 मार्च 2026

सत्य

 सत्य क्या है सांझ सरल अरुणाई

रात्रि लगे तिमिर किसी को तरुणाई

भाव सहित दृष्टि की बहती सर्जना

जग की विविधता चेतना की परछाईं


महत्व का घनत्व है अपनत्व सघन

गगन का दहन है तपन की रुसवाई

आकर्षण कर घर्षण करता विकर्षण

बदन बहुरंगी अतरंगी द्रवित चतुराई


कामना के पर्व में योजना स्व सर्व

याचना भी रचना करे जैसे पुरवाई

मोह के खोह में देह लगे अति सुबोध

अभिलाषाएं फूट पड़ें वासंती अमराई।


धीरेन्द्र सिंह

22.03.2026

08.12

गोवा

 गोवा

एक संस्कृति

एक सभ्यता

मानवता का

अभिव्यक्ति का

स्वतंत्रता का,


सागत के तट

विशिष्ट पहचान

लिए अपना आसमान

विविध विधान

नए मूल्य विज्ञान

चेतना के,


यहां व्यक्तित्व निर्द्वंद्व

स्वयं को अभिव्यक्त करता

नहीं परतंत्र

यौवन चहुंओर पसरा

भावनाओं का गणतंत्र

स्वयं की सेवा

गोवा,


मदिरा, मैथुन, मनोकामना

कल्पना का यथार्थ सामना

परिधान में परिणय

परिणय में विधान

जीव का सत्य से सामना

उर मेवा

गोवा,


सहज सुविज्ञ बन आइए

स्वयं को स्वयं से छाईए

अंतर्चेतना प्रज्वलित हो

अभिव्यक्त अपने गाइए

आत्मसेवा

गोवा।


धीरेन्द्र सिंह

21.03.2026

21.46


शनिवार, 7 मार्च 2026

नारी

शिव और शक्ति

नारी है भक्ति


सुदृढ, सक्षम, सुकोमल

संरचना की शतदल

युगनिर्माण साक्षी

नारी ही भक्ति


सनातन का आधार

नारी शक्ति प्रकार

आरोहण आसक्ति

नारी ही भक्ति


सांस-सांस नारी रूप

आस-साथ नारी धूप

नारी वैभव, मुक्ति

नारी ही भक्ति


अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष

ध्यानाकर्षण हो सहर्ष

नारी नहीं युक्ति

नारी ही भक्ति 🙏


धीरेन्द्र सिंह

11.18

08.03.2026

लाइक

 रचनाओं को

निरंतर लाइक करना

सम्मान है

रचना और रचनाकार का,

रचनाकार का दायित्व है

लाइक करनेवाले को देना

धन्यवाद

पर कैसे?

लाइक कर्ता के

इनबॉक्स में जाकर

धन्यवाद ज्ञापन

आभार है,

यह प्रणाली

लाइक को नमस्कार है।


धीरेन्द्र सिंह

10.57

08.03.2026

तलहटी

तलहटी से उभरते झोंके उठे हैं

यादें सोई थीं कुछ छूटे उठे हैं


टिमटिमाती आंखों के प्रकाश पुंज

अवलोकन पर दृश्य सब है धुंध

भावनाओं के पथ जगे अनूठे हैं

यादें सोई थीं कुछ छूटे उठे हैं


अब न कसमसाहट ना बेचैनी

निरख मिले राहत हथौड़ी छैनी

शिल्पकार असफल पड़े टूटे हैं

यादें सोई थीं कुछ छूटे उठे हैं


तलहटी व्यक्तिगत आंतरिक श्रृंगार

यहीं से रुनझुन यही से उठे हुंकार

अपनी पगुराहट संग टूटे खूंटे है

यादें सोई थी कुछ छूटे उठे हैं।


धीरेन्द्र सिंह

14.11

07.03.2026

शुक्रवार, 6 मार्च 2026

तलाश

खुद को तलाशिए बिखरे हुए हैं सब

सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब


एक उम्र सबकी है अनुभव लिए हुए

कुछ चिंतित कुछ कहें क्या वह जिए

सबका कहीं अधूरा सा जीवन सबब

सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब


विपरीत जिंदगी को भी पड़ता है जीना

कहीं कौड़िया मिले कहीं रंगीन नगीना

हर एक का अंदाज़ हर एक का अदब

सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब


कहे आत्मा तो मानिए कि निखर गए

जानेगा कैसे कौन कि क्यों बिखर गए

जीवन को पढ़ते-पड़ते मिले अर्थ गजब

सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब।


धीरेन्द्र सिंह

06.03.2026

22.34


मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

आरक्षण

आरक्षण, आरक्षण

जिसकी चर्चा प्रतिपल-प्रतिक्षण

सुरक्षित कुछ इसमें

कुछ कर रहे आक्रमण

आरक्षण -आरक्षण


संविधान ने बोली बोली

पहुंची ऊपर सर्वहारा टोली

यह भी प्रगति दौर रहा

अब आर्थिक पिछड़े, बोली गोली

करवट रहा बदल कण-कण


कर्म-धर्म-सत्कर्म कहते अपनी बात

विशिष्ट स्थान संग हो विशेष पहचान

यह कैसा बिहान का प्रण

अपना-अपना सबका रण

आरक्षण, आरक्षण


सीमाएं तोड़ रहा आरक्षण

नए पक्ष माँग रहे आरक्षण

क्रिकेट का खेल लोकप्रिय

खिलाड़ी को रखने का प्रण

आरक्षण-आरक्षण।


धीरेन्द्र सिंह

25.02.2026

10.20