मंगलवार, 16 जून 2026

बांध दी चोटियाँ

भोर को मुट्ठी में पकड़ बांध दी चोटियां
शोर पवन का उठा उभर पड़ीं घाटियां
मेघ मुस्कराते रोके सूर्य रश्मियां सगरी
आप ही पुलक प्रातः करा दीं मुनादियाँ






मद्धम अंधियारा छाया मंथर चहचआहट
मंदिरों के पट खुले अधर मंत्र युक्तियां
आभामंडल आपकी करे सहज आकर्षित
अर्चनाएं नव सृजित कई प्रबल आसक्तियां

भोर की शरारत है सहज मुट्ठी विराजित
मेघ का सहयोग है मिली सूर्यरश्मियां
एक चाहत बिन आहट कर रही थपथपाहट
भोर कलरव उठ रहा है देख नव नीतियां।

धीरेन्द्र सिंह
16.06.2026
16.36


सोमवार, 15 जून 2026

भ्रष्ट

देश भ्रष्ट है या कि समाज भ्रष्ट है
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है




यही कथ्य है सत्य के स्वरूप सधा
नेपथ्य में क्या हो रहा कहीं से नधा
सदा में अनुगूंज वही पर अस्पष्ट है
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है

सत्य मार्ग की प्रचलित हैं परिभाषाएं
गौरव के जो प्रतीक वहीं शीश नवाएं
बौद्धिकता वस्तु बनी तर्क कष्ट है
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है

एकल है व्याकुल गति जिसकी ढुलमुल
समाज है गुरुकुल प्रीत जिसकी थुलथुल
देश है संघर्षरत समूह पड़े तटस्थ हैं
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है।

धीरेन्द्र सिंह
15.06.2026
18.29


रविवार, 14 जून 2026

क्यों

ऑनलाइन समूह परिचित हो कामना नहीं
मैंने जो लिखा लोग सराहें यह याचना नहीं
क्यों भेजूं मित्र अनुरोध होता इसमें है क्षोभ
रचना है यदि आकर्षक प्रशंसक मांगना नहीं




 

मन कहे वही लिखें भाव का निभाव सींचें
अन्य लेखन स्वभाव से अक्सर सामना नहीं
बुन रहा है जिंदगी को अनवरत अथक मन
भावनाओं के बुनकर को अनर्थक जागना नहीं

छप गया तो क्या हुआ कितनों ने है छुआ
इधर छापो उधर बांटों नहीं लेखकीय साधना
नहीं कागज कलम अभ्यस्त टाइपिंग रखे मस्त
लिख दिया पोस्ट हुआ भाव महके मन आँगना

जब अपरिचित लाइक या करते हैं प्रतिक्रिया
लेखन होता प्रोत्साहित जैसे दधि जामना
झुंड में हुडदंग बस आपसी क्षद्म प्रशंसा तंत्र
साधना एकल है होती जिससे भाव जागना।

धीरेन्द्र सिंह
15.06.2026
07.45



शनिवार, 13 जून 2026

महुआ

महुआ सी चू गयी छाप पसरी मादकता
प्रभाव आपका या मन उड़ान अधिकता
सम्मोहन की होती अनेक परिभाषाएं भी
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता





चिहुंका था मन पाकर महुआ का वह गंध
प्रस्फुटित चेतना में भाव कहे तर्क करे दंग
महुआ की धरा से गुरुत्वाकर्षण की समीपता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता

आदिवासियों से अतिवादियों तक है बड़ी चमक
चेतना के तारों को करती झंकृत है कड़ी धमक
सत्य हो निगाह की या भाव की यह यांत्रिकता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता

इसी पेड़ पर या किसी मेड़ पर चू जाता है महुवा
राह को प्रदीप्त कर विक्षिप्तता मिटाता है महुवा
आप महुवा हैं हर लेती दर्द हमदर्द की मौलिकता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता।

धीरेन्द्र सिंह
13.06.2026
22.03





रविवार, 7 जून 2026

सुनो

सुनो कुछ लिखो तुमको पढ़ता रहूं
इश्क़ को खासकर मन में गढ़ता रहूं

जब तुम कहती हो बहती हो बन नदी
प्रवाह की तरंग में निभाव की खुदबुदी
भींगे तट पर पांव नंगे धुन बढ़ता रहूं
इश्क़ को खासकर मन में गढ़ता रहूं




शनिवार, 6 जून 2026

धुन

आज में डूबकर उम्र जीते रहें

अपनी धुन में ही रहा कीजिए
मुग्ध होकर कई सुन रहें आपको
जैसे कहते हैं अक्सर कहा कीजिए




क्यों चुपचाप हैं बोलते पदचाप हैं
सुननेवाले कहें भाव बहा दीजिए
मिलते पागल भी हैं जिंदगी में बहुत
शब्द की चांदनी को गढ़ा कीजिए

जिससे टूटे हैं वह रह गए हैं कहीं
जख्म सूखे पल्लवन हरा कीजिए
हो रही है घुटन लंबी खामोशी से
नज़्म टूटे हुए हैं दवा दीजिए

आपकी खातिर लिख रहा है हृदय
स्वर में अपने इसे गुनगुना लीजिए
शब्द की बानगी को धुन तो दीजिए
फिर आपकी मर्जी जितनी सजा दीजिए।

धीरेन्द्र सिंह
07.06.2026
08.25


शुक्रवार, 5 जून 2026

तथ्य

तथ्य मैला हो रहा है
सत्य बना है अनुभागी
कथ्य की सीमाएं निर्धारित
जीवन लगता बैरागी







न्यायालय की ओर बढ़ें
अधिवक्ता हैं विधि रागी
भोर चाँद उदय प्रमाणित
सूर्य रात्रि गति साधी

प्रजातंत्र का मंत्र लगे टूटा
जनतंत्र बन रहा खुराफाती
भ्रष्टाचार आचार बन रहा
जमुना हों या जुमेराती

कौन रचा ऐसा समाज
जहां देखें वहां प्रतिवादी
अन्तरघर्षण बना आकर्षण
बिन दूल्हे के बाराती।

धीरेन्द्र सिंह
06.06.2026
07.05


बुधवार, 3 जून 2026

ब्लॉक भ्रम

याद आने के लिए अनुमति जरूरी नहीं

ब्लॉक करके भी क्या ब्लॉक कर पाएंगे
झोंका हवा का जहां चाहे पहुंच जाता है
इस पहुंच से भला कब तक दूर जाएंगे

अपनी करवटों में लिए कुनमुनाती बेचैनियां
अपनी हरकतों में कितना छुपा पाएंगे
छुपाने से भला कब तक छुपा पाया कोई
मुहाने तक पहुंचने को चुपचाप धाएंगे

मन गगन में दहन है अनमन तड़पन कहे
आग मद्धम ना बुझे सुनिए जल जाएंगे
महकती रिमझिम सावन का है आमंत्रण
जो जिए संग वह तरंग रह उमंग जिलाएंगे

ब्लॉक एक भ्रम है क्रम में है यह चलन
किशोर मानसिकता में भाव उलझाएंगे
टूटकर भी जुड़ जाते हैं बादल छंट जाते
अंधियारे जग में कितने जुगनु लुभाएंगे।

धीरेन्द्र सिंह
04.06.2026
12.17





शुक्रवार, 29 मई 2026

बर्तन

 बर्तन टकराते हैं
जब भी छुआ जाए

टकराना बर्तन स्वभाव है
या कमजोर संयोजन
आजकल इसपर ही उद्बोधन
रसोई जल रही है

बर्तनों का विभाजन
आवश्यकता भी अनिवार्यता भी
प्रायः कहते हैं
कांच के बर्तन, नक्काशीदार बर्तन
टकराते हैं, टूटते हैं
बिखर जाते हैं,
चुभता है यह बिखरना
इन बर्तन रूपी पात्र का,

नई व्यवस्था के अंतर्गत
बनाये जा रहे हैं
मॉड्यूलर किचन, जिसमें
विभाजित है विभिन्न बर्तनों
रसोई उपयोगी वस्तुओं का खाना
रसोई व्यवस्थित हो तो
पकवान लगे रोज खाना,

रसोई में हो रहा है
वास्तु की दृष्टि से सुधार
भारतीय मसालों, घी से
आपूरित रसोई
गाय दुग्ध से कर रही
स्वयं को अन्नपूर्णा
और सुदूर गांव में भी
मॉड्यूलर किचन सी आहट है।

धीरेन्द्र सिंह
30.05.2026
07.34


गुरुवार, 28 मई 2026

क्यों कीजिये

हर भाव में निभाव जतन कीजिये
दहन को वहन आप क्यों कीजिये

कुछ सुन रहे कुछ पढ़ रहे जो मिला
क्या सत्य क्या असत्य लगे अधखिला
परिवर्तन है नर्तन ताल अपनी दीजिए
दहन को वहन आप क्यों कीजिये

कहने को लोग कहते कई दुश्वारियां
धन धान्य हेतु सिंचित हो हर क्यारियां
इतिहास दे रहा संकेत त्यों कीजिये
दहन को वहन आप क्यों कीजिये

संघर्ष का विकास में है अपना काम
वर्तमान सजाने में प्रमुख भी है नाम
शिलालेखों की अशुद्धियां नव कीजिये
दहन को वहन आप क्यों कीजिये।

धीरेन्द्र सिंह
29.05.2026
08.02


रविवार, 24 मई 2026

मचलता प्यार

जीवन एक नैया और यह उम्र है पतवार
एक हाँथ में दायित्व दूजे में मचलता प्यार

नैया में पतवार का है ना कोई भी एतबार
धोखा भी बहुत देता है हथेलियों का प्यार
दायित्व एक है उलझाता-सुलझाता खुमार
एक हाँथ में दायित्व दूजे में मचलता प्यार

मन की सुने कि समाज के विभिन्न विचार
सतर्कता में जीता व्यक्ति भी हो जाता लाचार
प्रवाह है एक जीवन बदलते संतुलन आधार
एक हाँथ में दायित्व दूजे में मचलता प्यार

दायित्व के दहन में मनन सघन सभी करें
निजत्व के भवन में घनन दमन सभी करें
एक प्यार ही है ऊर्जा जिसके रंगढंग हजार
एक हाँथ में दायित्व दूजे में मचलता प्यार।

धीरेन्द्र सिंह
25.05.2026
05.45

शुक्रवार, 22 मई 2026

बरकत अरोड़ा

बरकत अरोड़ा
एक नन्हीं परी
न जाने कहाँ से
है वह नृत्य भरी

रात्रि के 0.44 पर
लेखन चल पल घड़ी
प्रतिभा रोमांचित की
वरना मुझे क्या पड़ी

बालिका ईश्वर प्रदत्त गुण
हाव-भाव समाए खड़ी
संगीत बजे पैर चले
थम जाए सब घड़ी

अब और क्या लिखूं
वह अद्भुत अनंत कड़ी
कैसे निभाती वयस्क भाव
वीडियो है एक कड़ी।

धीरेन्द्र सिंह
23.05.2026
0.51

गुरुवार, 21 मई 2026

बदन की मस्तियाँ

खिल उठती हैं सूर्य सी नर्म रश्मियां
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ



कल्पनाओं की मंथर गति किल्लोल
धड़कनों में उभरते हैं नए मीठे बोल
लिख देता हूँ भावनाओं की गश्तियाँ
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ

कितना स्वाभाविक लगे अलसाया बदन
चाँद-तारे नहीं बस मैं और अकेला गगन
बहुत कुछ छिपा लेता बदन पाकर चुस्तियाँ
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ

निढाल सोई सोचती होंगी उठती हूँ
आपकी कामनाएं भी बहकती होंगी
एक अंगड़ाई में चल पड़ें दिन कश्तियाँ
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ।

धीरेन्द्र सिंह
22.05.2026
05.45



बुधवार, 20 मई 2026

मेलोडी

दो राष्ट्र प्रतिनिधियों की है हंसी ठिठोली
दोनों के नाम संयुक्त मिठास भरी मेलोडी

कूटनीति में अवसर के जुड़ते हैं अध्याय
राष्ट्रशक्ति हो सक्षम मुड़ते युक्ति निभाय
अनचीन्हे इस अभिवव पल में दो जोगी
दोनों के नाम संयुक्त मिठास भरी मेलोडी

वैचारिक जुड़ाव हो तो हर पल मुस्कराता
बौद्धिक नई बयार हो तो अद्भुत घट जाता
वर्षों की समरसता से आया पल है संयोगी
दोनों के नाम संयुक्त मिठास भरी मेलोडी

इटली की मेलोनी और भारत के हैं मोदी
विश्व में खिलकर चर्चा है, चॉकलेट बोधी
उन्नत सोच भारतीय उत्पाद जुड़ी विश्व बोली
दोनों के नाम संयुक्त मिठास भरी मेलोडी।

धीरेन्द्र सिंह
21.05.2026
05.46

मंगलवार, 19 मई 2026

आपबीती


आपबीती इस कदर है
खुद को नहीं खबर है
बीत गया दौर वह भी
मन मचाता भी ग़दर है






जो सोचा ना मिला वह
जो मिला किसकी नजर है
कर्म अब तक लड़ रहा
भाग्य ही असली डगर है






स्वयं खंडित पर है मंडित
स्तंभित पूरा शहर है
है बहादुर जाए कहां दूर
कष्टमय लगता सफर है






जी रहे हैं लोग ऐसे
जीवन का ऐसा असर है
चाह कुछ होती नहीं है
जीता वही जिसमें सबर है।







धीरेन्द्र सिंह
20.05.2026
07.02




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रविवार, 17 मई 2026

चाँद बांटिए

चंद लोगों में अक्सर चाँद को बाँटिए
दिल की बेचैनियों को जगह चाहिए
आप यहां-वहां से उठा कहा कीजिए
जिंदादिली की भी कोई वजह चाहिए

मन है मुस्कराता सोचकर बातें नई
मुस्कराने के लिए भी तो लगन चाहिए
दिल यह चाहता है क्या चाहत न समझती
जिंदगी भी है कैसी क्या-क्या न चाहिए

मन है दौड़ता तौलता ऊंच-नीच की बातें
कसक यह है कि कोई तो दहन चाहिए
सब दौड़ते हैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी
सबको अपने रंग का गगन ही चाहिए

खूब कोशिशें होतीं पटाखे-फुलझडियाँ भी
मन है चाहता उत्सव हंसी-ठिठोली चाहिए
हैं जो सयाने चुपचाप किल्लोल में डूबे
सघन प्रयास औरों का है मनटोली चाहिए।

धीरेन्द्र सिंह
18.05.2026
09.11

शनिवार, 16 मई 2026

कुछ छूट रहा

एक मुस्कराती जिंदगी, कमाल है
एक गुनगुनाती जिंदगी, धमाल है
आपके शब्दों में है नटखट शरारत
एक सुगबुगाती रागिनी का ताल है

जी मचल जाता शोखियाँ जताएं शब्द
फब्तियाँ भी मिलती जैसे बेताल हैं
हर तरह के लोग समरसता चाहते
समूह में समूह रचता लिए भूचाल है

कुछ भी लिखना कुछ भी कहना
परिभाषाएं अपनी और अपना गाल है
शब्द द्वारा व्यक्ति को पढ़ने का मजा और
व्यक्ति सोचता वही चतुर दिव्य भाल है

मन बांट देता है टोकरी के फल जैसे
श्रेणियां बनती खुद अनुभव चाल है
कितना भी छुपाए छुप सकता नहीं
कुछ छूट रहा है कुछ का मलाल है।

धीरेन्द्र सिंह
17.052026
06.35

माटी 9

 माटी 9 के प्रमुख मद

1. पंजीकरण व्यवस्थित था।

2. बैठने की व्यवस्था अच्छी थी।

3.रिकोर्डिन्द फोटोग्राफी अच्छी थी।

4. मंच के आरंभ में जिस पुरुष ने आरम्भ किया वह ठीक नहीं था। न कोई भूमिका न किसी प्रकार की पार्श्वभूमि बस बोलना वह भी तेज थोड़ी कर्कश आवाज।

5. महिला ने कवि सम्मेलन का आरंभिक चर्चा ठीक किन किंतु जल्द चली गईं। प्रभाव जो जमा सकती थीं नहीं हो सका।

6. जगदंबिका पाल और कृपाशंकर सिंह नेता के इर्द-गॉर्ड भीड़ बातें कर रही थी और मंच पर मुशायरा चल रहा था।

7. एक भी कवि अपना प्रभाव नहीं छोड़ सका न श्रोताओं से जुड़ सका। मुशायरा के अध्यक्ष ने रामायण पर अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए रामायण को कहानी बतलाया जो आपत्तिजनक था।

8. सच्चिदानंद काशी पर कम और अपनी पत्नी मालविका की चर्चा अधिक किए। काशी पर दो मिनट भी नहीं बोल पाए। सच्चिदानंद अपनी पुस्तक का लेख पढ़ रहे थे जो श्रोतागण में यह उत्सुकता नहीं जगा पाया कि ललक उत्पन्न हो। संस्मरण सुना रहे थे जो विषय के अनुरूप नहीं था।

9. सच्चिदानंद राजन-साजन मिश्र का काशी पर गीत की दो पंक्तियाँ गाये जो अच्छा प्रभाव डाला।

10. महिला ने अपने संचालन को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हुए मालिनी अवस्थी का स्वागत किया।

11. 6.30 शाम को पुरुष संचालक ने अपना ड्रेस बदल कर अच्छी वेशभूषा में हो गया। मालिनी अवस्थी का गाना चल रहा था। पुलिस के बड़े अधिकारी आ-जा रहे थे। मुख्यमंत्री के आगमन का समय हो रहा था।

12. संचालिका जो बुंदेलखंड की थीं उन्होंने संचालन का अनुपम कौशल का प्रदर्शन किया। मालिनी अवस्थी के गायन समापन के बाद मुख्य मंत्री के आगमन में लगनेवाले समय में मंच से कुछ देर तक बातें की फिर मंच से नीचे उतरकर श्रोताओं संग संवाद उनके गायन आदि की सहभागिता सम्मिलित की।

13. राजनेताओं की तथा पुलिसकर्मियों की मुख्य मंत्री की अगवानी की मुस्तैदी और व्यस्तता को देखने के बाद बाहर निकल विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर वाहन की प्रतीक्षा करने लगा। इसी दौरान मुख्यमंत्री का काफिला आता दिखा और आगे एक मोटरसाइकिल संग कुल पांच कारें गुजरी। वहां मुस्तैद एक पुलिसकर्मी ने कहा कि काफिला में कम गाड़ियां हैं।

14. मुख्यमंत्री के आने के पहले रात्रि 8 बजे सभागार से बाहर निकल गया।


बुधवार, 13 मई 2026

चाह सूरज

गूंजा आपका तराना है
भोर भाव मनमाना है
मोबाइल से नहीं  बातें
बस लिख गुनगुनाना है

कैसे आंख खुली तड़के
चाह का मन दीवाना है
पढ़ेंगी या ना पढ़ेंगी यह
सिवाय लिखने भरमाना है

भोर की सोच होती सच
शोर मन में अनजाना है
आज क्या कुछ अलग है
आह का जो फड़फड़ाना है

आज यह भोर चितचोर
मन का शोर जगमगाना है
एक ऊर्जा सी कौंध जाती
चाह सूरज सा उग जाना है।

धीरेन्द्र सिंह
14.05.2026
05.01


मंगलवार, 12 मई 2026

लेखन

देश, धर्म, संस्कृति पर रचना लिखिए
एक समूह जागरूक का अनुरोध था
पढ़कर अनुरोध चिंतन उसपर किया
रामायण, श्रीमदभगवतगीता की कथा

राष्ट्र की विभिन्न परम्पराएं हैं अनमोल
जो विगत इतिहास नहीं एक दर्पण था
सत्य के तथ्य को कथ्य में पिरोया गया
धूल में अटा दर्पण रह-रह चमक व्यथा

नींव सशक्त है निर्माण नया तो कीजिए
देश, धर्म, संस्कृति सांस में है सबके मथा
राम सा चरित्र कहां कृष्ण सी कहां कूटनीति
पीढ़ी के संचित मार्गदर्शन क्या मात्र कथा

लेखन कौशल है तो कलम योद्धा बन जाईए
समाज वही जीवित वर्तमान जिसने है मथा
नए अस्त्र-शस्त्र हैं नई हैं कई युद्धनीतियाँ
शौर्य-शक्ति जीवंत मात्र संयुक्त हों सखी-सखा

मेरा लेखन एक प्रहार है नहीं कोई चित्रहार
भावनाओं का जैविक युद्ध आज से है नधा
आपके सुझाव का आदर है प्रेरणा हैं दिए
भाषा का मूल योद्धा हूँ देश, संस्कृति में रचा।

धीरेन्द्र सिंह
13.05.2026
08.18