मंगलवार, 13 जनवरी 2026

कूद-फांद

कूद-फांद कर निनाद

जाने कौन छुपा मांद


समय बदल रहा क्या

अभय मचल रहा क्या

पिघल रहा अब विषाद

जाने कौन छुपा मांद


शब्द हैं कालिख पुते

भाव घृणा को जपे

असुरा गूंजे है निनाद

जाने कौन छुपा मांद


शब्दभेदी क्या चले बाण

एकलव्य हैं कई निष्णात

तड़पन बने धड़कन संवाद

जाने कौन छुपा मांद।


धीरेन्द्र सिंह

14.01.2026

06.18




सोमवार, 12 जनवरी 2026

परछाईं

जी रहे हैं खुल जीवन जुगत भरी चतुराई में 

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में


अपने दिल की धड़कन की चिंता सबको है

अपने खिल हो जाएं पुलकित निजता वो है

क्या-क्या रहे छुपाते जीवन की तुरपाई में

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में


यादें रंग-बिरंगी फीके प्रभाव में करें आलोड़न

पीड़ाएं दुबकाए कोने हृदय करे प्रायः प्रभु भंजन

जीवन कितना दिया -लिया पारस्परिक बहुराई में

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में


क्या समझे कितना समझे जब चिंतन हो उथले

जिसको जितना समझा जीवन वैसे थापे उपले

जीवन जोड़-घटाना कर भरी अकुलाहट रंगराई में

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में।


धीरेन्द्र सिंह

13.01.2026

14.45



शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

धारदार

शब्दों की धार पर

कामनाओं की तपन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन


स्वार्थ एकमात्र सिद्धि लगे

चाहतों का हो जतन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन


जिसकी लाठी उसकी भैंस

यह मुहावरा प्रचलित सघन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन


जनचेतना नित घायल होती

मनवेदना कलुषित उपवन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन।


धीरेन्द्र सिंह

09.01.2026

18.21

रविवार, 28 दिसंबर 2025

अस्तित्व

अकेले अस्तित्व का ही निनाद है

सत्य यह कि निजत्व का विवाद है


प्रश्रय पुंजत्व का मुग्ध पुष्पधारी पक्ष

प्रेम में दुरूहता उभरता जब यक्षप्रश्न

यथोचित उत्तर ही प्रमुख संवाद है

सत्य यह कि निजत्व का विवाद है

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

वैवाहिक यथार्थ

 विवाह लगता सामाजिक पोषण है

आधुनिकता में यथार्थ लगे शोषण है


विवाह में दहेज प्रथम सिद्ध पायदान

द्वितीय दुल्हन को बनाएं भव्य पायदान

दूल्हा के लिए परिवार भाव कुपोषण है

आधुनिकता में यथार्थ लगे शोषण है


यहां अपवाद का सम्मान से प्रशंसक हैं

जो निरपवाद है उसके निरोध अंशक हैं

तलाक अब न्यायालय में प्रति क्षण है

आधुनिकता में यथार्थ लगे धोषण है


सास के पारंपरिक समय लुप्त सिद्धांत

आधुनिक युवती सुन हो जाती आक्रांत

कालातीत लम्हों का निरंतर प्रक्षेपण है

आधुनिकया में यथार्थ लगे शोषण।है


अर्थ ही जोड़ता है अर्थ ही तोड़ता है

वैवाहिक जीवन को अर्थ ही मोडता है

प्रणय में अर्थ ही प्रथान सर्वप्रिय कण है

आधुनिकता में यथार्थ लगे शोषण है।


धीरेन्द्र सिंह

27.12.2025

21.46




शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

अधर अमृत

 अधर अमृत आगमन है अनुभूति लिए

आप अपरिचित सा मुहँ मोड़ चल दिए


प्रबल पार्श्वसंगीत परिवेश मादक कर रहा

प्रयोजन परहित का है साधक यह कह रहा

नयन के गमन में सघन आलोकित धर दिए

आप अपरिचित सा मुहँ मोड़ चल दिए


अधर आतुर आत्ममुग्ध लिए अभिव्यक्तियाँ

अगर डगर बोल उठे डोल रहीं आसक्तियां

कदम वहम छोड़कर स्वप्न सार्थक कर लिए

आप अपरिचित सा मुहँ मोड़ चल दिए


दृष्टि विशिष्ट चाहिए निरखने को अधर अमृत

शोखी पहल कर बैठे चर्चा हो गलत कृत

आप नासमझ नहीं जग को भी कह दिए

आप अपरिचित सा मुहँ मोड़ चल दिए।


धीरेन्द्र सिंह

26.12.2025

21.53




गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

जवानी

आप किससे कह दिए किसकी कहानी है

सैकड़ों की भीड़ ना उस जैसी जवानी है


एक स्वप्न का जलता दिया दिखता सिरहाने

नित चित्र शब्दों का है सिजता रंग मनमाने

गहरी निगाहों में मिलती उसकी कद्रदानी है

सैकड़ों की भीड़ ना उस जैसी जवानी है


ना समझें देह के अवयव की है यह गाथा

हृदय में उतर पाता वही यौवन देख भी पाता

एक ऊर्जा उन्मुक्त करती रहती मनमानी है

सैकड़ों की भीड़ ना उस जैसी जवानी है


उम्र की गिनतियों से यौवन का क्या लेना-देना

हृदय जब तक जीवंत स्वप्नों का रहता बिछौना

जीवन है समस्या, संघर्ष ही का आग-पानी है

सैकड़ों की भीड़ ना उस जैसी जवानी है।


धीरेन्द्र सिंह

26.12.2025

13.03



बुधवार, 24 दिसंबर 2025

निबद्ध

आप कहें शब्द या प्रारब्ध हैं

मत कहें कि आप आबद्ध हैं


एक धूरी का मैं भी तो समर्थक हूँ

पर विभिन्नता भाव का प्रवर्तक हूँ

हृदय का हृदय से अनजाना सम्बद्ध है

मन कहे कि आप आबद्ध हैं


आप तो स्वीकारती ना ही दुत्कारती

आप हृदय वाले को प्रायः संवारती

मेरे हृदय में आपकी चाहत बुद्ध है

मन कहे कि आप निबद्ध हैं


सहज संयत आपका अद्भुत संयम

मेरी पूंछें भावनाओं में उलझा जंगम

कौन जाने आपसे मेरा क्या संबंध है

मन कहे कि आप निबद्ध हैं।


धीरेन्द्र सिंह

24.12.2025

22.43





मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

दीवानगी

सत्य निष्ठा पुस्तकों की बानगी है

लक्ष्य भेदना अब की दीवानगी है


पहुंच जाना पा लेना पसारे डैना

घर से बहक जाने का चाल ले पैना

घर से दर्द उठता है भ्रम चाँदनी है

लक्ष्य भेदना अब की दीवानगी है


पति-पत्नी में पनप रहा है वैमनस्व

परिवार का कंपित हो रहा है घनत्व

अपनेपन प्यार की ना परवानगी है

लक्ष्य भेदना अब की दीवानगी है


हृदय में प्यार लहरे यही तो लक्ष्य है

घर के बाहर प्यार खोजना सत्य है

स्पंदनों में उभरती चाह रागिनी है

लक्ष्य भेदना अब की दीवानगी है।


धीरेन्द्र सिंह

24.12.2025

04.52





सोमवार, 22 दिसंबर 2025

गुदगुदी

मुझे क्यों चुलबुली सी लगती हैं

मुझे क्यों गुदगुदी सी लगती हैं 


आप संग मेरा कोई रिश्ता नहीं है

पर मन मेरा भी सिजता वहीं है

कामनाओं की हदबंदी सी लगती है

मुझे क्यों गुदगुदी सी लगती है


आप मर्यादित सागर की लहरें हैं

समाज, रिश्तों के लगे पहरे हैं

सहज पर छटपटाती सी लगती हैं

मुझे क्यों गुदगुदी सी लगती है


एक यात्रा है और एक जीवन है

हो तुरपाई पर लगे न सीवन है

सांसे दूर से बुदबुदाई सी कहती हैं

मुझे क्यों गुदगुदी सी लगती हैं


आप साफ न बोलतीं, लजजा है

मुझे मालूम संस्कार भी, छज्जा है

अपनी दीवारों में लरजती सी लगती हैं

मुझे क्यों गुदगुदी सी लगती है।


धीरेन्द्र सिंह

23.12.2025

06.44Z



रविवार, 21 दिसंबर 2025

एक प्रेम

एक प्रेम रहा उपज कहीं तुम तो नहीं

तुम बिन उपजे प्रीत वह जमीं तो नहीं


एक दौर था तूफानी रचते नई कहानी

मैं भी दीवाना था तुम भी मेरी दीवानी

आज देखा तो पाया पलटते प्यार बही

तुम बिन उपजे प्रीत वह जमीं तो नहीं


सत्य है उनमें तुमसा प्यार रिसाव ना मिला

तुम थी तो जिंदगी थी कुछ शिकवे गिला

समझौता से कभी प्यार होता है क्या कहीं

तुम बिन उपजे प्रीत वह जमीं तो नहीं


यह तथ्य है कि तुमने मेरा तिरस्कार किया

प्रणय की संवेदना का उपचार क्या किया

हर व्यक्ति की कहानी रचना मेरी ही नहीं

तुम बिन उपजे प्रीत वह जमीं तो नहीं।


धीरेन्द्र सिंह

22.12.2025

06.18




शनिवार, 20 दिसंबर 2025

गर्म लाल लाख

किसी से न बातें या झगड़े में सौ बात

घृणा दर्शाता गलत है करना ब्लॉक


न बोलना या झगड़ना दर्शाता है अपनत्व

बिन बोले ब्लॉक करना अपराध का घनत्व

ब्लॉक कर जीवन से हटा दिया दिशा हाँक

घृणा दर्शाता गलत है करना ब्लॉक


अमावस का भाव है छंट जाएगा अंधियारा

चाँदनी जिसमें दिखे कर ब्लॉक ना दुत्कारा

लड़-झगड़ मनमुटाव पर स्नेह की आँख

घृणा दर्शाता गलत है करना ब्लॉक


सम्मान समक्ष व्यर्थ पद-पैसा-पकवान

स्वाभिमान मे अपनत्व-निजत्व-तत्वज्ञान

तोड़ दिया रिश्ता टपका गर्म लाल लाख

घृणा दर्शाता गलत है करना ब्लॉक।


धीरेन्द्र सिंह

2012.2025

17.01




शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

कामना के छल

सूर्य मुझसे लिपटता है प्रसन्न मना गुनगुनाऊँ

या लोटा जल लेकर कामना के छल चढ़ाऊँ


अनेक ज्योतिषाचार्य एक दशक से रहे बोल

सूर्य को जल चढ़ाएं  उपलब्धि होगी अनमोल

सूर्य को मन प्रणाम करता सूर्योदय जब पाऊँ

या लोटा जल लेकर कामना के छल चढ़ाऊँ


सूर्य है तो सृष्टि है वहीं से ऊर्जा वृष्टि है

सूर्य सा जो तेजस्वी युग की नई दृष्टि है

सनातन में गहन डूब सत्य के समीप जाऊं

या लोटा जल लेकर कामना के छल चढ़ाऊँ


कुंडली में सूर्य कमजोर तो कैसी घबराहट

आत्म सूर्य कर प्रखर भर प्रयास गर्माहट

अंतर्मन की रश्मियों संग सूर्य ओर धाऊँ

या लोटा जल लेकर कामना के छल चढ़ाऊँ


पूजा-पाठ का भला क्यों कोई विरोध करे

पूजा-पाठ पद्धतियों में पर नव प्रयोग करें

सूर्य रश्मि स्पर्श से आशीष सूर्य का पाऊँ

या लोटा जल लेकर कामना के छल चढ़ाऊँ।


धीरेन्द्र सिंह

17-19.12.2025

22.45



बुधवार, 17 दिसंबर 2025

शब्द सार्थक

शब्द सार्थक


प्रस्फुटित हैं भावनाएं उल्लसित हैं कामनाएं

शब्द सार्थक बन रहे हैं साज हम किसको सुनाएं


शोरगुल के धूल हैं सर्जना की हर राह पसर

कौन किसको पढ़े, सुने व्यक्तिगत जो न बताएं

शब्द भर हथेली हजारों कहें यह भी जगमगाए

शब्द सार्थक बन रहे हैं साज हम किसको सुनाएं


यदि कोई मिला और शब्द उनको लगा सुनाने

कठिन हिंदी बोलते हैं, कहें सहजता को अपनाएं

शब्द भी होते कठिन, सरल क्या, समझा ना पाए

शब्द सार्थक बन रहे हैं साज हम किसको सुनाएं


वस्त्र और व्यक्तित्व को ब्रांडेड से करें परिपूर्ण

शब्द अपरिचित लगे शब्द ब्रांडेड ना अपनाएं

भाषा की विशिष्टता उसके शब्द सामर्थ्य भूले

शब्द सार्थक बन रहे हैं साज हम किसको सुनाएं।


धीरेन्द्र सिंह

17.12.2025

18.36







सोमवार, 15 दिसंबर 2025

यादें

मन ने उबालकर छान लिया है

यादों को सहेजना जान लिया है


मिल जाती हैं अशुद्धियां समय में

हो जाती यादें धूमिल ज्ञान लिया है


सब भूल पाना संभव कहां होता 

कुछ यादों ने समेट जान लिया है


एक राग बसा है मन के तारों में कहीं

कर देता उजाला वही तान लिया है


यादों की जुगलबंदी की है महफ़िल

यही इश्क़ का दरिया है मान लिया है।


धीरेन्द्र सिंह

16.12.2025

09.00



सिफर मिला मुझको

मैं कहता हूँ शब्द भावनाओं की छांव में
मैं बहता निःशब्द कामनाओं के गांव में

इन बस्तियों को देखिए जुट रहे इस कदर
दहशत पसर गयी है किसी पहचाने दांव में

मैं खड़ा रहा निहत्था थका शब्दों में ढलते
घेरे हुए समझ न सके एड़ी फटी निभाव में

प्रश्नों से घिरा मैं देता रहा उत्तर तो निरंतर
सिफर मिला मुझको इस मूल्यांकन ठाँव में

मेरे शब्द रहे असफल या प्रभाव में हलचल
पढ़ते गए गलत उलझनों की कांव-काँव में।


धीरेन्द्र सिंह
15.12.2025
20.00

शनिवार, 13 दिसंबर 2025

प्रत्यंचा

 खिंची प्रत्यंचा

प्रति व्यक्ति का यथार्थ

आज भी सत्य है

संघर्ष ही पुरुषार्थ,

मुस्कराहटें कमअक़्ली हैं

कौन जाने यथार्थ या नकली हैं

वर्तमान को व्यक्ति खेता है

मूलतः व्यक्ति अभिनेता है;


घर के संबंधों में

जुड़ाव निर्विवाद है

पर भावना कितनी कहां

इसपर मूक संवाद है,

चेतना की तलहटी पर

वेदना की फसल  झूमे

मंडी में धूम मची

यह फसल बेमिसाल है;


विज्ञापन युग कौशल में

उत्पाद ही चमत्कार है

व्यक्ति हो रहा विज्ञापित

बाजार ही आधार है,

समय प्रदर्शन का है

दर्शन तो एक प्रकार है

तरंगित सतह लगे प्रबल

तलहटी को क्या दरकार है;


घर बदल रहा रूप

गृह ऋण का संवाद है

ईएमवाई पर जीवन जीना

अधिकांश का वाद है;

चार्वाक प्रबल बोलें

"ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत"

वर्तमान की क्रिया यही

सत्य यह निर्विवाद है।


धीरेन्द्र सिंह

14.12.2025

00.53

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025

सिरफिरा

 व्यक्ति निरंतर

ऊर्जाओं से घिरा है

कभी लगता समझदार

कभी लगे सिरफिरा है,

जीवन इन्हीं ऊर्जा लहरों में

खेल रहा है

व्यक्ति ऊर्जाओं से घिरा

बेल रहा है,


प्रतिकूल परिस्थितियां

या

अनियंत्रित भावनाएं

आलोड़ित कामनाएं

किसे कैसे अपनाएं,

इन्हीं झंझावातों को

झेल रहा है

व्यक्ति आसक्तियों से घिरा

गुलेल रहा है,


भंवर में संवरने का

संघर्षमय प्रयास

अंजुली भर नदी

रेगिस्तान सी प्यास,

आस में आकाश नव

रेल रहा है

वादियां गूंज उठी

कहकहा है,


खुद को निचोड़कर

निर्मलता का प्रयास

ताशमहल निर्मित कर

सबलता का कयास,

खुद से निकल खुद को

ठेल रहा है

कारवां से प्रगति का ऐसा

मेल रहा है।


धीरेन्द्र सिंह

13.12.2025

10.59







बुधवार, 3 दिसंबर 2025

व्यक्ति

व्यक्ति जितना जीवन में संभल पाएंगे

स्वयं को और अभिव्यक्त कर पाएंगे

व्यक्ति निर्भर है किसी व्यक्ति पर ही

अकेला सोच कर व्यक्ति डर जाएंगे


हाँथ में हाँथ या कंधे पर थमा विश्वास

जुड़कर जीवनी जुगत कई कर जाएंगे

भीड़ में व्यक्ति अपनों को ही ढूंढता है

अपरिचित भीड़ भी तो व्यक्ति, कुम्हलायेंगे


निर्भरता स्वाभाविक है जीवन डगर में

मगर क्या आजन्म निर्भर रह पाएंगे

व्यक्ति आकर्षण है आत्मचेतनाओं का

वर्जनाओं में संभावनाएं तो सजाएंगे


मन है भागता कुछ अनजान की ओर

सामाजित बंधनों को कैसे तोड़ पाएंगे

तृप्त की तृष्णा में तैरती अतृप्तियां हैं

व्यक्ति भी व्यक्ति संग कितना संवर पाएंगे।


धीरेन्द्र सिंह

04.12.2025

06.51

गोवा



सोमवार, 1 दिसंबर 2025

बतकही

नहीं लिखूंगा नई रचना मन कहे नहीं

भावनाएं बोल उठीं करते हैं बतकही


अभिव्यक्तियाँ कभी भी रुकती नहीं

आसक्तियां परिवेश से हैं कटती नहीं

संभावनाएं उपजे हों घटनाएं चाहे कहीं

भावनाएं बोल उठीं करते हैं बतकही


अनुभूतियों का भावनाओं में जगमगाना

भावनाओं में अभिव्यक्तियों का कसमसाना

शब्दों में भाव घोलकर सम्प्रेषण रचें कई

भावनाएं बोल उठीं करते हैं बतकही


आदत है या ललक प्रतिदिन का लिखना

सृष्टि है स्पंदित तो कठिन है चुप रहना

कुछ उमड़-घुमड़ रहा पकड़ न पाएं अनकही

भावनाएं बोल उठीं करते हैं बतकही।


धीरेन्द्र सिंह

02.12.2025

06.13