शनिवार, 31 अक्टूबर 2026
मानवता
प्रदर्शन है दर्शन है इसी में ठेलमठेल है
मानवता अति विशिष्ट मानव उपयोगी चीज
नैतिकता गति परिशिष्ट समाज में दिखे खीज
आदर्श और सिद्धांत चर्चा के प्रचलित भेल हैं
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है
मुट्ठीभर लोग हैं जीवन उत्थान के प्रयास में
शेष व्यस्त हैं उभरती विभिन्न अपनी प्यास में
खरीद लो मानवता का हर समय का "सेल" है
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है
नई पीढ़ी रहा सीख सजग भौतिक सुख मूल्य
धर्म-कर्म भी हैं दिखते परलोक भाव अमूल्य
मनुष्यता में भी लगे मनुष्य वर्गीकृत बेमेल हैं
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है।
धीरेन्द्र सिंह
01.11.2026
06.22
शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026
नाच रे तन नाच
नाच रे तन नाच मन नाच रहा जैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे
जिंदगी उत्सवों की बेचैन प्रणाली है
मन सोच रहा क्या खनकती प्याली है
लिखा गया है जो उसे बाँच रहा कैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे
लेने को लंबित अभी फैसले बहुत हैं
मन क्यों अचंभित सिलसिले बहुत हैं
उम्र की स्लेट पर क्यों हिसाब ऐसे-तैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे
यह तन ही तो है अनुभूतियों का चितेरा
कामनाओं की धुन पर सरगमों का डेरा
मन ऊर्जा अनंत है खुद को जांच रहा कैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे।
धीरेन्द्र सिंह
31.10.2026
03.57
इतना क्या सोचना
हम भी इस तरह अब बहकने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं
भाव उठते हैं जैसे इत्रदानियाँ सजी हो
धुन सारंगी और तबले में मिल रची हो
खयाल घुंघरुओं सा अब छमकने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं
खुद की दीवानगी के फलसफे हैं निराले
ज़िंदगी गुनगुना रही है चाहत के नए प्याले
पुरवैया सा तन बहे चुप दर्द उभरने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं
यह आवारगी है या जीने का अंदाज नया
कोई बेचारगी है या बंधा नगीना साज बयां
इतना क्या सोचना दिल से जगने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं।
धीरेन्द्र सिंह
30.10.2026
19.43
बुधवार, 28 अक्टूबर 2026
विचारिए
ध्येय क्या है लिखने का यह भी विचारिए
फिर अनुभवों को अभिव्यक्ति में निखारिए
अकारण कोई भी अक्सर लिखता नहीं है
शब्दों के सुसज्ज़ा संग जो दिखता यही है
लेखन के आदर्श, सिद्धांत को निथारिए
फिर अनुभवों को अभिव्यक्ति में निखारिए
यह सुझाव नहीं शिक्षा नहीं हिंदी की पीड़ा है
लिखना छपना फिर ना दिखना हिंदी क्रीड़ा है
हिंदी भाषा में निराशा है यह कैसे है उच्चारिए
फिर अनुभवों को अभिव्यक्ति में निखारिए
जहां भी लिखते-लिखती हों वहां पर करें गौर
सभी फलदार वृक्ष वही कोई डाल हो भरे बौर
लेखन माँजिए शब्द साधिए आप तो स्वीकारिए
फिर अनुभवों को अभिव्यक्ति में निखारिए।
धीरेन्द्र सिंह
28.10.2026
16.44
सोमवार, 26 अक्टूबर 2026
देवी-देवता
जीवन और समाज के प्रति होती सबकी देयता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता
संस्कार के संसार में सुघड़ बनने का निज प्रकार
मन चाहे जिसको देना, दे जाता है जीवन आधार
नहीं वह सोचता कर्म लाभ दे स्वार्थ की उपादेयता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता
आधार किसी को तो कोई होता है परम निराधार
रचा देना सजा देना ही होता है आकर्षक श्रृंगार
कर्म की कर्मठता से समाज बनता देख योग्यता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता
इस भाव में उलझन कहां निर्मल मन से तो सोचिए
एक नहीं कई देवता मिले होंगे भूले हैं तो खोजिए
कह दूं आप देवी-देवता क्या इसमें भी कोई शक्यता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता।
धीरेन्द्र सिंह
27.10.2026
10.05
रविवार, 25 अक्टूबर 2026
कैसे चित्रकार हो
लेखन में यदि लय नहीं कैसे शब्दकार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो
यह रचनाकार पर व्यक्तिगत नहीं आक्षेप है
हिंदी लेखन सरस आसक्तिगत हो निक्षेप है
हिंदी पाठक और बढ़ें हिंदी लेखन रसदार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो
प्यार के वर्णन में क्या केवल वासना झंकार
प्यार ऊर्जा आत्मा का जीवन का है श्रृंगार
प्यार सज्जित शब्दों में जीवन भाव बहार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो
प्यार में भी तर्क है दर्शन है जीवन चिंतन है
व्यक्ति त्याग कर अकेली साधना क्या मंथन है
ईश्वर जैसा भव्य दिव्य देहधारी व्यक्ति दुलार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो।
धीरेन्द्र सिंह
26.10.2026
09.24
फिर ना आई
इल्दीहा दिल दिया बिल भी तो दिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया
खूब बातें दिल मिल बांटे ना कुछ छांटे
हृदय क्या विलय क्या होते क्या हैं नाते
उसका काम उसका नाम भाव हल्दिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया
तब खिला एकबार मिला टूटा सिलसिला
प्रणय रुग्ण भाव लगा गई थी तिलमिला
कर्म अठखेलियाँ नहीं वार्ता भाव बहा दिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया
इल्दीहा शब्द नहीं हृदय वेदना का चिंघाड़
भावना में तैरे बिना तत्क्षण प्यार लगे पहाड़
संवेदना अशिक्षित थी मिलन बिल तक जिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया ।
धीरेन्द्र सिंह
26.10.2026
08.55
शनिवार, 24 अक्टूबर 2026
जीवन
कामनाएं दौड़ रहीं पर मन तो नियंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है
सपनों के शीर्ष पर भाव सुगंधित पड़े हैं
यथार्थ में संभव नहीं सामाजिक धड़े है
पर प्रयास आस लिए बढ़ता अनियंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है
स्व को रोका है जीवन की असुविधाओं में
चाह बलवती फिर भी होती विपदाओं में
मन कहता स्वागत है हर भाव निमंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है
जीवन समझ नहीं आया बस जीवन जीते हैं
विपरीत यदि कुछ होता हंस कहते रीते है
इतना क्षद्म जीवन में राह लगे निबंधित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है।
धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
21.33
चरित्र
चरित्र के चर्चे इतने इसका न कोई चित्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र
कुछ भी न रहा गोपनीय इलेक्ट्रॉनिक गति
सुख भी हो सोचनीय तात्कालिक जो मति
बहलाना-फुसलाना भ्रमित करना छिड़क इत्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र
रामायण, महाभारत के मिलते हैं ऐसे पात्र
युग बांचता इन्हें पर लगे नासमझ सा छात्र
युगों से अपनों से छल सत्यता का नहीं जिक्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र
अपने हैं जो क्रमशः बदलते हैं ढलते जाते हैं
भीतर बना दूरी करीबी भ्रम सजा भरमाते हैं
अपनापन मित्रता भी लगे भेदक लिए फिक्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र।
धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
20.49
शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026
यौवन
देह दरबार है प्रपंच का अखबार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है
देह सरकार ना बदले रहता यह प्रयास
दिखाते देह का साम्राज्य जिम के खास
कैसे "शो केस" देह क्या बाजार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है
स्वस्थ तन अब है गठित मांसपेशियां
निरोगी कम हैं कटाव की ले युक्तियां
स्वस्थ तनमन तो प्रसन्नता का दरबार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है
दीर्घायु तक अब तो जमा रहता यौवन
रहन-सहन संयमित चयनित हैं भोजन
यौवन पर उम्र का नहीं रहता अख्तियार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है।
धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
06.22
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026
शब्द भाव - वडापाव
शब्द खींसे निपोर चल रहे ऐसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे
शब्द वड़ा सा चटक होना चाहे
भाव पाव सा नरम होना चाहे
चाह चटनी की धुन रहे कैसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे
नहीं गेहूं का आटा रहता है मैदा
वड़ा में आलू, बेसन तेल कायदा
अल्पाहार सड़क किनारे शब्द ऐसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे
शब्द की ऊष्मा सामान्य हो जाए
वडापाव गरम नहीं तो ना खा पाएं
भाषा सड़कों की लगे चिल्लर पैसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे।
धीरेन्द्र सिंह
23.10.2026
08.15
ईश्वर
प्यार की आराधना किए नहीं ईश्वरीय भक्ति में निमग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखादेखी में हैं कई मग्न
धर्म भी जलवायु अनुसार है निधारित जीवन शैली
कहीं की परम्परा मीठी लगे कहीं की लगे है कसैली
अपनी-अपनी परंपराओं के ज्ञानी-ध्यानी कई संलग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखदेखी में हैं कई मग्न
बिन भाषा शब्दार्थ समझे नित घंटों करें उसका उवाच
जीवन मनुष्य को तथ्य दर्शाता पर मानते नहीं उसे साँच
लौकिकता में भी ईश्वर परालौकिक कथ्य मिले भग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखदेखी में हैं कई मग्न
आधुनिकता में प्रकृति दूर भौतिकता के लिए हैं गरूर
पूजापाठ जितना अधिक उतने कष्ट जीवन के हों दूर
जीवन ईश्वर प्यार भक्ति है चाह समर्पण से व्यक्ति संलग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखदेखी में हैं कई मग्न।
धीरेन्द्र सिंह
22.10.2026
15.41
बुधवार, 21 अक्टूबर 2026
उम्र साठ
उम्र 60 से अधिक तनमन में स्वस्थ झंकार
कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार
प्यार गहन गगन है प्यार है गहरा जलधार
बहुत जिंदगी जीनेवाले समझें छल मझधार
पगी कल्पना दुलकी चलना बातें अपरम्पार
कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार
साठ का पाठ लिए अपना अभिनव सा ठाठ
पारदर्शिता इसमें रहती कूड़ा करकट ले छाँट
एक ठहराव पूरा निभाव नहीं कोई अधिकार
कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार
साठा सो पाठा यह सत्य सदियों से चलता है
जीवन शैली उत्तम हुई जिसमें प्यार चहकता है
स्वस्थ शरीर मन स्वस्थ अधीर मांग रहा अभिसार
कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार।
धीरेन्द्र सिंह
21.10.2026
21.31
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026
परछाई
दिल को इस तरह याद यूँ आपकी आयी
चिंहुक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं
आप बहुमूल्य हैं हृदय कह रहा है निडर
श्राप किसने दिया बाधित हुई प्रेम डगर
जिंदगी तन्मय पर अचानक कैसे भरमाई
चिहुंक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं
यह टूटे प्रेम का भाव नहीं बाधित प्रवाह
सरपट प्रवाह में उभरे कई परिचित डाह
आप लड़खड़ा समझीं अभिव्यक्ति तुरपाई
चिह्यूंक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं
किसी जीवंत व्यक्तित्व को खुद में समेटना
मस्तिष्क समझ रहा दिल में उठ रही वेदना
आप अन्य में मशगूल कैसे चेतना को निभाई
चिंहुक कर चमक उठीं आप मेरी परछाई
पुरुष हूँ दम्भ सुप्तावस्था में भी लगे प्रखर
आप से पहल ना हो तो त्यजन वह डगर
यादों में जब आप आईं भूल गया ठकुराई
चिहुंक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं।
धीरेन्द्र सिंह
29.10.2026
21.07
सोमवार, 19 अक्टूबर 2026
दशहरा
मर्यादा में जीवन के त्याग दिए कई धुन श्रावण
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण
ज्ञान, ध्यान, उत्थान के ख्यातिप्राप्य अनुरागी
शिव को अपना सिर अर्पण करनेवाला त्यागी
ऐसे योगी की सत्ता के रुग्ण कर दिए सब चाँवड़
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण
दशहरा त्यौहार है या जीवन शैली का अभिसार
दग्ध परीक्षा तन- मन कौशल का परखे श्रृंगार
घर त्यागा, सत्ता भी, पत्नी छली गई निज प्रांगड़
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण
अब भी समाज में राम सरीखे सीता जैसी दृढ़ता
रामायण सा युद्ध निरंतर हो रही पराजित मूढ़ता
हर मन राम-सीता सा अगन-गगन रघुवंश सा प्रण
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण।
धीरेन्द्र सिंह
20.10.2026
06.07
रविवार, 18 अक्टूबर 2026
दो किनारे
जैसे तैसे उड़ाते पैसे नदी धार है होता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता
चलन है मगन होकर गगन प्यार का रंगना
बाबू, सोना जैसे शब्द कहां सजनी व सजना
डुबकियां लगती कभी तिनके सा दिन होता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता
कितनों से किया प्रेम कितने "एक्स" हैं यार
प्यार का बाजारीकरण समावेश कहां है प्यार
धड़कन की तड़पन में चाह श्रृंगार नहीं होता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता
विवाह बंधन और प्यार हो यह है बात पुरानी
प्यार बुखार है चढ़ता-उतरता तन से बेईमानी
मन विकल्प है तलाशता अवसरों को देता न्योता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता।
धीरेन्द्र सिंह
19.10.2026
05.13
यह कैसा प्रमाणपत्र ?
यह कैसा प्रमाणपत्र ?
प्रमाणपत्र
विद्यार्थियों को
उनकी योग्यता को
प्रमाणित कर विद्यालय द्वारा
दिया जाता है
पर
कुछ हिंदी समूह भी
प्रमाणपत्र बांट रहे
ना जाने किस योग्यता से
जांच रहे;
कौन हैं
ऐसे प्रमाणपत्र देनेवाले,
क्या मानक हैं ?
किसी को
कुछ नहीं मालूम
बस
प्रमाणपत्र बंट रहे नियमित,
यह और कुछ नहीं
समूह विशेष का
विपणन है
और समूह के
कुछ प्रमुख का
स्व-विज्ञापन,
व्यक्ति की
श्रेष्ठता साबित करना
हिंदी जगत का
लाइलाज रोग है,
यदि इस रुग्ण प्रथा को
बंद नहीं किया जा सकता
तो वंचित रखें
मेरी रचनाओं को
प्रमाणपत्र के अनावश्यक बोझ से,
रचना वह होती हैव
जो प्रशंसा, समीक्षा, टिप्पणी की
अभिलाषी तो है पर
किसी भी स्तर के
प्रमाणपत्र की निर्मोही है।
धीरेन्द्र सिंह
18.10.2026
19.52
शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026
हौसले
खुरच-खुरच कर दीवारों को नए रंग के लिए
हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए
आदतें नई संवरती हैं यदि होता है प्रजातंत्र
आए दिन मुनादी होती है मिल गया नया मंत्र
एक हंगामा कई तख्तियों का प्रबंध लिए
हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए
दीवारें शक्ति हैं शौर्य है बतौर सिरमौर हैं
खुरचना प्रजातंत्र का कहें परिष्कृत तौर है
हुजूम झूमकर झंकार करे उमंग के लिए
हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए
बदल देंगे चेहरा सभी दीवार के प्रकार का
भोजन में प्रमुख वही ऐसी सोच है अचार का
नई सोच नएं मुद्दे कहां ढूंढे प्रपंच के लिए
हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए।
धीरेन्द्र सिंह
17.10.2026
03.13
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026
शस्त्र
शोषक और शोषित
इसी से जग पोषित
मानव का इतिहास
युद्ध, संघर्ष की बात
असत्य है नहीं रोपित
इसी से जग पोषित
कर्म और भाग्य लड़ें
उदाहरण हैं कई पड़े
कर्म रथ होता भूपति
इसी से जग पोषित
शस्त्र ही में शास्त्र है
शास्त्र शस्त्र क्षात्र है
शस्त्र विहीन शोषित
इसी से जग पोषित
कोई भी नहीं निहत्था
भ्रमित करते हैं जत्था
सौम्य रहें लगे रोषित
इसी से जग पोषित।
धीरेन्द्र सिंह
16.10.2026
06.09
बुधवार, 14 अक्टूबर 2026
हिंदी समूह
बंधकर जीनेवाले
जीते जाते हैं जीवन
बंधकर, अनुकरण कर
जहां एक निर्धारित
गति होती है
स्वीकार्य चलन की
सहमति होती है
जहां अविष्कार नहीं होते
परिष्कार होते हैं;
परंपराएं नहीं करतीं प्रयोग
सुयोग से जो प्राप्त
उसीका है योग
परिवर्तन करो तो
बोल पड़ेंगे लोग;
फेसबुक अधिकांश समूह
भेड़चाल चल रहे हैं
उससे मेरा बेहतर समूह
हर हाल कह रहे हैं,
दस-पन्द्रह लिखनेवाले
हर समूह में हैं लिखते
अपना बड़ा सा फोटो लगा
हर समूह यही दिखते;
समूहों की होती मंथर गति
सदस्यों की संख्या दर्शाने की रीति
प्रयोगधर्मिता को नहीं अपनाते
अपनी ताल ठोक-पीटकर
समूह को हांकते हुए चलाते।
धीरेन्द्र सिंह
14.10.2026
17.59
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