रविवार, 21 नवंबर 2021

इंसानियत

 भावों से भावना का जब हो विवाद

तथ्य तलहटी से तब गंभीर संवाद

उचित लगे या अनुचित कृत्य वंशावली

आस्थाओं की गुम्बद से हो निनाद


धुंध भरी भोर में दब जाती रोशनी

सूरज भी ना उभर पाए ले प्रखरवाद

अपेक्षाएं चाहें सुरभित, सुगंधित सदा

संभव है क्या जी पाना बिन प्रतिवाद


प्रकृति की तरह व्यवहार लगे परिवर्तित

तथ्य रहे सदा अपरिवर्तित निर्विवाद

यह कहना कि वक़्त का है खेल यह

इंसानियत यूँ ही कब हो सकी आबाद।

धीरेन्द्र सिंह

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