खिल उठती हैं सूर्य सी नर्म रश्मियां
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ
कल्पनाओं की मंथर गति किल्लोल
धड़कनों में उभरते हैं नए मीठे बोल
लिख देता हूँ भावनाओं की गश्तियाँ
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ
कितना स्वाभाविक लगे अलसाया बदन
चाँद-तारे नहीं बस मैं और अकेला गगन
बहुत कुछ छिपा लेता बदन पाकर चुस्तियाँ
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ
निढाल सोई सोचती होंगी उठती हूँ
आपकी कामनाएं भी बहकती होंगी
एक अंगड़ाई में चल पड़ें दिन कश्तियाँ
भोर में अलसाये बदन की मस्तियाँ।
धीरेन्द्र सिंह
22.05.2026
05.45
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