गूंजा आपका तराना है
भोर भाव मनमाना है
मोबाइल से नहीं बातें
बस लिख गुनगुनाना है
कैसे आंख खुली तड़के
चाह का मन दीवाना है
पढ़ेंगी या ना पढ़ेंगी यह
सिवाय लिखने भरमाना है
भोर की सोच होती सच
शोर मन में अनजाना है
आज क्या कुछ अलग है
आह का जो फड़फड़ाना है
आज यह भोर चितचोर
मन का शोर जगमगाना है
एक ऊर्जा सी कौंध जाती
चाह सूरज सा उग जाना है।
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