बुधवार, 13 मई 2026

चाह सूरज

गूंजा आपका तराना है
भोर भाव मनमाना है
मोबाइल से नहीं  बातें
बस लिख गुनगुनाना है

कैसे आंख खुली तड़के
चाह का मन दीवाना है
पढ़ेंगी या ना पढ़ेंगी यह
सिवाय लिखने भरमाना है

भोर की सोच होती सच
शोर मन में अनजाना है
आज क्या कुछ अलग है
आह का जो फड़फड़ाना है

आज यह भोर चितचोर
मन का शोर जगमगाना है
एक ऊर्जा सी कौंध जाती
चाह सूरज सा उग जाना है।

धीरेन्द्र सिंह
14.05.2026
05.01


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