शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

देह मिलन

देह से देह मिलन भी एक जतरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है

कितनी देह करती नित अपनी पूजा
स्वयं का श्रृंगार का आधार नहीं दूजा
स्वयं सुशोभित सज्जित नहीं नखरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है

साहित्य यह पक्ष प्रखर दर्शाता नहीं
ऐसा लगे प्रचुर श्रृंगार इसे भाता नहीं
प्रणय तो पूजा है प्रकृति में पसरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है

दूर से लगता आकर्षण अति चुम्बकीय
नयन लहक उठे महक उठे चहक हिय
घटाएं घिर आएं बदन लगे कि बदरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है।

धीरेन्द्र सिंगज
25.04.2026
11.15


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