कोरा कागज ही दिल तो रहता है
जब कोई दिलदार मिल जाता है
नई अनुभूतियों के स्पंदन से उभर
नए कोने से नया फूल खिल जाता है
शुरू होती हैं शालीनभरी सूक्तियाँ कई
शब्द, भाषा में भी चमक-दमक आता है
भाव के अर्थ कई निकालता है नित मन
एक अनजाना भी करीब कैसे आता है
प्यार बस एक बार ही होता है अर्धसत्य
तथ्य जीवन के परिणाम नए लाता है
मन अनुरूप मिल जाती अभिव्यक्तियाँ तो
एक गुलाबी सा आवरण सा छा जाता है
हो सायास कुछ प्रयास नई कोशिश भी
तर्ज तब फ़र्ज़ बन खुदगर्ज हो जाता है
अब इसे भाव समझें या कि असभ्यता
खिलता है मन तो दीवाना सा कह जाता है।
धीरेन्द्र सिंह
20.02.2026
06.45
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