मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

तड़के

आप मेरे मन में

होती हैं उदित कई बार

जैसे सागर से उभरे

सूर्य लिए ऊर्जा द्वार


तर्क की कसौटियां लुभावनी

भावना तो बयार पावनी

आप भी पुरवैया झोंका

सुगंध की लिए कतार


मन में उभरे लिए छटाएं

भाल तक पहुंच गुनगुनाएं

स्पंदित हो जगे सहस्त्रधार

यही है आपके उभरने का बयार


तड़के खुली पलकें था प्रकाश

मन आलोकित सत्य करता तलाश

आप उभरें मन तत्पर करे करार

कल्पनाओं को करे कौन स्वीकार।


धीरेन्द्र सिंह

18.02.2026

04.46


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