आप मेरे मन में
होती हैं उदित कई बार
जैसे सागर से उभरे
सूर्य लिए ऊर्जा द्वार
तर्क की कसौटियां लुभावनी
भावना तो बयार पावनी
आप भी पुरवैया झोंका
सुगंध की लिए कतार
मन में उभरे लिए छटाएं
भाल तक पहुंच गुनगुनाएं
स्पंदित हो जगे सहस्त्रधार
यही है आपके उभरने का बयार
तड़के खुली पलकें था प्रकाश
मन आलोकित सत्य करता तलाश
आप उभरें मन तत्पर करे करार
कल्पनाओं को करे कौन स्वीकार।
धीरेन्द्र सिंह
18.02.2026
04.46
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