सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

छोड़ जाता हूँ

अपने लिए जो रचता हूँ

जुड़ खूब उससे सजता हूँ

लचकती डाल सा मोड़ लेता हूँ

फिर वह रचना छोड़ देता हूँ


नित संपर्कियों को पढ़ता हूँ

उत्कर्ष हो ध्येय लेकर रचता हूँ

भटकते भाव लेकर ओढ़ लेता हूँ

फिर वह रचना छोड़ देता हूँ


प्रतिष्ठा को कनिष्ठा सा समझता हूँ

निष्ठा को समझ ऊर्जा दहकता हूँ

अगन के दहन में दिए जोड़ लेता हूँ

फिर वह रचना छोड़ देता हूँ


न छोडूं तो कैसे जी सकता हूँ

अटक जाऊं धीमी आंच पकता हूँ

निरन्तर नित नया रच दौड़ जाता हूँ

फिर वह रचना छोड़ जाता हूँ।


धीरेन्द्र सिंह

17.02.2026

10.31

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

प्रतिकार

अस्वीकार जब तिरस्कार हो

बिन बोले तब धिक्कार हो

मुहँ मोड़ना होता है तभी

जब संचित घड़ा प्रतिकार हो


तत्क्षण का विरोध अस्थाई

रोष संग यह साथ निभाई

अनियंत्रित उठता गुबार हो

जब संचित घड़ा प्रतिकार हो


अपनापन कोई भेद न माने

ऊंच-नीच हो जाय अनजाने

आकर देहरी अस्वीकार हो

जब संचित घड़ा प्रतिकार हो


अर्थ का अनर्थ निकाला जाए

भाव कलुषता डाल भड़काए

जब छूटता लगे अधिकार हो

जब संचित घड़ा प्रतिकार हो।


धीरेन्द्र सिंह

14.02.2026

16.09


मंगलवार, 13 जनवरी 2026

कूद-फांद

कूद-फांद कर निनाद

जाने कौन छुपा मांद


समय बदल रहा क्या

अभय मचल रहा क्या

पिघल रहा अब विषाद

जाने कौन छुपा मांद


शब्द हैं कालिख पुते

भाव घृणा को जपे

असुरा गूंजे है निनाद

जाने कौन छुपा मांद


शब्दभेदी क्या चले बाण

एकलव्य हैं कई निष्णात

तड़पन बने धड़कन संवाद

जाने कौन छुपा मांद।


धीरेन्द्र सिंह

14.01.2026

06.18




सोमवार, 12 जनवरी 2026

परछाईं

जी रहे हैं खुल जीवन जुगत भरी चतुराई में 

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में


अपने दिल की धड़कन की चिंता सबको है

अपने खिल हो जाएं पुलकित निजता वो है

क्या-क्या रहे छुपाते जीवन की तुरपाई में

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में


यादें रंग-बिरंगी फीके प्रभाव में करें आलोड़न

पीड़ाएं दुबकाए कोने हृदय करे प्रायः प्रभु भंजन

जीवन कितना दिया -लिया पारस्परिक बहुराई में

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में


क्या समझे कितना समझे जब चिंतन हो उथले

जिसको जितना समझा जीवन वैसे थापे उपले

जीवन जोड़-घटाना कर भरी अकुलाहट रंगराई में

और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में।


धीरेन्द्र सिंह

13.01.2026

14.45



शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

धारदार

शब्दों की धार पर

कामनाओं की तपन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन


स्वार्थ एकमात्र सिद्धि लगे

चाहतों का हो जतन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन


जिसकी लाठी उसकी भैंस

यह मुहावरा प्रचलित सघन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन


जनचेतना नित घायल होती

मनवेदना कलुषित उपवन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन।


धीरेन्द्र सिंह

09.01.2026

18.21

रविवार, 28 दिसंबर 2025

अस्तित्व

अकेले अस्तित्व का ही निनाद है

सत्य यह कि निजत्व का विवाद है


प्रश्रय पुंजत्व का मुग्ध पुष्पधारी पक्ष

प्रेम में दुरूहता उभरता जब यक्षप्रश्न

यथोचित उत्तर ही प्रमुख संवाद है

सत्य यह कि निजत्व का विवाद है

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

वैवाहिक यथार्थ

 विवाह लगता सामाजिक पोषण है

आधुनिकता में यथार्थ लगे शोषण है


विवाह में दहेज प्रथम सिद्ध पायदान

द्वितीय दुल्हन को बनाएं भव्य पायदान

दूल्हा के लिए परिवार भाव कुपोषण है

आधुनिकता में यथार्थ लगे शोषण है


यहां अपवाद का सम्मान से प्रशंसक हैं

जो निरपवाद है उसके निरोध अंशक हैं

तलाक अब न्यायालय में प्रति क्षण है

आधुनिकता में यथार्थ लगे धोषण है


सास के पारंपरिक समय लुप्त सिद्धांत

आधुनिक युवती सुन हो जाती आक्रांत

कालातीत लम्हों का निरंतर प्रक्षेपण है

आधुनिकया में यथार्थ लगे शोषण।है


अर्थ ही जोड़ता है अर्थ ही तोड़ता है

वैवाहिक जीवन को अर्थ ही मोडता है

प्रणय में अर्थ ही प्रथान सर्वप्रिय कण है

आधुनिकता में यथार्थ लगे शोषण है।


धीरेन्द्र सिंह

27.12.2025

21.46