याद आने के लिए अनुमति जरूरी नहीं
ब्लॉक करके भी क्या ब्लॉक कर पाएंगे
झोंका हवा का जहां चाहे पहुंच जाता है
इस पहुंच से भला कब तक दूर जाएंगे
अपनी करवटों में लिए कुनमुनाती बेचैनियां
अपनी हरकतों में कितना छुपा पाएंगे
छुपाने से भला कब तक छुपा पाया कोई
मुहाने तक पहुंचने को चुपचाप धाएंगे
मन गगन में दहन है अनमन तड़पन कहे
आग मद्धम ना बुझे सुनिए जल जाएंगे
महकती रिमझिम सावन का है आमंत्रण
जो जिए संग वह तरंग रह उमंग जिलाएंगे
ब्लॉक एक भ्रम है क्रम में है यह चलन
किशोर मानसिकता में भाव उलझाएंगे
टूटकर भी जुड़ जाते हैं बादल छंट जाते
अंधियारे जग में कितने जुगनु लुभाएंगे।
धीरेन्द्र सिंह
04.06.2026
12.17