शनिवार, 13 जून 2026

महुआ

महुआ सी चू गयी आप पसरी मादकता
प्रभाव आपका या मन उड़ान अधिकता
सम्मोहन की होती अनेक परिभाषाएं भी
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता






चिहुंका था मन पाकर महुआ का वह गंध
प्रस्फुटित चेतना में भाव कहे तर्क लगे दंग
महुआ की धरा से गुरुत्वाकर्षण की समीपता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता

आदिवासियों से अतिवादियों तक है बड़ी चमक
चेतना के तारों को करती झंकृत है तड़ी धमक
सत्य हो निगाह की या भाव की यह यांत्रिकता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता

इसी पेड़ पर या किसी मेड़ पर चू जाता है महुवा
राह को प्रदीप्त कर विक्षिप्तता मिटाता है महुवा
आप महुवा हैं हर लेती दर्द, विषाद की मौलिकता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता।

धीरेन्द्र सिंह
13.06.2026
22.03



रविवार, 7 जून 2026

सुनो

सुनो कुछ लिखो तुमको पढ़ता रहूं
इश्क़ को खासकर मन में गढ़ता रहूं

जब तुम कहती हो बहती हो बन नदी
प्रवाह की तरंग में निभाव की खुदबुदी
भींगे तट पर पांव नंगे धुन बढ़ता रहूं
इश्क़ को खासकर मन में गढ़ता रहूं




शनिवार, 6 जून 2026

धुन

आज में डूबकर उम्र जीते रहें

अपनी धुन में ही रहा कीजिए
मुग्ध होकर कई सुन रहें आपको
जैसे कहते हैं अक्सर कहा कीजिए




क्यों चुपचाप हैं बोलते पदचाप हैं
सुननेवाले कहें भाव बहा दीजिए
मिलते पागल भी हैं जिंदगी में बहुत
शब्द की चांदनी को गढ़ा कीजिए

जिससे टूटे हैं वह रह गए हैं कहीं
जख्म सूखे पल्लवन हरा कीजिए
हो रही है घुटन लंबी खामोशी से
नज़्म टूटे हुए हैं दवा दीजिए

आपकी खातिर लिख रहा है हृदय
स्वर में अपने इसे गुनगुना लीजिए
शब्द की बानगी को धुन तो दीजिए
फिर आपकी मर्जी जितनी सजा दीजिए।

धीरेन्द्र सिंह
07.06.2026
08.25


शुक्रवार, 5 जून 2026

तथ्य

तथ्य मैला हो रहा है
सत्य बना है अनुभागी
कथ्य की सीमाएं निर्धारित
जीवन लगता बैरागी







न्यायालय की ओर बढ़ें
अधिवक्ता हैं विधि रागी
भोर चाँद उदय प्रमाणित
सूर्य रात्रि गति साधी

प्रजातंत्र का मंत्र लगे टूटा
जनतंत्र बन रहा खुराफाती
भ्रष्टाचार आचार बन रहा
जमुना हों या जुमेराती

कौन रचा ऐसा समाज
जहां देखें वहां प्रतिवादी
अन्तरघर्षण बना आकर्षण
बिन दूल्हे के बाराती।

धीरेन्द्र सिंह
06.06.2026
07.05


बुधवार, 3 जून 2026

ब्लॉक भ्रम

याद आने के लिए अनुमति जरूरी नहीं

ब्लॉक करके भी क्या ब्लॉक कर पाएंगे
झोंका हवा का जहां चाहे पहुंच जाता है
इस पहुंच से भला कब तक दूर जाएंगे

अपनी करवटों में लिए कुनमुनाती बेचैनियां
अपनी हरकतों में कितना छुपा पाएंगे
छुपाने से भला कब तक छुपा पाया कोई
मुहाने तक पहुंचने को चुपचाप धाएंगे

मन गगन में दहन है अनमन तड़पन कहे
आग मद्धम ना बुझे सुनिए जल जाएंगे
महकती रिमझिम सावन का है आमंत्रण
जो जिए संग वह तरंग रह उमंग जिलाएंगे

ब्लॉक एक भ्रम है क्रम में है यह चलन
किशोर मानसिकता में भाव उलझाएंगे
टूटकर भी जुड़ जाते हैं बादल छंट जाते
अंधियारे जग में कितने जुगनु लुभाएंगे।

धीरेन्द्र सिंह
04.06.2026
12.17





शुक्रवार, 29 मई 2026

बर्तन

 बर्तन टकराते हैं
जब भी छुआ जाए

टकराना बर्तन स्वभाव है
या कमजोर संयोजन
आजकल इसपर ही उद्बोधन
रसोई जल रही है

बर्तनों का विभाजन
आवश्यकता भी अनिवार्यता भी
प्रायः कहते हैं
कांच के बर्तन, नक्काशीदार बर्तन
टकराते हैं, टूटते हैं
बिखर जाते हैं,
चुभता है यह बिखरना
इन बर्तन रूपी पात्र का,

नई व्यवस्था के अंतर्गत
बनाये जा रहे हैं
मॉड्यूलर किचन, जिसमें
विभाजित है विभिन्न बर्तनों
रसोई उपयोगी वस्तुओं का खाना
रसोई व्यवस्थित हो तो
पकवान लगे रोज खाना,

रसोई में हो रहा है
वास्तु की दृष्टि से सुधार
भारतीय मसालों, घी से
आपूरित रसोई
गाय दुग्ध से कर रही
स्वयं को अन्नपूर्णा
और सुदूर गांव में भी
मॉड्यूलर किचन सी आहट है।

धीरेन्द्र सिंह
30.05.2026
07.34


गुरुवार, 28 मई 2026

क्यों कीजिये

हर भाव में निभाव जतन कीजिये
दहन को वहन आप क्यों कीजिये

कुछ सुन रहे कुछ पढ़ रहे जो मिला
क्या सत्य क्या असत्य लगे अधखिला
परिवर्तन है नर्तन ताल अपनी दीजिए
दहन को वहन आप क्यों कीजिये

कहने को लोग कहते कई दुश्वारियां
धन धान्य हेतु सिंचित हो हर क्यारियां
इतिहास दे रहा संकेत त्यों कीजिये
दहन को वहन आप क्यों कीजिये

संघर्ष का विकास में है अपना काम
वर्तमान सजाने में प्रमुख भी है नाम
शिलालेखों की अशुद्धियां नव कीजिये
दहन को वहन आप क्यों कीजिये।

धीरेन्द्र सिंह
29.05.2026
08.02