हर भाव में निभाव जतन कीजिये
दहन को वहन आप क्यों कीजिये
कुछ सुन रहे कुछ पढ़ रहे जो मिला
क्या सत्य क्या असत्य लगे अधखिला
परिवर्तन है नर्तन ताल अपनी दीजिए
दहन को वहन आप क्यों कीजिये
कहने को लोग कहते कई दुश्वारियां
धन धान्य हेतु सिंचित हो हर क्यारियां
इतिहास दे रहा संकेत त्यों कीजिये
दहन को वहन आप क्यों कीजिये
संघर्ष का विकास में है अपना काम
वर्तमान सजाने में प्रमुख भी है नाम
शिलालेखों की अशुद्धियां नव कीजिये
दहन को वहन आप क्यों कीजिये।
धीरेन्द्र सिंह
29.05.2026
08.02