हर व्यक्ति अपनी छांव का गांव है
जहां आसक्ति अभिव्यक्ति का निभाव है
मन की भूमि पर कई नई उगती फसलें
कामनाओं की मंडियों में भाव हैं उजले
बेचने-खरीदने का ही सबका स्वभाव है
जहां आसक्ति अभिव्यक्ति का निभाव है
मस्तिष्क के ट्रैक्टर से काम सब हो रहा
भावना की बदलियों से सब सिंचित हो रहा
समाज की विविधताओं का दबाव है
जहां आसक्ति अभिव्यक्ति का निभाव है
भीड़ की आदत है पर स्वभाव चाह अकेला
स्वयं की तलाश में जीवन का है कई खेला
बढ़ सका व्यक्ति शक्ति उसके ही पांव हैं
जहां आसक्ति अभिव्यक्ति का निभाव है।
धीरेन्द्र सिंह
18.09.2026
07.19