जमीन जिद कर सादगी की है बात कह रही
धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रहीं नदी
व्योम के रंग में परिवर्तन का हो रहा प्रयास
भीड़ यह नई लग रही प्रयोजन हैं कुछ खास
दिन समीक्षक बन रही बोल कैसी रही सदी
धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रही नदी
चप्पुओं का बहुत जोर है जल में भी शोर है
उजाले के समक्ष लौ कहे उसका अंजोर है
असमंजस में किनारा क्यों चर्चित शताब्दी
धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रही नदी
जनभाषा बीच मुखर हो उठी वीडियो भाषा
सबकुछ ढल जाता अनुरूप जैसी हो आशा
क्या सत्य क्या असत्य मच रही है खुदबुदी
धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रही नदी।
धीरेन्द्र सिंह
10.41
08.10.2026