कौन टूटा, कौन रूठा जग की यह बात है
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है
साथ चलता कौन है यह लोकप्रिय भ्रम है
भीड़ हो या नाते-रिश्ते पसरे बहुत वहम हैं
कौन छूछा, कौन भूखा सदियों के हालात हैं
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है
चल रहे अकेले अनुभूति कहे सब साथ हैं
लक्ष्य भिन्न-भिन्न हैं लगे एकलाक्षीय बारात है
कौन लूटा, कौन झूठा जग में यही चर्चा नाद है
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है
विश्व यह माया है सबसे झूठी यह काया है
स्वार्थ जहां थम गया ठौर वही मन भाया है
कौन अनूठा, कौन अटूटा चलता यही विवाद है
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है।
धीरेन्द्र सिंह
25.09.2026
05.30