गुरुवार, 18 जून 2026

क्या कमी है

नयनों में नमी है कहिए क्या कमी है
कुछ दर्द है उलझा या खिसकी जमीं है 




यह सोच रोज पसरती है लेकर जिंदगी
कोई न कोई उलझता इसमें पा हुड़दंगगी
सभी गुजरते हैं इससे खुशियां तो गमी है
कुछ दर्द है उलझा या खिसकी जमीं है

नयनों को यदि कहें आत्मचेतना से निरखो
सपनों को यदि कहें विवेचना में न उलझो
आत्मबल यदि हो जागृत तो हौवा, आदमी है
कुछ दर्द है उलझा या खिसकी जमीं है

नयन बन सघन करते नित उपवन मनन
मन छनन-छनन चाहे लिपट उपवन मगन
नयन और मन बहुभाव स्वभाव बहुरंगी हैं
कुछ दर्द है उलझा या खिसकी जमीं है।

धीरेन्द्र सिंह
19.06.2026
08.38

बुधवार, 17 जून 2026

धमाल तुम बवाल

भोर तड़के जो टूटी नींद क्या करार धरूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ



मन है ढूंढता उस टूटे हुए क्षण की धमक
खिली थी जिंदगी महकती बहकती चमक
अब भी क्या छूटा जिसपर न अख्तियार करूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ

पौ फटी नहीं पसरा हुआ सन्नाटा है पुरजोर
न जानूं प्रीत आश्रित है सामाजिक गठजोड़
उभर आई हो चेतना में क्यों न अभिसार करूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ

न फोन न चैटिंग न वीडियो कॉल हो रहा है
जो कट गया छंट गया यह काल कह रहा है
कपाल में धमाल तुम बवाल आओ सत्कार करूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ।

धीरेन्द्र सिंह
18.06.2026
05.02


मंगलवार, 16 जून 2026

बांध दी चोटियाँ

भोर को मुट्ठी में पकड़ बांध दी चोटियां
शोर पवन का उठा उभर पड़ीं घाटियां
मेघ मुस्कराते रोके सूर्य रश्मियां सगरी
आप ही पुलक प्रातः करा दीं मुनादियाँ






मद्धम अंधियारा छाया मंथर चहचआहट
मंदिरों के पट खुले अधर मंत्र युक्तियां
आभामंडल आपकी करे सहज आकर्षित
अर्चनाएं नव सृजित कई प्रबल आसक्तियां

भोर की शरारत है सहज मुट्ठी विराजित
मेघ का सहयोग है मिली सूर्यरश्मियां
एक चाहत बिन आहट कर रही थपथपाहट
भोर कलरव उठ रहा है देख नव नीतियां।

धीरेन्द्र सिंह
16.06.2026
16.36


सोमवार, 15 जून 2026

भ्रष्ट

देश भ्रष्ट है या कि समाज भ्रष्ट है
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है




यही कथ्य है सत्य के स्वरूप सधा
नेपथ्य में क्या हो रहा कहीं से नधा
सदा में अनुगूंज वही पर अस्पष्ट है
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है

सत्य मार्ग की प्रचलित हैं परिभाषाएं
गौरव के जो प्रतीक वहीं शीश नवाएं
बौद्धिकता वस्तु बनी तर्क कष्ट है
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है

एकल है व्याकुल गति जिसकी ढुलमुल
समाज है गुरुकुल प्रीत जिसकी थुलथुल
देश है संघर्षरत समूह पड़े तटस्थ हैं
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है।

धीरेन्द्र सिंह
15.06.2026
18.29


रविवार, 14 जून 2026

क्यों

ऑनलाइन समूह परिचित हो कामना नहीं
मैंने जो लिखा लोग सराहें यह याचना नहीं
क्यों भेजूं मित्र अनुरोध होता इसमें है क्षोभ
रचना है यदि आकर्षक प्रशंसक मांगना नहीं




 

मन कहे वही लिखें भाव का निभाव सींचें
अन्य लेखन स्वभाव से अक्सर सामना नहीं
बुन रहा है जिंदगी को अनवरत अथक मन
भावनाओं के बुनकर को अनर्थक जागना नहीं

छप गया तो क्या हुआ कितनों ने है छुआ
इधर छापो उधर बांटों नहीं लेखकीय साधना
नहीं कागज कलम अभ्यस्त टाइपिंग रखे मस्त
लिख दिया पोस्ट हुआ भाव महके मन आँगना

जब अपरिचित लाइक या करते हैं प्रतिक्रिया
लेखन होता प्रोत्साहित जैसे दधि जामना
झुंड में हुडदंग बस आपसी क्षद्म प्रशंसा तंत्र
साधना एकल है होती जिससे भाव जागना।

धीरेन्द्र सिंह
15.06.2026
07.45



शनिवार, 13 जून 2026

महुआ

महुआ सी चू गयी छाप पसरी मादकता
प्रभाव आपका या मन उड़ान अधिकता
सम्मोहन की होती अनेक परिभाषाएं भी
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता





चिहुंका था मन पाकर महुआ का वह गंध
प्रस्फुटित चेतना में भाव कहे तर्क करे दंग
महुआ की धरा से गुरुत्वाकर्षण की समीपता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता

आदिवासियों से अतिवादियों तक है बड़ी चमक
चेतना के तारों को करती झंकृत है कड़ी धमक
सत्य हो निगाह की या भाव की यह यांत्रिकता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता

इसी पेड़ पर या किसी मेड़ पर चू जाता है महुवा
राह को प्रदीप्त कर विक्षिप्तता मिटाता है महुवा
आप महुवा हैं हर लेती दर्द हमदर्द की मौलिकता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता।

धीरेन्द्र सिंह
13.06.2026
22.03





रविवार, 7 जून 2026

सुनो

सुनो कुछ लिखो तुमको पढ़ता रहूं
इश्क़ को खासकर मन में गढ़ता रहूं

जब तुम कहती हो बहती हो बन नदी
प्रवाह की तरंग में निभाव की खुदबुदी
भींगे तट पर पांव नंगे धुन बढ़ता रहूं
इश्क़ को खासकर मन में गढ़ता रहूं