शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

धारदार

शब्दों की धार पर

कामनाओं की तपन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन


स्वार्थ एकमात्र सिद्धि लगे

चाहतों का हो जतन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन


जिसकी लाठी उसकी भैंस

यह मुहावरा प्रचलित सघन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन


जनचेतना नित घायल होती

मनवेदना कलुषित उपवन

विचार भी चलें कैसे

धारदार हुई जो अगन।


धीरेन्द्र सिंह

09.01.2026

18.21

रविवार, 28 दिसंबर 2025

अस्तित्व

अकेले अस्तित्व का ही निनाद है

सत्य यह कि निजत्व का विवाद है


प्रश्रय पुंजत्व का मुग्ध पुष्पधारी पक्ष

प्रेम में दुरूहता उभरता जब यक्षप्रश्न

यथोचित उत्तर ही प्रमुख संवाद है

सत्य यह कि निजत्व का विवाद है

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

वैवाहिक यथार्थ

 विवाह लगता सामाजिक पोषण है

आधुनिकता में यथार्थ लगे शोषण है


विवाह में दहेज प्रथम सिद्ध पायदान

द्वितीय दुल्हन को बनाएं भव्य पायदान

दूल्हा के लिए परिवार भाव कुपोषण है

आधुनिकता में यथार्थ लगे शोषण है


यहां अपवाद का सम्मान से प्रशंसक हैं

जो निरपवाद है उसके निरोध अंशक हैं

तलाक अब न्यायालय में प्रति क्षण है

आधुनिकता में यथार्थ लगे धोषण है


सास के पारंपरिक समय लुप्त सिद्धांत

आधुनिक युवती सुन हो जाती आक्रांत

कालातीत लम्हों का निरंतर प्रक्षेपण है

आधुनिकया में यथार्थ लगे शोषण।है


अर्थ ही जोड़ता है अर्थ ही तोड़ता है

वैवाहिक जीवन को अर्थ ही मोडता है

प्रणय में अर्थ ही प्रथान सर्वप्रिय कण है

आधुनिकता में यथार्थ लगे शोषण है।


धीरेन्द्र सिंह

27.12.2025

21.46




शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

अधर अमृत

 अधर अमृत आगमन है अनुभूति लिए

आप अपरिचित सा मुहँ मोड़ चल दिए


प्रबल पार्श्वसंगीत परिवेश मादक कर रहा

प्रयोजन परहित का है साधक यह कह रहा

नयन के गमन में सघन आलोकित धर दिए

आप अपरिचित सा मुहँ मोड़ चल दिए


अधर आतुर आत्ममुग्ध लिए अभिव्यक्तियाँ

अगर डगर बोल उठे डोल रहीं आसक्तियां

कदम वहम छोड़कर स्वप्न सार्थक कर लिए

आप अपरिचित सा मुहँ मोड़ चल दिए


दृष्टि विशिष्ट चाहिए निरखने को अधर अमृत

शोखी पहल कर बैठे चर्चा हो गलत कृत

आप नासमझ नहीं जग को भी कह दिए

आप अपरिचित सा मुहँ मोड़ चल दिए।


धीरेन्द्र सिंह

26.12.2025

21.53




गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

जवानी

आप किससे कह दिए किसकी कहानी है

सैकड़ों की भीड़ ना उस जैसी जवानी है


एक स्वप्न का जलता दिया दिखता सिरहाने

नित चित्र शब्दों का है सिजता रंग मनमाने

गहरी निगाहों में मिलती उसकी कद्रदानी है

सैकड़ों की भीड़ ना उस जैसी जवानी है


ना समझें देह के अवयव की है यह गाथा

हृदय में उतर पाता वही यौवन देख भी पाता

एक ऊर्जा उन्मुक्त करती रहती मनमानी है

सैकड़ों की भीड़ ना उस जैसी जवानी है


उम्र की गिनतियों से यौवन का क्या लेना-देना

हृदय जब तक जीवंत स्वप्नों का रहता बिछौना

जीवन है समस्या, संघर्ष ही का आग-पानी है

सैकड़ों की भीड़ ना उस जैसी जवानी है।


धीरेन्द्र सिंह

26.12.2025

13.03



बुधवार, 24 दिसंबर 2025

निबद्ध

आप कहें शब्द या प्रारब्ध हैं

मत कहें कि आप आबद्ध हैं


एक धूरी का मैं भी तो समर्थक हूँ

पर विभिन्नता भाव का प्रवर्तक हूँ

हृदय का हृदय से अनजाना सम्बद्ध है

मन कहे कि आप आबद्ध हैं


आप तो स्वीकारती ना ही दुत्कारती

आप हृदय वाले को प्रायः संवारती

मेरे हृदय में आपकी चाहत बुद्ध है

मन कहे कि आप निबद्ध हैं


सहज संयत आपका अद्भुत संयम

मेरी पूंछें भावनाओं में उलझा जंगम

कौन जाने आपसे मेरा क्या संबंध है

मन कहे कि आप निबद्ध हैं।


धीरेन्द्र सिंह

24.12.2025

22.43





मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

दीवानगी

सत्य निष्ठा पुस्तकों की बानगी है

लक्ष्य भेदना अब की दीवानगी है


पहुंच जाना पा लेना पसारे डैना

घर से बहक जाने का चाल ले पैना

घर से दर्द उठता है भ्रम चाँदनी है

लक्ष्य भेदना अब की दीवानगी है


पति-पत्नी में पनप रहा है वैमनस्व

परिवार का कंपित हो रहा है घनत्व

अपनेपन प्यार की ना परवानगी है

लक्ष्य भेदना अब की दीवानगी है


हृदय में प्यार लहरे यही तो लक्ष्य है

घर के बाहर प्यार खोजना सत्य है

स्पंदनों में उभरती चाह रागिनी है

लक्ष्य भेदना अब की दीवानगी है।


धीरेन्द्र सिंह

24.12.2025

04.52