भोर को मुट्ठी में पकड़ बांध दी चोटियां
शोर पवन का उठा उभर पड़ीं घाटियां
मेघ मुस्कराते रोके सूर्य रश्मियां सगरी
आप ही पुलक प्रातः करा दीं मुनादियाँ
मद्धम अंधियारा छाया मंथर चहचआहट
मंदिरों के पट खुले अधर मंत्र युक्तियां
आभामंडल आपकी करे सहज आकर्षित
अर्चनाएं नव सृजित कई प्रबल आसक्तियां
भोर की शरारत है सहज मुट्ठी विराजित
मेघ का सहयोग है मिली सूर्यरश्मियां
एक चाहत बिन आहट कर रही थपथपाहट
भोर कलरव उठ रहा है देख नव नीतियां।
धीरेन्द्र सिंह
16.06.2026
16.36





