घने वृक्ष संग सघन पत्तियों की छांव में
जल्दी सोना तड़के उठना होता गांव में
शाम छह बजे अंधियारे का होता साम्राज्य
गतिविधियां धीमी होतीं फिर सन्नाटा विराज्य
युवा विस्थापित हो रहे मुद्रा अर्जन भाव में
जल्दी सोना तड़के उठना होता गांव में
अर्धरात्रि बीते खुल जाती पलकें अलसायी
घड़ी बोलती डेढ़ बजे हैं नींद क्यों उकताई
कितने करवट कितने सिलवट निद्रा निभाव में
जल्दी सोना तड़के उठना होता गांव में
बिजली का उजियारा है सुप्त परिवेश सारा है
दिन भी खाली-खाली अति मंथर पांव पसारा है
खेत-खलिहान बिक रहे हैं खरीददार उसी ठाँव में
जल्दी सोना तड़के उठना होता गांव में।
धीरेन्द्र सिंह
13.10.2026
04.05