अस्वीकार जब तिरस्कार हो
बिन बोले तब धिक्कार हो
मुहँ मोड़ना होता है तभी
जब संचित घड़ा प्रतिकार हो
तत्क्षण का विरोध अस्थाई
रोष संग यह साथ निभाई
अनियंत्रित उठता गुबार हो
जब संचित घड़ा प्रतिकार हो
अपनापन कोई भेद न माने
ऊंच-नीच हो जाय अनजाने
आकर देहरी अस्वीकार हो
जब संचित घड़ा प्रतिकार हो
अर्थ का अनर्थ निकाला जाए
भाव कलुषता डाल भड़काए
जब छूटता लगे अधिकार हो
जब संचित घड़ा प्रतिकार हो।
धीरेन्द्र सिंह
14.02.2026
16.09
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