शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

भोर आज छू गई

भोर आज छू गई हौले से
मुस्कराई दूब पर फैली नमी
चहचहाती चिड़ियों का वृंद गान
खिल गई है छटामयी ज़मीं

झूमती डालियों में नेह निमंत्रण
यादें संग हैं बस आपकी ही कमी
लालिमा लगा इतरा रह है आसमान
दौड़ गले आकर मिली धूप कुनकुनी

मंदिरों की घंटियॉ और मस्ज़िदों के अजान
दे रहे आशीष अनुपम प्रार्थनाएं हैं जमीं
नयन बने दीप मेरे आज प्रात:
नैवेद्य लिए गति मेरी है थमी

जाग उठा परिवेश ले अपना भेष
ज़िंदगी की लयबद्धता हो रही घनी
प्रीत का पग दौड़ चला उस ओर
ठौर है तुम्हारा जहां अहसास रेशमी.



भावनाओं के पुष्पों से,हर मन है सिज़ता
अभिव्यक्ति की डोर पर,हर धड़कन है निज़ता,
शब्दों की अमराई में,भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई मे,एक तड़पन है निज़ता.

4 टिप्‍पणियां:

  1. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 01- 02- 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  2. dhirender ji......sach me..bhor ka bahut pyara roop...aur kunkunii dhoop choo gyi...bdhaayi
    take care

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  3. बहुत ही सजीव शब्द चित्र..बहुत सुन्दर..सचमुच को भोर आज छू गयी..

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