रविवार, 27 सितंबर 2026

उम्र का ढक्कन

प्रणय की लौ पर उम्र का ढक्कन लगा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है



लौ न बुझती उम्र दहकता बहकता बेचैन
पौ न फटती प्रीत की उमड़ते घुमड़ते नैन
कौन बांधा प्रीत सरणी सांस में यौवन बंधा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है

कह रहे उम्र बड़ी पूजा-पाठ भजन की घड़ी
चेतनाएं चुलबुली हो चाहती लगन की अड़ी
प्यार में ईश्वर नहीं क्या भक्ति का दोहन लगा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है

अंकल आंटी, दादा-दादी सुदूर की जैसे घाटी
जीवन हलचल मुक्त हुए सन्यास की है परिपाटी
हृदय उम्र से दूर लपक-लचक धुन अगन मचा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है।

धीरेन्द्र सिंह
28.09.2026
07.02

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें