शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

मन

कब झांका व्यक्ति दिल से मन के उपवन में
नित्य नया सूर्य उगता करता उजियारा मन में



सूर्य मात्र ऊर्जा नहीं दर्शाता सभी दिशा है
उपद्रव, उत्पात, उफनती सक्रिय निशा है
दिल है सब समझता पर व्यक्ति करता दमन है
नित्य नया सूर्य उगता करता उजियारा मन है

मन अति विशाल गहरा मात्र झांक सकते हैं
उपवन सुगंधित रंग-बिरंगा माँज सकते हैं
इतना प्राकृतिक वैभव फिर कैसे उभरता दहन है
नित्य नया सूर्य उगता करता उजियारा मन है

मन के उपवन में व्यक्ति जब उन्मुक्त घूमता
नभ की ऊंचाइयों में तब सत्य को चूमता
मन धरा-गगन मन पुलकित चंचल चितवन है
नित्य नया सूर्य उगता करता उजियारा मन है।

धीरेन्द्र सिंह
05.09.2026
07.22

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

कृष्ण

सृजन की वेदना कब समसीतोष्ण है
मनन जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं

उकेरी भावनाओं में मौलिकता नही मिलती
संकरी कामनाएं हो तो भौतिकता कहीं मिलती
जीवन है प्रवाह जहां सब लगते तृष्ण हैं
मनन जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं

जन्म से किए अनुभव संघर्ष और वेदना
कुछ जिए कुछ जताए जिंदगी की चेतना
जैसे देखें हैं दिखते क्या बहुरूपिया मृण हैं
मनन जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं

आराधना संग साधना की कामना है जरूरी
भक्ति उद्भव स्वयं का नहीं कभी मजबूरी
भवसागर में बहता हर जीव मात्र तृण है
मानव जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं।

धीरेन्द्र सिंह
04.09.2026
08.38


सोमवार, 31 अगस्त 2026

भावनाएं

आप शब्द हैं अभिव्यक्ति हैं आसक्ति हैं
स्वीकारिए या नकारिये आपकीं मर्जी
दिल भावनाओं का चितेरा है एक आम सा
बुनता है कल्पनाएं सिलता जैसे दर्जी






उम्र की उलझनें मष्तिष्क की कतरनें है बोलती
जीवन है भिन्न-भिन्न अनेक प्रकार की खुदगर्जी
जियो तो ऊष्मा सकारात्मकता है चहुँओर फैला
अन्यथा उलझनें, चुनौतियां अनुभूति की सर्दी

तर्क क्या है समाज रचित एक परिकल्पना 
मर्म क्या है निजता जड़ित एक युग्म अर्जी
व्यक्ति भावुकता को छोड़ दुनिया की सोचता
व्यक्ति है कहाँ सम्पूर्ण टुकड़ों में भाव दर्जी

सुगंध का एक चितेरा पर कहीं दूर बसेरा
जीवन का यही क्रम कहां टूटी कहीं लरजी
क्या खूब दबाया है संस्कार में जीवन भी
जब अवसर मिला चाहतें क्या खूब हैं गरजी।

धीरेन्द्र सिंह
31.08.2026
16.42



रविवार, 30 अगस्त 2026

मनुष्य की बात

उपलब्धियों पर मुस्कराहटों के उपहार
परिलब्धियों में टूटा बिखरा, लिया संवार
जो देख रहे वह नहीं अंतिम सत्य है
सूखे से लगते जख्म देते अक्सर चिंघाड़






सब ठीक है कह देना आदत बन गयी
ठीक भी है कहाँ कुछ देख रहा संसार
असफलताएं, विवशताएं हैं खूब सताएं
किस-किस से करे व्यक्ति अच्छा व्यवहार

भौतिक सुख साधनों से खुशियां नापते
हृदय संवेदना की बातें करते बस गंवार
भावशून्यता से प्राप्त कर रहे हैं अपने लक्ष्य
भावनाएं हाशिये पर पाकर अपनों से दुत्कार

बौद्धिकता कौन पूछता "चैट-जीपीटी" तो है
इंटरनेट बना मस्तिष्क संभावनाएं अपार
प्रौद्योगिकी तकनीक ही सच्चा लगता मीत
व्यक्ति खो रहा है व्यक्ति या कारण दुर्व्यवहार।

धीरेन्द्र सिंह
05.58