शनिवार, 25 अप्रैल 2026
उलझन
अपने विश्व की उलझन में दगा दे देना
अपने विश्व में भी हैं आधे-अधूरे व्यक्तित्व
क्षद्म व्यवहार रूप भी तो लगे बहुरूपिया
गजब लिखते हैं
गजब लिखते हैं सरकार जी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी
भावनाओं की हो पल्लवित फुनगिया
कामनाएं खिलें लेकर विचार दुनिया
अभिव्यक्तियाँ जैसे हवन विचार घी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी
मेरे हर लेखन की ऊर्जा हैं पाठक
सबकी अपनी शैली लेखन जातक
पाठक-पाठिका रचना रत्नहार जिय
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी
यह रचना प्रतिक्रिया का प्रभाव
प्रतिक्रिया मस्तक रखना स्वभाव
आप महत्वपूर्ण सत्कार करे जी
प्रतिक्रिया आपकी गंगाधार जी।
धीरेन्द्र सिंह
25.04.2026
21.52
शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026
देह मिलन
देह से देह मिलन भी एक जतरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है
कितनी देह करती नित अपनी पूजा
स्वयं का श्रृंगार का आधार नहीं दूजा
स्वयं सुशोभित सज्जित नहीं नखरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है
साहित्य यह पक्ष प्रखर दर्शाता नहीं
ऐसा लगे प्रचुर श्रृंगार इसे भाता नहीं
प्रणय तो पूजा है प्रकृति में पसरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है
दूर से लगता आकर्षण अति चुम्बकीय
नयन लहक उठे महक उठे चहक हिय
घटाएं घिर आएं बदन लगे कि बदरा है
गंध-दुर्गंध मिलने का जहां खतरा है।
धीरेन्द्र सिंगज
25.04.2026
11.15
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)