गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026
ईश्वर
प्यार की आराधना किए नहीं ईश्वरीय भक्ति में निमग्न
धर्म भी जलवायु अनुसार है निधारित जीवन शैली
कहीं की परम्परा मीठी लगे कहीं की लगे है कसैली
अपनी-अपनी परंपराओं के ज्ञानी-ध्यानी कई संलग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखदेखी में हैं कई मग्न
बिन भाषा शब्दार्थ समझे नित घंटों करें उसका उवाच
जीवन मनुष्य को तथ्य दर्शाता पर मानते नहीं उसे साँच
लौकिकता में भी ईश्वर परालौकिक कथ्य मिले भग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखदेखी में हैं कई मग्न
आधुनिकता में प्रकृति दूर भौतिकता के लिए हैं गरूर
पूजापाठ जितना अधिक उतने कष्ट जीवन के हों दूर
जीवन ईश्वर प्यार भक्ति है चाह समर्पण से व्यक्ति संलग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखदेखी में हैं कई मग्न।
धीरेन्द्र सिंह
22.10.2026
15.41
बुधवार, 21 अक्टूबर 2026
उम्र साठ
उम्र 60 से अधिक तनमन में स्वस्थ झंकार
कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार
प्यार गहन गगन है प्यार है गहरा जलधार
बहुत जिंदगी जीनेवाले समझें छल मझधार
पगी कल्पना दुलकी चलना बातें अपरम्पार
कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार
साठ का पाठ लिए अपना अभिनव सा ठाठ
पारदर्शिता इसमें रहती कूड़ा करकट ले छाँट
एक ठहराव पूरा निभाव नहीं कोई अधिकार
कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार
साठा सो पाठा यह सत्य सदियों से चलता है
जीवन शैली उत्तम हुई जिसमें प्यार चहकता है
स्वस्थ शरीर मन स्वस्थ अधीर मांग रहा अभिसार
कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार।
धीरेन्द्र सिंह
21.10.2026
21.31
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026
परछाई
दिल को इस तरह याद यूँ आपकी आयी
चिंहुक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं
आप बहुमूल्य हैं हृदय कह रहा है निडर
श्राप किसने दिया बाधित हुई प्रेम डगर
जिंदगी तन्मय पर अचानक कैसे भरमाई
चिहुंक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं
यह टूटे प्रेम का भाव नहीं बाधित प्रवाह
सरपट प्रवाह में उभरे कई परिचित डाह
आप लड़खड़ा समझीं अभिव्यक्ति तुरपाई
चिह्यूंक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं
किसी जीवंत व्यक्तित्व को खुद में समेटना
मस्तिष्क समझ रहा दिल में उठ रही वेदना
आप अन्य में मशगूल कैसे चेतना को निभाई
चिंहुक कर चमक उठीं आप मेरी परछाई
पुरुष हूँ दम्भ सुप्तावस्था में भी लगे प्रखर
आप से पहल ना हो तो त्यजन वह डगर
यादों में जब आप आईं भूल गया ठकुराई
चिहुंक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं।
धीरेन्द्र सिंह
29.10.2026
21.07
सोमवार, 19 अक्टूबर 2026
दशहरा
मर्यादा में जीवन के त्याग दिए कई धुन श्रावण
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण
ज्ञान, ध्यान, उत्थान के ख्यातिप्राप्य अनुरागी
शिव को अपना सिर अर्पण करनेवाला त्यागी
ऐसे योगी की सत्ता के रुग्ण कर दिए सब चाँवड़
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण
दशहरा त्यौहार है या जीवन शैली का अभिसार
दग्ध परीक्षा तन- मन कौशल का परखे श्रृंगार
घर त्यागा, सत्ता भी, पत्नी छली गई निज प्रांगड़
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण
अब भी समाज में राम सरीखे सीता जैसी दृढ़ता
रामायण सा युद्ध निरंतर हो रही पराजित मूढ़ता
हर मन राम-सीता सा अगन-गगन रघुवंश सा प्रण
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण।
धीरेन्द्र सिंह
20.10.2026
06.07
रविवार, 18 अक्टूबर 2026
दो किनारे
जैसे तैसे उड़ाते पैसे नदी धार है होता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता
चलन है मगन होकर गगन प्यार का रंगना
बाबू, सोना जैसे शब्द कहां सजनी व सजना
डुबकियां लगती कभी तिनके सा दिन होता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता
कितनों से किया प्रेम कितने "एक्स" हैं यार
प्यार का बाजारीकरण समावेश कहां है प्यार
धड़कन की तड़पन में चाह श्रृंगार नहीं होता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता
विवाह बंधन और प्यार हो यह है बात पुरानी
प्यार बुखार है चढ़ता-उतरता तन से बेईमानी
मन विकल्प है तलाशता अवसरों को देता न्योता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता।
धीरेन्द्र सिंह
19.10.2026
05.13
यह कैसा प्रमाणपत्र ?
यह कैसा प्रमाणपत्र ?
प्रमाणपत्र
विद्यार्थियों को
उनकी योग्यता को
प्रमाणित कर विद्यालय द्वारा
दिया जाता है
पर
कुछ हिंदी समूह भी
प्रमाणपत्र बांट रहे
ना जाने किस योग्यता से
जांच रहे;
कौन हैं
ऐसे प्रमाणपत्र देनेवाले,
क्या मानक हैं ?
किसी को
कुछ नहीं मालूम
बस
प्रमाणपत्र बंट रहे नियमित,
यह और कुछ नहीं
समूह विशेष का
विपणन है
और समूह के
कुछ प्रमुख का
स्व-विज्ञापन,
व्यक्ति की
श्रेष्ठता साबित करना
हिंदी जगत का
लाइलाज रोग है,
यदि इस रुग्ण प्रथा को
बंद नहीं किया जा सकता
तो वंचित रखें
मेरी रचनाओं को
प्रमाणपत्र के अनावश्यक बोझ से,
रचना वह होती हैव
जो प्रशंसा, समीक्षा, टिप्पणी की
अभिलाषी तो है पर
किसी भी स्तर के
प्रमाणपत्र की निर्मोही है।
धीरेन्द्र सिंह
18.10.2026
19.52
सदस्यता लें
संदेश (Atom)