मंगलवार, 28 जुलाई 2026

कहाँ हो

तुम मुझसे ख़फ़ा होकर दगा दे गई
मंज़िल का ना पता क्या सदा दे गई

गूंज है अनुगूंज है दूरस्थ की सूझ है
पुंज भावनाओं का परिणाम अबूझ है
नाराजगी भी ऐसी कैसी अदा दे गई
मंजिल का ना पता क्या सदा दे गई

पलकों में नमी है तुम्हारी ही कमी है
अलकों में सितारों की महफ़िल जमी है
अनुभूतियां आसक्ति की वफ़ा दे गई
मंजिल का ना पता क्या सदा दे गई

कुछ कहती कुछ सताती हैं यह सदाएं
तुम कहाँ हो कैसे दिल का हाल बताएं
जीवन के राग बीच धुन धता दे गई
मंजिल का ना पता क्या सदा दे गई।

धीरेन्द्र सिंह
29.07.2026
06.49

आज

तथ्य कह रहा है कि सत्य नाराज है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है



सच में बदल रहा या हवा का है बदलाव
टहनियों को रहे काट दौड़-भाग रहा छांव
परिवर्तन की लहर है या परितृप्त साज है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है

कितना जटिल है जो है को बदल देना
फट जाता कहीं दूध बना लेते हैं छेना
युक्तियों की सूक्तियाँ भी लाजवाब हैं
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है

सघन को सहन का वहन करना ही होगा
दहन की तपन में यूँ ना कहीं जलना होगा
समझिए न मनुष्य का प्रखर कितना ताप है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है।

धीरेन्द्र सिंह
28.07.2026
21.15

अस्तित्व

कुछ गीत गुनगुनाइए प्रतीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो



जीवंतता केवल श्वासों का नहीं सरगम
सुगंधता कर्मों का श्वास मिश्रण रहे हरदम
एक धुन, एक लय का मोहक मीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो

हर क्षेत्र के यहां हैं विभिन्न उन्नत धुरंधर
हर नेत्र में बसा है नए लक्ष्य का समुंदर
कुछ करना ऐसा समाज की नई रीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो

सहजता से कहीं रहना अकर्मण्यता लगे
पलकें खुलीं हों जिसकी क्या हैं वह जगे
आकर्षक हो, अनूठा हो जगी प्रीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो।

धीरेन्द्र सिंह
28.07.2026
13.33

रविवार, 26 जुलाई 2026

जेन-जी और भाषा

जेन-जी हुजूम जंतर-मंतर परिवर्तनीय ले जिज्ञासा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा



प्रजातंत्र में विरोध भी तो है एक मौलिक अधिकार
पर भाषा में शब्द चयन बतलाते हैं व्यक्ति संस्कार
असामाजिक असभ्य शब्द से क्या टूटती निराशा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा

वस्त्र की आजादी है अभिव्यक्ति की भी स्वतंत्रता
जेन-जी आप न भूलिए आप भारत देश के नियंता
आप पर निर्भर देश है आप ही हैं सबकी नव आशा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा

संयोजन, आयोजन में जेन-जी है अति तेज प्रखर
पर यह क्या लक्ष्य प्राप्ति हेतु अशोभनीय शब्द डगर
भाषा से झुक गयी आशा जेन-जी क्यों की तमाशा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा।

धीरेन्द्र सिंह
27.07.2026
08.28

शनिवार, 25 जुलाई 2026

त्रिभुजी पत्रकार

त्रिभुज का अपना विशेष महत्व है जो दर्शाता है कि जिस को से भी देखी जाए उर्ध्वगामी ही दिखती है। पत्रकार यदि त्रिभुजी रूप में कार्यरत रहते हैं तो वह सामाजिक चेतना को विभिन्न आयाम देते हैं जिससे समाज यथोचित प्रगति, सहमति और प्रदर्शन कर पाता है। त्रिभुज का एक दूसरा रूप भी है जिसमें पंख पसारे व्योम को चूमने या लक्ष्य को भेदने की अभिलाषा नजर आती है। डॉ अरविंद सिंह को मैंने हमेशा त्रिभुजी के रूप में ही पाया है। त्रिभुजी पत्रकार के प्रमुख तीन अंग होते हैं सत्य के संग, सामान्य जनता की ओर तथा नएपन की उपलब्ध संसाधनों में पहचान। 

त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह अपने पत्रकारिता जीवन में सत्य का साथ पकड़कर समय-समय पर सत्य का साथ दिया। पत्रकारिता में सत्य को दस्तावेजी रूप देने के लिए इन्होंने "सामयिक ब्लिट्ज" नामक साप्ताहिकी का प्रकाशन वाराणसी से आरम्भ किया। यहां त्रिभुजी पत्रकारिता का एक पक्ष "सत्य" प्रमाणित हो रहा है। दूसरा पक्ष है सामान्य जनता की ओर बढ़ना। यहां सामान्य जनता की विभिन्न परिभाषाएं हो सकती हैं किंतु यदि वाराणासी को ध्यान में रखकर सामान्य जनता की पहचान की जाए तो ग्रामीण जनों का पक्ष प्रमुख रहेगा। इस पक्ष को प्रमाणित करता है त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह का नियमित अपने साप्ताहिकी "सामयिक ब्लिट्ज" को निःशुल्क कुछ गांव को उपलब्ध कराना। प्रसंगवश उल्लेख किया जा रहा है कि ग्रामीण साप्ताहिकी की प्रतीक्षा उत्सुकतापूर्वक करते हैं। उपलब्ध संसाधनों में नएपन का प्रमाण इस त्रिभुजी पत्रकार के वाराणसी में आयोजित विभिन्न कार्यक्रम तथा अनेक मंदिर निर्माण, गरीबोंनको भोजन एवं कंबल आदि वितरण से जुड़ा है।

वाराणसी के स्पंदनों को जितनी कुशलता से इस त्रिभुजी पत्रकार ने अपनी पुस्तकों में समेटा है ऐसा उदाहरण वर्तमान में कहीं देखने को नहीं मिल रहा है। प्रत्येक अच्छे और बड़े काम में एक धुन होती है लय होती है जिसके आधार पर कार्यों में लयबद्धता बनी रहती है। यदि इन त्रिभुजी पत्रकार महोदय की धुन की बात करें तो वह हैं वाराणसी के सांसद  और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी तथा लय है विशेषकर वाराणसी के समग्र विकास गति। पिछले कुछ वर्षों से लगातार पुस्तकों का प्रकाशन वाराणसी के पल-पल, छिन-छिन का पारदर्शी दस्तावेज सा है। यह पुस्तक पत्रकार की डायरी की त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह के काशी के प्रति समर्पण और अनुराग को दर्शाता है। यह पुस्तक भी एक पारदर्शी दस्तावेज की तरह है। 

धीरेन्द्र सिंह

कवि और ब्लॉगर

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

रिश्ते

रिश्तों की डोर में न मिलता ओर-छोर
भोर जिंदगी का बंदगी करे भी तो क्या
सूर्य किरणें जगाती सजाती हैं निसदिन
पक्षियों की चहचआहट लगे क्या नया






संवेदनाएं सिमट रहीं चिमटी से उगें भाव
कामनाएं टिड्डी दल मन के फसल का क्या
प्रतियोगिता में स्वार्थ का समय-समय हवन
धुआं उठता बहुत घनेरा हवा का इसमें क्या

इंटरनेट से ही प्रायः अपनों से होती भेंट
दरवाजे पर दें दस्तक द्वार खुल रहा क्या
दो-तीन दिन ठहर लिए तो वर्ष भर छुट्टी
बर्तन को कोई साझा अब कर रहा है क्या

यह प्रवाह है समय का जय-जय तो कीजिए
एक उम्र चुकाने का समय रह गया ही क्या
ढल जाना समय संग जैसे उड़ती चले पतंग
रुख मोड़ने की जिद में कुछ मिल सका है क्या।

धीरेन्द्र सिंह
25.07.2026
08.16

डायरी क्यों

 डायरी क्यों

एक स्वाभाविक प्रश्न सहज ही इस पुस्तक के प्रबुद्ध पाठक के मन में उभर सकता है कि पत्रकार की डायरी क्यों ? इसे कदापि न स्वीकारा जाए कि इस पुस्तक के लेखक व पत्रकार की यह कोई निजी डायरी है। सामान्यतया प्रत्येक पत्रकार की अपनी डायरी होती है जिसके आधार पर वह पत्रकारिता को गतिशील बनाने में होता है। यदि इस पुस्तक विशेष की बात की जाए तो यह डायरी सार्वजनिक जीवन के सार्वजनिक समाचार का सार्वजनिक हित सूचक है। ज्ञातव्य है कि प्रत्येक पत्रकार की अपनी डायरी होती है किंतु कभी-कभी ऐसे व्यक्तित्व का प्रादुर्भाव होता है कि एकल व्यक्तित्व आधारित डायरी निर्मित हो जाती है।

"माँ गंगा ने बुलाया है" यह आस्थापूर्ण वाक्य भारतीय जनमानस के पटलनपर एक चेहरा उभरता है जिसे विश्व नरेंद्र मोदी के नाम से पहचानता है। काशी में इतना प्रबल, प्रखर और प्रियग्राही वाक्य गंगा तट पर नहीं गूंजा था। इसे वाक्य कहना भी इस वाक्य में निहित आस्था, सम्मान और समर्पण के प्रति न्यायोचित नहीं होगा। यह एक वाक्यबनाहीं बल्कि वाराणसी के लिए विशेष तौर पर एक सूक्ति बन गया था जो अब भी बनारस की हवाओं में गूंज रहा था। यहीं से पत्रकार दृष्टिकोण ने चेताया कि अब काशी में कुछ अति विशिष्ट होने की प्रबल संभावनाएं है। पत्रकारिता धर्म ने नरेंद्र मोदी को वाराणासी में गहनता से समझना और प्रत्येक गतिविधियों को सहेजना आरम्भ किया और निर्मित हो गयी पत्रकार की डायरी जो आपके समक्ष प्रस्तुत है।

डायरी की यह प्रस्तुति धरा पर गंगा अवतरण के उल्लेख के बिना अपूर्ण कहा जा सकता है। भगीरथ या भागीरथ की घोर तपस्या और दृढ़ निश्चय के बल पर ब्रह्मा के सुझाव पर शंकर ने अपनी जटा के द्वारा गंगा के असाधारण वेग को नियंत्रित कर धरा पर प्रवाहित किया। जटा जो वर्तमान में बुद्धिबल और दृष्टिकोण बल के समानार्थी है उसका प्रदर्शन नरेंद्र मोदी ने काशी में किया। इस बल के परिणामस्वरूप वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर का ही निर्माण नहीं हुआ बल्कि अयोध्या में राम मंदिर भी अपनी भव्यता और दिव्यता के साथ पुनर्स्थापित हुआ। यदि कहा जाए कि सनातन धर्म के लिए नरेंद्र मोदी का प्रयास भगीरथ प्रयास था तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

इसे योगायोग कहा जाए या सुखद संयोग कि जिस कुल में भगीरथ का जन्म हुआ वही कुल इस पुस्तक के लेखक का भी है। परंपराओं के गौरव का उल्लेख हर कोई करता है इसलिए प्रसंगवश इस तथ्य का भी उल्लेख किया गया। गंगा सदियों से काशी से सटी हुई गतिमान हैं किंतु नरेंद्र मोदी के वाराणसी का सांसद बनने के बाद जो अभिमान काशी को हुआ है वह भगीरथ प्रयास ही तो है। बनारसी साड़ी की तरह नरेंद्र मोदी काशी को नए धागे से बुनते और संवारते गए जिससे भारत देश ही नहीं बल्कि विश्व का भी ध्यानाकर्षण हुआ। बदला हुआ आकर्षक काशी पहले से बहुत अधिक लोगों को आकर्षित कर रही है। तमिल संगमम के द्वारा उत्तर भारतौर दक्षिण भारत के बीचेक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक पुल निर्मित करना नरेंद्र मोदी की ही दूरदर्शिता है।

समय कभी टूटता नहीं है बल्कि वह परिवर्तित होता है नए रंग और ढंग में और निरंतर गतिमान रहता है। इस गतिमान समय पर काशी की मूल प्रवृत्ति को बरकरार रखते हुए नई चित्रकारी कर देना नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्तित्व के लिए ही संभव है। बनारस नरेंद्र मोदी को नव रचयिता के रूप में भी जानता है। एक पत्रकार घटित लगभग सभी घटनाओं का साक्षी होता है। तथ्य ही नहीं बल्कि सत्य आधारित तथ्य को समाज के समक्ष प्रस्तुत करना पत्रकार का धर्म है। एक पत्रकार की दृष्टि जब समाज और उसके परिवेश में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की सफल उपलब्धियों का क्रम निर्मित करता है तब कहीं जाकर एक पत्रकार की डायरी सजती है। उल्लेखनीय है कि गंगा और शिव आधारित काशी है जिसे नरेंद्र मोदी ने संवारा है अतएव भगीरथ, शिव, गंगा, विश्वनाथ धाम, अयोध्या का राम मंदिर आदि डायरी के प्रेतक ऊर्जा हैं। आपके समक्ष इस डायरी को प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता हो रही है।

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

निर्मुक्त हो जीवन

आस जब तुम्हारी है प्यास जब तुम्हारी है
कहो क्यों न करूँ मैं फिर तुम्हारी अर्चना
सृष्टि जब दुलारी है दृष्टि की जब लयकारी है
कहो क्यों न हृदय तब करे मुग्धित गर्जना






शक्ति की सब करें अर्चना अद्भुत है सर्जना
पुष्प, दीप यही सब सीख क्यों नही हो कामना
ध्यान का ही गान चलता जीवन है इसमें पलता
कहो क्यों न हो व्यथित कथित का हो सामना







स्वयं को बांधकर अभिलाषाएं बांटकर गतिशील
कहो क्यों न करूं में फिर बंधनों का मर्दना
सत्य हो तुम शिष्ट हो पर एक परिशिष्ट हो
कहो क्यों न नव पृष्ठ रचूं लेकर प्रखर रचना







कठिन नहीं शब्द हैं भाव भी नहीं हैं स्तब्ध
कहो फिर क्यों न गढूं शब्द निहित अभ्यर्थना
बोलती ही तुम कितनी संतुलन के बाद भी
उन्मुक्त जीवन के लिए निर्मुक्त हो जीवन व्यंजना।







धीरेन्द्र सिंह
24.07.2026
05.49
x

मंगलवार, 21 जुलाई 2026

पथिक हूँ

मैं ही कारवां, मैं ही गति, मैं ही पथिक हूँ
संघर्ष है, समस्या हैं किंतु मस्त व्यथित हूँ




जग जाग रहा लगता पर प्रायः उनींदा है
दृग ताक रहा अक्सर पर स्वप्न सरीखा है
कुछ कर्म कुछ भाग्य से लगता समर्थित हूँ
संघर्ष है, समस्या है किंतु मस्त व्यथित हूँ

जो भी जुड़ा चलता रहा कुछ रिश्ते चुरा
निरपेक्ष मैं रहा पर कह गया मुझको बुरा
मैं जैसा था वैसा हूँ वह कहते परिवर्तित हूँ
संघर्ष है, समस्या है किंतु मस्त व्यथित हूँ

कांटे नहीं तो गुलाब की परिकल्पना कठिन
बांटे नहीं तो श्वासों की अभ्यर्थना मलिन
शुचिता से जी रहा हूँ समाधान समर्पित हूँ
संघर्ष है, समस्या है किंतु मस्त व्यथित हूँ।

धीरेन्द्र सिंह
22.07.2026
08.37

सोमवार, 20 जुलाई 2026

स्वीकार्य जिंदगी

समझकर भी नासमझ सी है कार्य बंदगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी




जुड़े हुए हैं जो कुछ मुड़े भी लगते वो
अपनेपन की भावना में रहता जीवन बो
सब कुछ सहज हो जैसे भीतर तो शर्मिंदगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी

दांतों के बीच जीभ कटती है पर न बोलती
कड़वाहट भी हो कितनी जिह्वा मीठा बोलती
सहन के गगन में रहे परिवेश परिवार बुलन्दगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी

सबका जीवन अलग भिन्न तंत्र-मंत्र, आराधना
अपनों की खातिर जीना पिघलती सी कामना
झर चुके हैं खुद लुटे हैं पर अपनों बीच हदबन्दगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी।

धीरेन्द्र सिंह
21.07.2026
11.10

आप हैं बस सोचती

सींचता है हृदय हरदम बनकर पुनीत पावन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन

आप नयनों में नहीं झांकती बस ताकती है
मेघ पुतली में सघन हैं सत्य यह नहीं मानती हैं
नयन भर नमी हमेशा पलकों का रहता है छावन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन

चमकती हैं पुतलियां होता है जब नेह गर्जन
आप ही कारण हैं आप ही हैं भाव बूंद नर्तन
झमाझम भाव वर्षा में हो जाता जलमग्न तन आंगन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन

हृदय सूर्य सा दग्ध मेरा आप भावना का सागर
वाष्पित होती मन में बसती रचती रहती बादर
हृदय बरसता लिए सहजता और भींगता दामन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन।

धीरेन्द्र सिंह
21.07.2026
03.49

शनिवार, 18 जुलाई 2026

आत्मिक संघर्ष

पकड़ना चाहते इतना पर कितना छूटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है




प्यार के हिलोरे हैं अनुराग के बेचैन किनारे
वह अपना है तो अनवरत अपने को दुलारें
जिंदगी उपद्रव भी लगे और समय लूटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है

बादलों सा उड़ता नभ से जुड़ता चित्त चंचल
कभी बाहों का घेरा तो कभी उड़ता आँचल
विचारों में बंधा जीवन अपने में ही घुटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है

धधकती आग भीतर पर मंद होता प्रकाश है
वृष्टि की चर्चे बहुत हैं पर दिखती नई प्यास है
तन की कहें मन की सुने व्यक्ति इसमें लुटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है।

धीरेन्द्र सिंह
19.07.2026
16.42

जीवन

मिल रहे हैं दर्द मगर मर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं




हैं जो अपने क्यों लगे गलत पनपने
लगाव था निभाव भविष्य के सपने
फिसल गए स्वार्थ का यूँ तर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं

भावुकता भर स्वभाव वही हाव-भाव
अपनों के बीच खोजते पहचानी छांव
ऐसे बन गयी दूरियां लिए कर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं

मन है टूटता फिर बनता जैसे कोशिकाएं
अपनों का दर्द कितना कोई ना बता पाए
जीना यही है जीवन दर्द यूँ दर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं।

धीरेन्द्र सिंह
18.07.2026
20.27

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

मनभावन

मन के पालने में अभिलाषाओं का बिछावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है




चल पड़े हैं लोग निर्धारित श्रेष्ठता की चाह में
निज श्रेष्ठता अचर्चित अचंभित पड़े राह में
मन पालना का झूलना लगे प्रतिपल पावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है

झूलना नियति है या झूले की स्वाभाविक गति है
भविष्य की चिंताएं हैं यही आज की नियति है
वर्तमान भ्रमित करता न्यायोचित तथ्य जलावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है

एक ही समाज की एकमत नहीं लगती बोलियां
एक सिद्ध मार्ग लगे दर्द निवारण के लिए गोलियां
प्रगति है प्रताप है जीवन कई अज्ञात बुझावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है।

धीरेन्द्र सिंह
17.07.2026
19.00

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

सत्य-असत्य

सत्य पिघला सरलता से तरलता का बोध है
असत्य का प्रयास है पर सत्य का जयघोष है




प्रदर्शन, विज्ञापन विभिन्न तरह की बनती रील
क्षद्म हवा का झोंका निर्मित पतंग को देते ढील
जनमानस की चेतना में काल्पनिक असंतोष है
असत्य का प्रयास है पर सत्य का जयघोष है

सोशल मीडिया महाभारत में भांति-भांति योद्धा
अनचीन्हे से अस्त्र-शस्त्र से निर्मित होती श्रद्धा
धर्मशास्त्र से राजनीतिशास्त्र प्रचलित कोष है
असत्य का प्रयास है पर सत्य का जयघोष है

व्यक्ति अपनी लंबाई से छुपाए अपनी बिवाई
दर्द-दर्द बहका-भटका क्या कर पाएगी दवाई
कर्म कहार कांधे डोली में अभिलाषा निर्दोष है
असत्य का प्रयास है पर सत्य का जयघोष है।

धीरेन्द्र सिंह
मूल लेखन :-16.07.2026 
19.08
समूह में पोस्ट:- 17.07.2026

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

धड़कन-धड़कन

कहीं न कहीं तो बंधना मन के लिए जरूरी है
साँसों का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है

पग भी चले थे राह में कंकड़ियों से नित उलझते
कई लक्ष्य गए गुजर कथ्य जीवन के भी समझते
सबकुछ बसा है दिल में उदासी तो कभी मगरूरी है
साँसों का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है

जीवन के कटोरे में भर-भर के मिले है दूध-भात
कटोरे को है रहता भरता कोई तो हितैषी अज्ञात
हर सांस जो चले साथ कोई रिश्ता हो, ना धूरी है
सांसो का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है

बंधता है मन जहां वही लगता सुखकर ठाँव है
यदि देखें गहनता से तो मन भी तन का निभाव है
हर तड़पन एक यात्रा, लगती पूरी कभी अधूरी है
सांसो का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है।

धीरेन्द्र सिंह
15.07.2026
08.40


सोमवार, 13 जुलाई 2026

बस प्यार

आपकी परिभाषा कुछ हो पर प्यार है बस प्यार
नयनों का मस्तूल है, हृदय-हृदय सुधि पतवार




वासना से लेकर प्यार जापना का ही चलन है
जिसका जैसा परिवेश वैसा प्यार का नमन है
युक्तियां सारी आजमाइए अभ्युक्तियाँ दे प्यार
नयनों का मस्तूल है, हृदय-हृदय  सुधि पतवार

हर हृदय में हार सुगंधित भावनाओं के पुष्प
किसको पहनाता, रिझाता बात तो यह गुप्त
चेतना में प्यार मुखर तो हावभाव में झंकार
नयनों का मस्तूल है, हृदय-हृदय सुधि पतवार

आपकी परिभाषा में जुड़ गई मन की आशा
मन से मन को जोड़कर पूर्ण करें हम जिज्ञासा
मैं तो स्पष्ट लिख चुका कहिए क्या है इकरार
नयनों का मस्तूल है, हृदय-हृदय सुधि पतवार।

धीरेन्द्र सिंह
14.07.2026
07.51

रविवार, 12 जुलाई 2026

सेवानिवृत्ति

अपने घर में सबसे बड़ा होना तो सम्मान है
सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है

संपन्नता की ध्वजा व्यवस्थित विधिवत सजा                      फुरसत की टोपी पहने कहें जिंदगी दे मजा                        जीवन कहे राग, द्वेष, विषाद का बहे तूफान है                      सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है                     


                        

 





लोग घर में ही हैं घर डगर सा लग रहा है                          नजर कई हैं दौड़ती सबर वहां थक रहा है
आ रहे हैं जा रहे हैं बदला घर का विज्ञान है
सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है
                      
खट से कप रख चले जैसे कार्यालय परिवेश है
बोलते बढ़ चले जैसे कार्यपालकीय आदेश है
भौतिक सुविधाएं सभी न मिलती अपनों की तान है
सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है।

धीरेन्द्र सिंह
12.07.2026
19.37

शनिवार, 11 जुलाई 2026

बात लग गई

बातों बातों में न कैसे बोल थाप लग गई
आग लगी रे आग दिल पर बात लग गई




न भाव नियंत्रण ना शब्द नियंत्रण के क्षण
तर्क-कुतर्क से जीत जाने का अबोला प्रण
कड़वाहट भरे आक्रमण की यूँ छाप जग गई
आग लगी रे आग दिल पर बात लग गई

अहं के अलाव में वहम की विभिन्न चिंगारियां
दहन के निभाव में दोहन की कलाबाजियां
चिंगारियों की उछल कूद दुश्वारियां ठग गईं
आग लगी रे आग दिल पर बात लग गई

बौद्धिकता का तराजू कहीं लोकप्रियता कांटा
तोल-मोल, तौल-हौल भांति-भांति सा बांटा
कटाक्ष,व्यंग्य, चुटकियों संग खटास रंग गई
आग लगी रे आग दिल पर बात लग गई।

धीरेन्द्र सिंह
11.07.2026
19.45




शनिवार, 4 जुलाई 2026

बारिश नीति

 बारिश के फुहारों सी है आपकी अनुभूति
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति



कल्पनाओं में सजती हैं प्रीति की कामनाएं
आकर्षण से रचती हैं रीति की भावनाएं
बात जब अभिव्यक्ति की हो संकोच प्रतीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति







हृदय आत्म से जो ना संबंधित, वह मुखर हैं
कुछ भी कभी भी बोल दे, वह रहगुजर है
धड़कन, तड़पन ऐसे लोगों के लिए अतीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति







बरस रही है झूम आपकी सभी सुंदरता
क्यों हो रही हिचक दिल में पर आतुरता
कैसे लोग कर लेते कईयों से प्रणय प्रीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति।







धीरेन्द्र सिंह
05.07.2026
11.16

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

उपवन मौन है

डंठलों को पूछता कौन है
उपवन यहां पर भी मौन है



पुष्प का अपार भार है संभाले
कंटकों की धार को भी सँवारे
सुगंध चहुँओर तरंग आध पौन है
उपवन यहां पर भी मौन है







बागबानी में डंठलों को दाना-पानी
पुष्प और कंटक की है जिंदगानी
कैंची कटा पुष्पडंठल सम्मान छौन है
उपवन यहां पर भी मौन है







है न कराहता ना उन्माद दहाड़ता
मौसमी प्रहार को मौन पछाड़ता
डंठल अनदेखे से सपनों का गौन है
उपवन यहां पर भी मौन है।







धीरेन्द्र सिंह
04.07.2026
07.57

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

एडमिन-मॉडरेटर

हिंदी के कई समूह लिए कई चक्रव्यूह
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह



समूह सदस्य संख्या अधिक पोस्ट कम
टिप्पणियां गिनी-चुनी लाइक भी बेदम
समूह संचालन अति कठिन चिंतित रह
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह







नया चलन शुरू हुआ सदस्यों को रिझाना
पोस्ट ऐसी हो जिसे पढ़ कामना उभर जाना
यह श्रम है समर्पण है चमकाना समूह मुहँ
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह







कॉपी पेस्ट पर हैं जीवित कई हिंदी समूह
मौलिकता कहां से लाएं सदस्य सुप्त ऊंघ
कितनी करूँ प्रशंसा आसान कार्य नहीं समूह
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह।







धीरेन्द्र सिंह
03.07.2026
07.22
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मंगलवार, 30 जून 2026

पथप्रदर्शक

भटक रही नव पीढ़ी नए विचारों का ले अम्बार

उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार


सुधारना, संवारना नया प्रचलित यह कारोबार

प्रतिभा स्वयं निखरती पथप्रदर्शक कहें संवार

पिछली पीढ़ी सोचती नव पीढ़ी बुद्धू गंवार

उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार


"मोटिवेशनल स्पीकर" उभरती चतुर प्रक्रिया

वेद-शास्त्र, धर्मग्रंथ की नए शब्दों की क्रिया

नई पीढ़ी की उन्मुक्तता को कहें लगाएं कतार

उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार


हर बीज का अपना विकास निजी है पल्लवन

खाद-पानी-धूप मिले यथेष्ट खुला रहे उपवन

प्रतिभा होती विकसित नव चेतना की हुंकार

उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार।


धीरेन्द्र सिंह

02.07.2026

06.32

सोमवार, 29 जून 2026

बारिश में भींग जाएं

कई समस्या है, चिंताएं हैं, क्या चिता बनाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं

भींग जाना ही होता है उस पल को जी जाना
जी जहां ना लगे वह जीवन छल है हो जाना
सामाजिक मान्यताओं अनुरूप ढलते जाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं

जीवन की आपाधापी में बस दौड़ निरंतर दौड़
अभिलाषाओं की हो समीक्षा देखा जाए तौर
किनारे-किनारे संभलते मझधार से डरते जाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं

रस श्रृंगार भी झेल रहा है नव मिलावट का वार
भाव-भंगिमा, अदा अठखेलियों का कहां गुबार
देह सौंदर्य पर सतत गौर करते जीवन यूँ गवाएं
या उन्हें देखते, सोचते बारिश में भींग जाएं।

धीरेन्द्र सिंह
29.06.2026
20.30


रविवार, 28 जून 2026

मन

किसको कहां मन ढूंढ रहा सब मस्त हैं
यह चिंतन त्रुटि है कि लगे भाग्य अस्त है



विश्लेषण की क्षमता संतुलित हो संयमित
तथ्य उभरता स्पष्ट कर्म तदनुरूप नियमित
स्व से सृष्टि तक नियम पारदर्शी समस्त है
यह चिंतन त्रुटि है कि लगे भाग्य अस्त है







एक समूह के बल पर नवनिर्माण प्रक्रिया
समूह गठन के लिए सर्वहितकारी क्रिया
निजता के जाल में निज हानि जबरदस्त है
यह चिंतन त्रुटि है कि लगे भाग्य अस्त है







इसे न समझें काव्य प्रवचन की नई विधा
उस पीड़ा को समझिए जिसमें मानव बींधा
घर-परिवार अस्तव्यस्त व्यक्ति बाहर मस्त है
यह चिंतन त्रुटि है कि लगे भाग्य मस्त है।

धीरेन्द्र सिंह
29.06.2026
08.35





शनिवार, 27 जून 2026

दमक

 आप एक चमक हैं और आप एक दमक है

मेरी निजी कल्पाना की आप एक धमक है

शुक्रवार, 26 जून 2026

अर्चना

कैसे कहें उनसे अपनी निजी अभ्यर्थना
शब्द रहित, दग्ध रहित उनकी शक्ति अर्चना



हृदय के स्पंदनों को छूकर हवा से बह गए


आप भी समझे ना समझे क्या वह कह गए
सबकी अपनी-अपनी दुनिया अपनी है सर्जना
शब्द रहित, दग्ध रहित उनकी शक्ति अर्चना

प्यार की जब बात कहें बोले ईश्वर से प्यार
संसार यह भ्रमजाल है मुक्ति इसका द्वार
मानवीय प्रणय खड़ा आत्म देह की गर्जना
शब्द रहित, दग्ध रहित उनकी शक्ति अर्चना

सत्य है कि सर्व परमऊर्जा के अंश हैं
प्रणय कहां निषेध धर्म में यह दंश है
समर्पण परमात्मा का आत्मा की ना दर्शना
शब्द रहित, दग्ध रहित उनकी शक्ति अर्चना।

धीरेन्द्र सिंह
26.06. 2026
21.51

गुरुवार, 25 जून 2026

नाते तोड़ गयी

वह मुझे छोड़ गई और नाते तोड़ गयी
यह टूटन है क्या, नहीं विश्वास होता है
जीवन है जागृत है, उसपर आश्रित है
कुछ न बोली चल दी कहीं ऐसा होता है






हृदय में हाहाकार कैसा मृदुल अत्याचार
दर्द है, दुख है पर संभावना को न्योता है
मन ने किया समर्पण दिखला दी दर्पण
कुछ न बोली चल दी ऐसा कहीं होता है

वह मेरी भोर थी और महकती साँझ थी
आंच जिंदगी पर चलाई तेज सरौता है
घाव है दर्द है हमदर्द मन पर नहीं रोता है
कुछ न बोली चल दी कहीं ऐसा होता है

उससा जग में कही मिलटी न कोई दूजी 
सूझी क्या उसको टूटन ही मात्र मौका है
जितना मुझे सँवारी उससे न बढ़ सक कभी
कुछ न बोली चल दी ऐसा कहीं होता है।

धीरेन्द्र सिंह
26.06.2026
08.06


बुधवार, 24 जून 2026

लाठी-लाठी का भेद

उन्मुक्त कामनाओं का कैसे करें उल्लेख
सामाजिक मान्यताएं सुन दर्शाती हैं खेद



अपने मन की सुनें या समाज को गुनें


उभरती हैं दबती जाती हैं आह्लादित धुनें
परिवेश ही सुन धुन निकालता मीनमेख
सामाजिक मान्यताएं सुन दर्शाती हैं खेद

जब मन उड़ता, चाहे जिस ओर है मुड़ता
मात्र उन्माद नहीं रहता बल्कि भाव गूढता
कदम आगे-पीछे होते देख अनगढ़ विभेद
सामाजिक मान्यताएं सुन दर्शाती है खेद

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, गया सिखाया
सामाजिकता के कई स्तर हैं, गया छुपाया
अर्थ आधारित है जीवन लाठी-लाठी का भेद
सामाजिक मान्यताएं सुन दर्शाती हैं खेद।

धीरेन्द्र सिंह
25.06.2026
04.23

सोमवार, 22 जून 2026

कोचिंग क्लास

कोचिंग क्लासेस एक प्रचलित शब्द
विद्यालयीन शिक्षा को करता स्तब्ध 

व्यवसाय हो गयी है भारतीय शिक्षा
याद करो लिख दो उत्तीर्ण परीक्षा
रटंत विद्या में सक्रिय कोचिंग संबंध
विद्यालयीन शिक्षा को करता स्तब्ध

लखनऊ में कोचिंग क्लास जल गया
होनहारों संग देश भविष्य तल गया
खोया जिन्होंने बच्चे क्या है यह प्रारब्ध
विद्यालयीन शिक्षा को करता स्तब्ध

सख्त निगरानी में रखे जाएं कोचिंग
आत्महत्या, झगड़े, आगजनी है निंद
श्रद्धांजलि देती यह व्यवस्था निःशब्द
विद्यालयीन शिक्षा को करता स्तब्ध।

धीरेन्द्र सिंह
23.06.2026
03.15

फोटो रचना

श्रम को कर्म के भ्रम में लेना
जैसे खटिया बिन सजा बिछौना
श्रमिक उठाता बोझ को दिनभर
साँझ ना पाता खरीद खिलौना





मिलते है ऐसे वाक्य कई बोलते
जैसे कोई खाद्य संभाला हो दोना
कर्म को सिकोड़कर दे नए अर्थ
श्रम को दे दिए करीब का कोना

संलग्न फोटो को देखिए बोल रहा
गर्मी में प्यासा नहीं जल भगोना
नहीं जलाशय ना ही जल चमक
कबूतर की प्यास तड़प थका डैना

गमले की तलहटी तक पहुंच हुई
संकट हो भारी निराशा क्यों बोना
चोंच अपनी से बूंद रहा खींच है
इसे कहते मौलिक अविष्कार होना।

धीरेन्द्र सिंह
22.06.2025
19.37




रविवार, 21 जून 2026

बदरिया

बदरिया भरकर बरसने को आ रही
मन भींगने के लिए तैयार हो रहा है 
एक प्यास धरा का व्यक्ति का भी, कहे
गर्जना, पूरब दूर से पुकार हो रहा है






कुछ भी न होता अचानक, भूमिका बने
खुद को न हो पता यह क्या हो रहा है
व्योम में बदलियों भरी हुई असंख्य हैं
क्या बात बूंद एक बदली का भिंगो रहा है

कहां से चली कहां छाई कहां पर बरसी
दूजी बदरी टकराई विद्युत बरस रहा है
आकर्षण कहें या चाहत या जन्मों का खेल
सब कुछ तो पास है पर मन तरस रहा है

घर के शॉवर से भींगना भी जैसे बरसात
फिर क्यों मन उन्मुक्त बदरी निरख रहा है
बंधनहीन उन्मुक्त छाँवमुक्त जीना चाहे
आदिकाल से ही जीवन मौसम परख रहा है।

धीरेन्द्र सिंह
22.06.2026
07.25

शनिवार, 20 जून 2026

कहां प्यार है

सत्य है, समझ है, तार्किक विचार है
अभिनय की दुनिया में कहां प्यार है




कामनाएं, कुंठाएं, वर्जनाएं ही मुखरित
अर्चनाएं कैसे लुभाएं भ्रम  है प्रचलित
छल, मजाक,मस्तियों का यह संसार है
अभिनय की दुनिया में कहां प्यार है








फेसबुक, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम में सक्रिय
भाषा, भाव उनका देख दुखी रहे हिय
कितना नाटकीय हो गया दिल दुलार है
अभिनय की दुनिया में कहां प्यार है







होगी कहीं गूढ़ भावना जनित ऋतुवार
कहीं कोई भाव समझता होगा ऋतुसार
हृदय से हृदय मिले यही सत्य अंकवार है
अभिनय की दुनिया में कहां प्यार है।







धीरेन्द्र सिंह
21,06.2026
22.23

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शुक्रवार, 19 जून 2026

जग रीत

जो बहता है वह सहता है यही जग रीत

कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत


बहता है जो मन साफ है मान प्रतिष्ठा साख है

संयमित प्रवाह से संचालित अप्रयोज्य साफ है
अपनी लय में चलता, बढ़ता है अघोषित उम्मीद
कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत

उत्सव से वह अप्राभावित जीत में रहे निष्काम
कर्म ही उसकी पूजा सभी लक्ष्य हों जैसे धाम
अवसरवादी घर के कहते उनके प्रयास की प्रीत
कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत

अनबोले अनचीन्हे रहते कर्म राह के दीवाने
अपनों को सुख सुविधा देते यह अथक परवाने
हर घर में एक ऐसे व्यक्तित्व हरदम हों प्रतीत
कोई मनाता उत्सव है कोई कहता जीत।

धीरेन्द्र सिंह
20.06.2026
04.02




बुधवार, 17 जून 2026

धमाल तुम बवाल

भोर तड़के जो टूटी नींद क्या करार धरूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ



मन है ढूंढता उस टूटे हुए क्षण की धमक
खिली थी जिंदगी महकती बहकती चमक
अब भी क्या छूटा जिसपर न अख्तियार करूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ

पौ फटी नहीं पसरा हुआ सन्नाटा है पुरजोर
न जानूं प्रीत आश्रित है सामाजिक गठजोड़
उभर आई हो चेतना में क्यों न अभिसार करूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ

न फोन न चैटिंग न वीडियो कॉल हो रहा है
जो कट गया छंट गया यह काल कह रहा है
कपाल में धमाल तुम बवाल आओ सत्कार करूँ
जी है चाहता तुम पास हो और प्यार करूँ।

धीरेन्द्र सिंह
18.06.2026
05.02


मंगलवार, 16 जून 2026

बांध दी चोटियाँ

भोर को मुट्ठी में पकड़ बांध दी चोटियां
शोर पवन का उठा उभर पड़ीं घाटियां
मेघ मुस्कराते रोके सूर्य रश्मियां सगरी
आप ही पुलक प्रातः करा दीं मुनादियाँ






मद्धम अंधियारा छाया मंथर चहचआहट
मंदिरों के पट खुले अधर मंत्र युक्तियां
आभामंडल आपकी करे सहज आकर्षित
अर्चनाएं नव सृजित कई प्रबल आसक्तियां

भोर की शरारत है सहज मुट्ठी विराजित
मेघ का सहयोग है मिली सूर्यरश्मियां
एक चाहत बिन आहट कर रही थपथपाहट
भोर कलरव उठ रहा है देख नव नीतियां।

धीरेन्द्र सिंह
16.06.2026
16.36


सोमवार, 15 जून 2026

भ्रष्ट

देश भ्रष्ट है या कि समाज भ्रष्ट है
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है




यही कथ्य है सत्य के स्वरूप सधा
नेपथ्य में क्या हो रहा कहीं से नधा
सदा में अनुगूंज वही पर अस्पष्ट है
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है

सत्य मार्ग की प्रचलित हैं परिभाषाएं
गौरव के जो प्रतीक वहीं शीश नवाएं
बौद्धिकता वस्तु बनी तर्क कष्ट है
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है

एकल है व्याकुल गति जिसकी ढुलमुल
समाज है गुरुकुल प्रीत जिसकी थुलथुल
देश है संघर्षरत समूह पड़े तटस्थ हैं
सोच की कहें या संस्कार नष्ट है।

धीरेन्द्र सिंह
15.06.2026
18.29


रविवार, 14 जून 2026

क्यों

ऑनलाइन समूह परिचित हो कामना नहीं
मैंने जो लिखा लोग सराहें यह याचना नहीं
क्यों भेजूं मित्र अनुरोध होता इसमें है क्षोभ
रचना है यदि आकर्षक प्रशंसक मांगना नहीं




 

मन कहे वही लिखें भाव का निभाव सींचें
अन्य लेखन स्वभाव से अक्सर सामना नहीं
बुन रहा है जिंदगी को अनवरत अथक मन
भावनाओं के बुनकर को अनर्थक जागना नहीं

छप गया तो क्या हुआ कितनों ने है छुआ
इधर छापो उधर बांटों नहीं लेखकीय साधना
नहीं कागज कलम अभ्यस्त टाइपिंग रखे मस्त
लिख दिया पोस्ट हुआ भाव महके मन आँगना

जब अपरिचित लाइक या करते हैं प्रतिक्रिया
लेखन होता प्रोत्साहित जैसे दधि जामना
झुंड में हुडदंग बस आपसी क्षद्म प्रशंसा तंत्र
साधना एकल है होती जिससे भाव जागना।

धीरेन्द्र सिंह
15.06.2026
07.45



शनिवार, 13 जून 2026

महुआ

महुआ सी चू गयी छाप पसरी मादकता
प्रभाव आपका या मन उड़ान अधिकता
सम्मोहन की होती अनेक परिभाषाएं भी
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता





चिहुंका था मन पाकर महुआ का वह गंध
प्रस्फुटित चेतना में भाव कहे तर्क करे दंग
महुआ की धरा से गुरुत्वाकर्षण की समीपता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता

आदिवासियों से अतिवादियों तक है बड़ी चमक
चेतना के तारों को करती झंकृत है कड़ी धमक
सत्य हो निगाह की या भाव की यह यांत्रिकता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता

इसी पेड़ पर या किसी मेड़ पर चू जाता है महुवा
राह को प्रदीप्त कर विक्षिप्तता मिटाता है महुवा
आप महुवा हैं हर लेती दर्द हमदर्द की मौलिकता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता।

धीरेन्द्र सिंह
13.06.2026
22.03





रविवार, 7 जून 2026

सुनो

सुनो कुछ लिखो तुमको पढ़ता रहूं
इश्क़ को खासकर मन में गढ़ता रहूं

जब तुम कहती हो बहती हो बन नदी
प्रवाह की तरंग में निभाव की खुदबुदी
भींगे तट पर पांव नंगे धुन बढ़ता रहूं
इश्क़ को खासकर मन में गढ़ता रहूं




शनिवार, 6 जून 2026

धुन

आज में डूबकर उम्र जीते रहें

अपनी धुन में ही रहा कीजिए
मुग्ध होकर कई सुन रहें आपको
जैसे कहते हैं अक्सर कहा कीजिए




क्यों चुपचाप हैं बोलते पदचाप हैं
सुननेवाले कहें भाव बहा दीजिए
मिलते पागल भी हैं जिंदगी में बहुत
शब्द की चांदनी को गढ़ा कीजिए

जिससे टूटे हैं वह रह गए हैं कहीं
जख्म सूखे पल्लवन हरा कीजिए
हो रही है घुटन लंबी खामोशी से
नज़्म टूटे हुए हैं दवा दीजिए

आपकी खातिर लिख रहा है हृदय
स्वर में अपने इसे गुनगुना लीजिए
शब्द की बानगी को धुन तो दीजिए
फिर आपकी मर्जी जितनी सजा दीजिए।

धीरेन्द्र सिंह
07.06.2026
08.25