सोमवार, 2 नवंबर 2026
जानी-जानी
"इस घड़े से लोटा निकाल के"
भोर
दृष्टि चाहिए वृष्टि प्यार की चहुंओर
मन की स्थिति ही लाती जीवन भोर
रविवार, 1 नवंबर 2026
चलो न
चलो न प्रकृति द्वार मिल श्रृंगार करेंगे
चेतना के चमन का मिल पुकार करेंगे
शनिवार, 31 अक्टूबर 2026
मानवता
प्रदर्शन है दर्शन है इसी में ठेलमठेल है
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है
शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026
नाच रे तन नाच
नाच रे तन नाच मन नाच रहा जैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे
इतना क्या सोचना
हम भी इस तरह अब बहकने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं
भाव उठते हैं जैसे इत्रदानियाँ सजी हो
बुधवार, 28 अक्टूबर 2026
विचारिए
ध्येय क्या है लिखने का यह भी विचारिए
फिर अनुभवों को अभिव्यक्ति में निखारिए
अकारण कोई भी अक्सर लिखता नहीं है
शब्दों के सुसज्ज़ा संग जो दिखता यही है
सोमवार, 26 अक्टूबर 2026
देवी-देवता
जीवन और समाज के प्रति होती सबकी देयता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता
रविवार, 25 अक्टूबर 2026
कैसे चित्रकार हो
लेखन में यदि लय नहीं कैसे शब्दकार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो
फिर ना आई
शनिवार, 24 अक्टूबर 2026
जीवन
चरित्र
चरित्र के चर्चे इतने इसका न कोई चित्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र
शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026
यौवन
देह दरबार है प्रपंच का अखबार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026
शब्द भाव - वडापाव
शब्द खींसे निपोर चल रहे ऐसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे
ईश्वर
प्यार की आराधना किए नहीं ईश्वरीय भक्ति में निमग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखादेखी में हैं कई मग्न
बुधवार, 21 अक्टूबर 2026
उम्र साठ
उम्र 60 से अधिक तनमन में स्वस्थ झंकार
कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार
प्यार गहन गगन है प्यार है गहरा जलधार
बहुत जिंदगी जीनेवाले समझें छल मझधार
पगी कल्पना दुलकी चलना बातें अपरम्पार
कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार
साठ का पाठ लिए अपना अभिनव सा ठाठ
पारदर्शिता इसमें रहती कूड़ा करकट ले छाँट
एक ठहराव पूरा निभाव नहीं कोई अधिकार
कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार
साठा सो पाठा यह सत्य सदियों से चलता है
जीवन शैली उत्तम हुई जिसमें प्यार चहकता है
स्वस्थ शरीर मन स्वस्थ अधीर मांग रहा अभिसार
कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार।
धीरेन्द्र सिंह
21.10.2026
21.31
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026
परछाई
दिल को इस तरह याद यूँ आपकी आयी
चिंहुक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं
सोमवार, 19 अक्टूबर 2026
दशहरा
मर्यादा में जीवन के त्याग दिए कई धुन श्रावण
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण
रविवार, 18 अक्टूबर 2026
दो किनारे
जैसे तैसे उड़ाते पैसे नदी धार है होता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता
यह कैसा प्रमाणपत्र ?
यह कैसा प्रमाणपत्र ?
प्रमाणपत्र
विद्यार्थियों को
उनकी योग्यता को
प्रमाणित कर विद्यालय द्वारा
दिया जाता है
पर
कुछ हिंदी समूह भी
प्रमाणपत्र बांट रहे
ना जाने किस योग्यता से
जांच रहे;
कौन हैं
ऐसे प्रमाणपत्र देनेवाले,
क्या मानक हैं ?
किसी को
कुछ नहीं मालूम
बस
प्रमाणपत्र बंट रहे नियमित,
यह और कुछ नहीं
समूह विशेष का
विपणन है
और समूह के
कुछ प्रमुख का
स्व-विज्ञापन,
व्यक्ति की
श्रेष्ठता साबित करना
हिंदी जगत का
लाइलाज रोग है,
यदि इस रुग्ण प्रथा को
बंद नहीं किया जा सकता
तो वंचित रखें
मेरी रचनाओं को
प्रमाणपत्र के अनावश्यक बोझ से,
रचना वह होती हैव
जो प्रशंसा, समीक्षा, टिप्पणी की
अभिलाषी तो है पर
किसी भी स्तर के
प्रमाणपत्र की निर्मोही है।
धीरेन्द्र सिंह
18.10.2026
19.52
शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026
हौसले
खुरच-खुरच कर दीवारों को नए रंग के लिए
हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए
आदतें नई संवरती हैं यदि होता है प्रजातंत्र
आए दिन मुनादी होती है मिल गया नया मंत्र
एक हंगामा कई तख्तियों का प्रबंध लिए
हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए
दीवारें शक्ति हैं शौर्य है बतौर सिरमौर हैं
खुरचना प्रजातंत्र का कहें परिष्कृत तौर है
हुजूम झूमकर झंकार करे उमंग के लिए
हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए
बदल देंगे चेहरा सभी दीवार के प्रकार का
भोजन में प्रमुख वही ऐसी सोच है अचार का
नई सोच नएं मुद्दे कहां ढूंढे प्रपंच के लिए
हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए।
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026
शस्त्र
शोषक और शोषित
इसी से जग पोषित
बुधवार, 14 अक्टूबर 2026
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026
भाषा
असहमति
अस्वीकरण नहीं होती
और सहमति
स्वीकार्यता नहीं होती
फिर इन शब्दों का
महत्व क्या
जब शब्द की मूल अभिव्यक्ति
ही बाधित हो;
शब्द अनेक हैं जो
अपने मूल अर्थ खो रहे
प्रयोगकर्ता
खिचड़ी भाषा संग सो रहे,
कौन शब्दों की खेत में
भाव की फसलों का
करेगा रखवाली ,
सब भाषा क्षेत्र में
हो रहे सुविधाभोगी;
कसमसाती भावनाओं को
उफनते शब्दों के द्वारा
कह देने की आदत,
मिश्रित शब्द अर्थ को
दे रही है जन्म,
खिचड़ी भाषा का चलन है
बोलचाल में ऐसे है
जैसे तूफानी नदी;
भाषाएं टूट रही हैं
शब्द दरक रहे हैं
अभिव्यक्तियां रुग्ण हो रहीं
और प्रयोगकर्ता
इन सबसे अनभिज्ञ
खिचड़ी भाषा में
भविष्य तलाश रहे हैं।
धीरेन्द्र सिंह
14.10.2026
07.17