शनिवार, 12 सितंबर 2026

आगमन है

आगमन है आपका, आचमन है आपका
सत्य है उभरता फर्क सिर्फ जाप का



सिद्धिविनायक आप, जन नायक है आप
प्रथम पूजनीय हैं जग के विनायक हैं आप
आपकी अगवानी में सर्व द्वारपट विश्वास का
आपकी कृपा रहे पूर्णता हो हर आस का

आगमन है आपका, आचमन है आपका
सत्य है उभरता फर्क सिर्फ जाप का

वक्रतुंड प्रचंड मुंड छांट देते सभी धुंध
गणेशोत्सव पर्व है गणपति बप्पा सिंधु
आस्था का हर्ष है गण-गण प्रकाश सा
गणपति वंदना हर सांस है रहा गा

आगमन है आपका, आचमन है आपका
सत्य है उभरता फर्क सिर्फ जाप का।

धीरेन्द्र सिंह
13.09.2026
06.45

शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

हे गणेश

 हे गणेश

आप अशेष

देश क्या

पूजे विदेश


प्रथम आराध्य नमन

सृष्टि में सुलभ गमन


बुद्धि के प्रणेता

सन्मुख सदा उपस्थिति

फल देते वैसा ही

जैसी जिसकी नियति


गणपति दूर करें वहम

सुमति दृष्टि में रहे सुगम


सृष्टि में विधान है

आप में ज्ञान है

वृष्टि कई भावों की

आप में ही ध्यान है


गजानन को अर्पित सुमन

मनन मुग्धित करे नमन।


धीरेन्द्र सिंह

12.07.2026

07.47

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

मन

कब झांका व्यक्ति दिल से मन के उपवन में
नित्य नया सूर्य उगता करता उजियारा मन में



सूर्य मात्र ऊर्जा नहीं दर्शाता सभी दिशा है
उपद्रव, उत्पात, उफनती सक्रिय निशा है
दिल है सब समझता पर व्यक्ति करता दमन है
नित्य नया सूर्य उगता करता उजियारा मन है

मन अति विशाल गहरा मात्र झांक सकते हैं
उपवन सुगंधित रंग-बिरंगा माँज सकते हैं
इतना प्राकृतिक वैभव फिर कैसे उभरता दहन है
नित्य नया सूर्य उगता करता उजियारा मन है

मन के उपवन में व्यक्ति जब उन्मुक्त घूमता
नभ की ऊंचाइयों में तब सत्य को चूमता
मन धरा-गगन मन पुलकित चंचल चितवन है
नित्य नया सूर्य उगता करता उजियारा मन है।

धीरेन्द्र सिंह
05.09.2026
07.22

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

कृष्ण

सृजन की वेदना कब समसीतोष्ण है
मनन जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं

उकेरी भावनाओं में मौलिकता नही मिलती
संकरी कामनाएं हो तो भौतिकता कहीं मिलती
जीवन है प्रवाह जहां सब लगते तृष्ण हैं
मनन जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं

जन्म से किए अनुभव संघर्ष और वेदना
कुछ जिए कुछ जताए जिंदगी की चेतना
जैसे देखें हैं दिखते क्या बहुरूपिया मृण हैं
मनन जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं

आराधना संग साधना की कामना है जरूरी
भक्ति उद्भव स्वयं का नहीं कभी मजबूरी
भवसागर में बहता हर जीव मात्र तृण है
मानव जीवन का तप हो तो कृष्ण हैं।

धीरेन्द्र सिंह
04.09.2026
08.38


सोमवार, 31 अगस्त 2026

भावनाएं

आप शब्द हैं अभिव्यक्ति हैं आसक्ति हैं
स्वीकारिए या नकारिये आपकीं मर्जी
दिल भावनाओं का चितेरा है एक आम सा
बुनता है कल्पनाएं सिलता जैसे दर्जी






उम्र की उलझनें मष्तिष्क की कतरनें है बोलती
जीवन है भिन्न-भिन्न अनेक प्रकार की खुदगर्जी
जियो तो ऊष्मा सकारात्मकता है चहुँओर फैला
अन्यथा उलझनें, चुनौतियां अनुभूति की सर्दी

तर्क क्या है समाज रचित एक परिकल्पना 
मर्म क्या है निजता जड़ित एक युग्म अर्जी
व्यक्ति भावुकता को छोड़ दुनिया की सोचता
व्यक्ति है कहाँ सम्पूर्ण टुकड़ों में भाव दर्जी

सुगंध का एक चितेरा पर कहीं दूर बसेरा
जीवन का यही क्रम कहां टूटी कहीं लरजी
क्या खूब दबाया है संस्कार में जीवन भी
जब अवसर मिला चाहतें क्या खूब हैं गरजी।

धीरेन्द्र सिंह
31.08.2026
16.42



रविवार, 30 अगस्त 2026

मनुष्य की बात

उपलब्धियों पर मुस्कराहटों के उपहार
परिलब्धियों में टूटा बिखरा, लिया संवार
जो देख रहे वह नहीं अंतिम सत्य है
सूखे से लगते जख्म देते अक्सर चिंघाड़






सब ठीक है कह देना आदत बन गयी
ठीक भी है कहाँ कुछ देख रहा संसार
असफलताएं, विवशताएं हैं खूब सताएं
किस-किस से करे व्यक्ति अच्छा व्यवहार

भौतिक सुख साधनों से खुशियां नापते
हृदय संवेदना की बातें करते बस गंवार
भावशून्यता से प्राप्त कर रहे हैं अपने लक्ष्य
भावनाएं हाशिये पर पाकर अपनों से दुत्कार

बौद्धिकता कौन पूछता "चैट-जीपीटी" तो है
इंटरनेट बना मस्तिष्क संभावनाएं अपार
प्रौद्योगिकी तकनीक ही सच्चा लगता मीत
व्यक्ति खो रहा है व्यक्ति या कारण दुर्व्यवहार।

धीरेन्द्र सिंह
05.58

बुधवार, 26 अगस्त 2026

सत्य अड़ा है

बानगी तो देखिए सत्य अड़ा है

अचंभित है जग कहां पर धड़ा है


कुर्ता विशिष्टता का प्रतीक हो गया
गमछा संवर सिर से गले हो गया
नेतृत्व की कुर्सी में भविष्य पड़ा है
अचंभित है जग कहां पर धड़ा है

शासित कहीं न दिखते सब ही शासक
शोषण वह प्रक्रिया है सब ही उपासक
लघुतम, लघु सत्ताएं परिवार पड़ा है
अचंभित है जग कहां पर धड़ा है

चैनल विभिन्न की व्यावसायिक चतुराई
पत्रकारिता में सत्य को मिले निठुराई
जो देख रहा पढ़ रहा वैसा ही गढ़ा है
अचंभित है जग कहां पर धड़ा है

आधे-अधूरे हैं पर पूर्णता का है दिखावा
आगे जमूरे हैं हर निपुणता में छलावा
शिक्षा है उच्चतम व्यक्ति क्या पढ़ा है
अचंभित है जग कहां पर धड़ा है।

धीरेन्द्र सिंह
27.08.2026
06.29


मंगलवार, 25 अगस्त 2026

दृष्टि

कामना की याचना है और सृष्टि है
सब पढ़ लिए है क्या ऐसी दृष्टि है



आप अपनी उलझनों के हैं पहरेदार

दूसरा अपनी समस्याओं का तारणहार

भावनाओं की सतत विभिन्न वृष्टि है

सब पढ़ लिए है क्या ऐसी दृष्टि है


मोहक, सम्मोहक संवेदक विभेदक

चेतना के चपल चाह विज्ञ सचेतक

अभिलाषाएं पलक पर चंद्र समिष्ट है 

सब पढ़ लिए है क्या ऐसी दृष्टि है


पढ़ना सब वस्तुतः असम्भव ही है

क्या सोचना बुरा यदि पराभव भी है
कर्मों का यह एक स्पष्ट प्रविष्टि है
सब पढ़ लिए हैं क्या ऐसी दृष्टि है।

धीरेन्द्र सिंह
25.08.2026
23.35

सोमवार, 24 अगस्त 2026

रिश्ते

कुछ छूट गया खुद से कुछ छूट रहा है
जोड़ने को जीवन कोशिश में टूट रहा है
एक व्यक्ति नहीं व्यक्ति रिश्तों का झुंड है
छूटता हृदय नयन से अपनत्व ढूंढ रहा है






कमियां तो सब में है नर्मियों की है जरूरत
शब्दों में नमी जोर हो निभाव घुट रहा है
अहं के शंख से युद्ध की ही निकले ललकार
तर्कों से कब चला जीवन लगे उठ रहा है

मनभाव में अलाव प्रतियोगिता तो जलन भी
श्रेष्ठता की अंधी दौड़ में यथार्थ ऊंघ रहा है
शिक्षा की डिग्रियां जितनी ऊंचा तो उठे व्यक्ति
स्वार्थ की परिधि में घिरा गड़ा खूँट रहा है

कौन गलत कौन सही समझना नहीं आसान
दो में से एक सुविज्ञ जो मौन ठूंठ रहा है
सहने की हो क्षमता तो जीवन सौम्य, सुंदर है
लड़ने की गति में रिश्ता जीवन लूट रहा है।

धीरेन्द्र सिंह
25.08.2026
06.51



रविवार, 23 अगस्त 2026

गीत

गीत ही है जिंदगी गीत ही आधार है
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है



हौसले के फैसले चुनौतियों के वलबले
मीत के गीत उपलब्धियों के सिलसिले
प्रीति की प्रतीति ही बिहँसता संसार है
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है

मन स्पंदित श्वास सुगंधित परिवेश तरंगित
अर्चना की सर्जना में विलगाव है प्रतिबंधित
तार मन के जुड़ गए तो स्वर नए उपहार हैं
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है

कामनाएं घास सी उगती हैं मरती हर दिन
क्या बताएं चाह सजती हैं बिखरती छिन-छिन
एक तृष्णा एक बेचैनी गुप्त निज मनधार है
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है।

धीरेन्द्र सिंह
24.08.2026
07.57

शनिवार, 22 अगस्त 2026

सईयां

सईयां सात जनम नही धाए संग एहि जनम भाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीं जी पाए



सकल समाज हेरि लिए शक्ल नहीं दिखा पाए
हिया जिया संग पिया-पिया बोले क्यों ऐसा तरसाए
एक दरस की अरज है मेरी जन्मों में क्यों बहलाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीं जी पाए

चाहत की नई आहट थी नयन भरी जगमगाहट थी
रचि सुगन्ध परिवेश शुचि अकुलाहट मोह बुलाए
आप गरज को मरज ही समझे कितनी देर लगाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीं जी पाए

पल-पल कल-कल बहता हरदम मिलती नहीं फुहार
छल-छल ढल-ढल रहता संगम लौ भी लपक ना पाए
आज ही जीवन की दुनिया कल पर क्यों आंख लगाए
आज का दिन बस यूं ही बीता खुल नहीँ जी पाए।

धीरेन्द्र सिंह
23.08.2026
10.23

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

प्यार

मन का संतोष है भाव विशेष है निज झंकार
हृदय हर्षाता स्नेह बरसाता हो जाता है प्यार



प्यार के कई विशेषण युगों से हो रहा विश्लेषण
हर रूप में प्यार जरूरी प्यार आवश्यक पोषण
प्यार समर्पण प्यार प्रदाता प्यार नहीं अधिकार
हृदय हर्षाता स्नेह बरसाता हो जाता है प्यार

शिशु की निर्मल मुस्काहट बच्चों की शरारती आहट
किशोरावस्था की अनंत पेंगे युवावस्था की चाहत
हर उम्र में भाव प्यार के झूमे भव्य दिव्य उपहार
हृदय हर्षाता स्नेह बरसाता हो जाता है प्यार

कभी पांव पाजेब पहन छम-छम ध्वनि सुनाए
कभी पलक उठते हुए दृग विद्युत ही बरसाए
कभी शब्दभरी फुलवारी में लहर सुगंध फुहार
हृदय हर्षाता स्नेह बरसाता हो जाता है प्यार।

धीरेन्द्र सिंह
21.08.2026
18.08

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

अपने

तिलमिलाती जिंदगी संवरने को अति व्यग्र
यही जीवन संघर्ष है युक्तिपूर्ण गति समग्र



खींचतान में ढूंढें सब अपना ही आसमान
विश्वास लिए ऐसा जैसे हो मुक्त प्रावधान
प्यार अजेय ऊर्जा संग हो जाते हैं अभद्र
यही जीवन संघर्ष है युक्तिपूर्ण गति समग्र

अपनों के समूह में रचते अपने चक्रव्यूह
सपनों के समूह में अपने जाते अक्सर दूह
अपनापन डरा रहा मुस्कराहट छिपे भद्र
यही जीवन संघर्ष है युक्तिपूर्ण गति समग्र

जीवन प्रतियोगिता भरी साथ में है दृढ़ अहं
मैं बड़ा हूँ, श्रेष्ठ हूँ मैं जीवन में कहीं ना दोयम
थोथा चना बाजे घना सा सब ओर चाहें कद्र
यही जीवन संघर्ष है युक्तिपूर्ण गति समग्र।

धीरेन्द्र सिंह
20.08.2026
21.11




बुधवार, 19 अगस्त 2026

जागना है

हर व्यक्ति की आराधना है साधना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है



एक लौ लपकती झपकती पूर्वार्ध है
एक भोर उभरती संवरती उत्तरार्ध है
आत्मचिंतन जो कहे वही जापना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है

तत्व के घनत्व में मर्म का निनाद है
शोर बहुत बाहर विवादित संवाद है
स्व की संगीत पर स्व को नाचना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है

जागना यह चित्त का अस्तित्व का भी
संवरना हर कर्म निज व्यक्तित्व का भी
मृदंग संग विहंग बन गगन छानना है
एक ही प्रयास और गहन जागना है।

धीरेन्द्र सिंह
20.08.2026
07.42


मंगलवार, 18 अगस्त 2026

शब्द

शब्द अपने सदन में एकल पुखराज हैं
भाव अपने गगन में मूक सा सरताज है
अभिव्यक्तियां ही इनको सजाती रहतीं
भाषा इसीलिए व्यक्तित्व का हमराज है

गढ़ रहा है कथ्य भाषा तथ्य की अभिलाषा
पढ़ रहा जो वाक्य अर्थ कई मिजाज हैं
शब्द तह स्पंदन खींचे, भाव आंखे मीचे
शब्द की परिभाषाओं के संदर्भ अंदाज हैं

रंग बदलते ढंग बदलते रूप है अपरिवर्तनीय
शब्द अक्षर संयोजन से बनते गजराज हैं
पढ़ चुका जो गढ़ चुका वह भी कहीं अपूर्ण
संदर्भ गति से शब्दों का संभव यह राज है

सबकी अपनी शैली है भाषा ऐसे फैली है
शब्द चयन भिन्न हैं पर वाक्य के साज हैं
कल यही थे शब्द पर भाषा के तेवर और थे
जुड़ते इतर शब्द मुड़ते सम्प्रेषण रियाज़ हैं।

धीरेन्द्र सिंह
18.08.2026
20.48






शनिवार, 15 अगस्त 2026

पोस्ट आपका

आप मुझसे हर समय गीत का वादा करें
प्रणय पाहुन सा नित रोज ही मिलता रहे
हृदय आकुल हृदय व्याकुल को ही चाहे
भावनाएं कामनाएं योजनाएं सरसता रहे






हृदय संतुलन के लिए हृदय का आकलन
संगत हृदय जहां मिला संचय चलता रहे
मांग सकता नहीं प्रणय रण का चितेरा कभी
ताक-झांक सफलता का मन में खिलता रहे

कल्पनाएं संभावनाओं की निज पटरानी है
अलग क्या कह रहा यह दिलों में ढलता है
जीवंतता जिसमें रहे उनमें ही ऐसे भाव बहें
अन्य सुप्त जीते रहते जीवंत जलते रहता है

आपका सरगम अनोखा झंकृत बिन मुखौटा
शब्द लिपटे धुन, शब्द तान लिए ढलता है
प्रणय पंखुरी पल्लवन क्रिया आप में भी है
पोस्ट आपका प्रायः इसीलिए दमकता है।

धीरेन्द्र सिंह
15.08.2026
17.11


शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

स्वतंत्रता

स्वतंत्रता के तंत्र में यंत्रवत क्यों रहें
जिज्ञासा जहां कहे उसी ओर हम बहें



परतंत्र होना मनुष्य की है असमर्थता
स्वतंत्र रहे जीवन आवश्यक है सतर्कता
मनभाव जो भी हैं निर्द्वंद्व होकर कहें
जिज्ञासा जहां कहे उसी ओर हम बहें

मन को मारकर भी जीना है कोई जीना
मन ऊंचा रख प्रहरी सीमा पर ताने सीना
तिरंगा में लिपटा वीर सुरक्षा सींचते रहें
जिज्ञासा जहां कहे उसी ओर हम बहें

निर्धारित दिशा में बहना प्रगति है उत्थान
हर देश का है आदर पर अपना देश महान
तिरंगा हमारा भाल निरंतर ऊँचा करते रहें
जिज्ञासा जहां कहे उसी ओर हम बहें।

धीरेन्द्र सिंह
15.08.2026
07.02


स्मृति में

स्मृति में उभरे आपके भाव टटोलता रहूं
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं



यह कैसे आज आप अचानक उभर गईं
विस्तृत सुजान नभ में विद्युत सी निखर गई
आह्लाद के संवाद के भाव समेटता रहूं
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं

संकल्प कभी आप थे ना था कहीं विकल्प
ना जाने कैसे होते गया परिवेश सघन तल्ख
कोशिश यही थी जीवन में एक विशेषता रहूं
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं

नयनों के चमक में है स्वागत आपका आगमन
अधरों पर बसी मुस्कराहट करे आपका नमन
चेहरे पर आप ही बसी हैं इसे मैं योग्यता कहूँ
कभी चेहरा अपना ध्यान से मैं देखता रहूं।

धीरेन्द्र सिंह
14.08.2026

16.19

बुधवार, 12 अगस्त 2026

व्यक्ति और समाज

भावनाएं जग रही हैं अपनी ताल में
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में



व्यक्ति है अकेला या घिरा है समाज से
बस द्वंद्व लगे जीवन सामाजिक अंदाज से
परवश जी रहा है घिरा सामाजिक हाल में
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में

कड़ियाँ की कई लड़ियाँ लगती हैं बढियां
यहां यह वहां वह संबंधों की है फुलझड़ियाँ
आतिशबाजी यदाकदा होती मन चौपाल में
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में

धरती पर बसा है और गगन की चाह है
रिमझिम हैं फुहारें पर अगन की आह है
आंखें समाज की जैसे तांत्रिक कपाल मैं 
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में।

धीरेन्द्र सिंह
13.08.2026
10.08

सोमवार, 10 अगस्त 2026

जिंदगी

व्यक्ति भी एक किताब का हिसाब है
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब है

पन्ने प्रति पन्ने फड़फड़ाते पलट रहे हैं
हर पन्ने से इंसान इतराते लिपट रहे हैं
पल सजाने की कोशिश दुल्हन माहताब है
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब है

जीवन है एक डगर या लाभ-हानि का लेखा
उलझा वही जिसने ऑडिटर की तरह देखा
कर्म यात्री सा जो चला वही आफताब है
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब।है

कुछ प्यार के पन्ने कुछ संघर्ष की है ऋचाएं
जीते जहां पर जय मिली पराजय क्यों जगाएं
प्रणय जिनका भाग्य है वह ही नवाब हैं
त्रुटियां कहीं नहीं हिसाब लाजवाब है।

धीरेन्द्र सिंह
11.08.2026
06.13

रविवार, 9 अगस्त 2026

समाज

किस समाज की यह अवहेलना है
समाज से समाज को क्यों खेलना है
तख्तियों पर लिख गए हैं भाव कई
विचार से विचारों को लगे ठेलना है






धूप तपती दहकती बह रही है कहीं

चाँदनी का धर्म क्या हरदम बहकना है

व्यक्ति के लिए व्यक्ति ही है जरूरी भी

व्यक्तित्व रहे बना रंग अपना दमकना है


समाज ही साम्राज्य समाज ही विवाद

समाज की तरह जीवन को बेलना है

अवहेलना की कीमत चुकाते कई वर्ग

जो बढ़ चुके हैं आगे उन्हें क्या कहना है


तख्तियों का दौर है यही एक तौर है
बतौर शोर के यही सब तो करना है
युक्तियों की नियुक्तियों में कूटनीति है
नीति के रीति से कई भीत को ढहना है।

धीरेन्द्र सिंह
10.08.2026
09.03

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

"तुम पसंद आए, यह इत्तेफ़ाक था..."

 

छत्तीसगढ़ का यह गायक

बना अनुभूति का नायक


विनोद राजा का यह गायन
हर धड़कन का नव वातायन
कल्पना उड़ान में सहायक
बना अनुभूति का नायक

प्रतिभा कहां छुपी जग से
गायन सप्तक ऊंचे सुर में
गीत का मीत स्वर निभावक
बना अनुभूति का नायक

दो गानों की धूम बेबाक
दोनों में शब्द इत्तेफाक
संगीत ना जाने अभिभावक
बना अनुभूति का नायक

यह एक अपरिचित नाम है
इन गानों के क्षद्म गान हैं
विनोद राजा स्वर संवाहक
बना अनुभूति का नायक।

धीरेन्द्र सिंह
08.08.2026
06.36

गुरुवार, 6 अगस्त 2026

बारिश का नशा

बारिश का अपना नशा है
यदि कोई दिल में बसा है



घटाएं घिर-घिर दौड़ी आएं

जैसी यादें फिर-फिर आए

भाव ने भाव को कसा है

यदि कोई दिल में बसा है


अलगाव में भी निभाव है

वृक्ष कहीं बदलियों की छांव है

हर हाल में जीवन सजा है

यदि कोई दिल में बसा है


व्यक्ति से व्यक्ति हो जाता दूर

मेघ बरसते यह मिलन दस्तूर

शीतल हवाएं उमंगी दशा है

यदि कोई दिल में बसा है

देह नहीं नेह का संसार
स्नेह को प्रत्यक्ष कहां दरकार
धरा व्योम का फलसफा है
यदि कोई दिल में बसा है।

धीरेन्द्र सिंह
07.08.2026
08.55



मंगलवार, 4 अगस्त 2026

कविता

 कविता
उभरती है
एक नावयौना की तरह




भाग जाती है
करती अठखेलियाँ

उसे पकड़ने के लिए
होती नहीं उपयोगी दौड़
भला कौन पाया है पकड़
चंचल भावनाओं को
उछलती कामनाओं को;

सरहद होती है
कविता की भी
भागती है निरंतर ताकते
कभी छिपते
कभी लचकती नाचते
इतराती है, रिझाती है
भावनाओं को
भाव में पकाती है;

डूब जाती है कविता
जीवन की गहराई में
शायद दब जाती है
नहीं उठती भावनाओं की
लहरें
स्थिर जल सा शांत मन
समेटे रहता है बवंडर
जीवन भी तो बदलते रहता निरंतर;

अचानक छा जाती है कविता
घनेरी बदलियों की तरह
नहीं करती बूंदाबांदी
ना ही देती कोई आहट
बरस पड़ती है
झूमकर
हो जाती है प्रवाहित
शब्दों के किनारे बीच
ऐसे देती मन को
हरदम कविता सींच।

धीरेन्द्र सिंह
05.08.2026
06.34

शनिवार, 1 अगस्त 2026

सावन

शब्द चुपके आ पहुंचा भावनाओं का बन संवाहक

आप संशय में हैं उलझे समस्या यह उत्पन्न नाहक


बदलती है प्रीत रीत कल्पनाओं से परे अकस्मात
जैसे तपती दोपहरी में हो रिमझीम सावन बरसात।

गुरुवार, 30 जुलाई 2026

गठरी

अपनी उमर अपनी गठरी दौड़ रही अपनी पटरी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी



मंडरा रहे घनेरे बादल तोड़ने को उष्माभरी सांखल
अपने श्रम से जोड़ रहा व्यक्ति जीवन सुरभि प्रांजल
बूंदों में एक नई उमंग अर्पित करती घर्षण की बिजुरी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी

अभिलाषाओं के पवन झकोरे चाँदनी दहके भोरे
कब सपनों में चाह उठेगी होंगे जो चाहें सब पूरे
आकाश मुस्काता कहता व्योम भरो निजी अंजुरी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी

उमर की अपनी गति है काया कहती क्यों दुर्गति है
पटरी उबड़-खाबड़ मिलती, लक्ष्य-दौड़ में सहमति है
दौड़ बादलों का नभ में गीत सावन संग बजे खंजड़ी
लक्ष्य सबके अपने-अपने सपनों की सावनी कजरी।

धीरेन्द्र सिंह
31.07.2026
08.08



मंगलवार, 28 जुलाई 2026

कहाँ हो

तुम मुझसे ख़फ़ा होकर दगा दे गई
मंज़िल का ना पता क्या सदा दे गई

गूंज है अनुगूंज है दूरस्थ की सूझ है
पुंज भावनाओं का परिणाम अबूझ है
नाराजगी भी ऐसी कैसी अदा दे गई
मंजिल का ना पता क्या सदा दे गई

पलकों में नमी है तुम्हारी ही कमी है
अलकों में सितारों की महफ़िल जमी है
अनुभूतियां आसक्ति की वफ़ा दे गई
मंजिल का ना पता क्या सदा दे गई

कुछ कहती कुछ सताती हैं यह सदाएं
तुम कहाँ हो कैसे दिल का हाल बताएं
जीवन के राग बीच धुन धता दे गई
मंजिल का ना पता क्या सदा दे गई।

धीरेन्द्र सिंह
29.07.2026
06.49

आज

तथ्य कह रहा है कि सत्य नाराज है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है



सच में बदल रहा या हवा का है बदलाव
टहनियों को रहे काट दौड़-भाग रहा छांव
परिवर्तन की लहर है या परितृप्त साज है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है

कितना जटिल है जो है को बदल देना
फट जाता कहीं दूध बना लेते हैं छेना
युक्तियों की सूक्तियाँ भी लाजवाब हैं
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है

सघन को सहन का वहन करना ही होगा
दहन की तपन में यूँ ना कहीं जलना होगा
समझिए न मनुष्य का प्रखर कितना ताप है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है।

धीरेन्द्र सिंह
28.07.2026
21.15

अस्तित्व

कुछ गीत गुनगुनाइए प्रतीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो



जीवंतता केवल श्वासों का नहीं सरगम
सुगंधता कर्मों का श्वास मिश्रण रहे हरदम
एक धुन, एक लय का मोहक मीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो

हर क्षेत्र के यहां हैं विभिन्न उन्नत धुरंधर
हर नेत्र में बसा है नए लक्ष्य का समुंदर
कुछ करना ऐसा समाज की नई रीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो

सहजता से कहीं रहना अकर्मण्यता लगे
पलकें खुलीं हों जिसकी क्या हैं वह जगे
आकर्षक हो, अनूठा हो जगी प्रीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो।

धीरेन्द्र सिंह
28.07.2026
13.33

रविवार, 26 जुलाई 2026

जेन-जी और भाषा

जेन-जी हुजूम जंतर-मंतर परिवर्तनीय ले जिज्ञासा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा



प्रजातंत्र में विरोध भी तो है एक मौलिक अधिकार
पर भाषा में शब्द चयन बतलाते हैं व्यक्ति संस्कार
असामाजिक असभ्य शब्द से क्या टूटती निराशा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा

वस्त्र की आजादी है अभिव्यक्ति की भी स्वतंत्रता
जेन-जी आप न भूलिए आप भारत देश के नियंता
आप पर निर्भर देश है आप ही हैं सबकी नव आशा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा

संयोजन, आयोजन में जेन-जी है अति तेज प्रखर
पर यह क्या लक्ष्य प्राप्ति हेतु अशोभनीय शब्द डगर
भाषा से झुक गयी आशा जेन-जी क्यों की तमाशा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा।

धीरेन्द्र सिंह
27.07.2026
08.28

शनिवार, 25 जुलाई 2026

त्रिभुजी पत्रकार

त्रिभुज का अपना विशेष महत्व है जो दर्शाता है कि जिस को से भी देखी जाए उर्ध्वगामी ही दिखती है। पत्रकार यदि त्रिभुजी रूप में कार्यरत रहते हैं तो वह सामाजिक चेतना को विभिन्न आयाम देते हैं जिससे समाज यथोचित प्रगति, सहमति और प्रदर्शन कर पाता है। त्रिभुज का एक दूसरा रूप भी है जिसमें पंख पसारे व्योम को चूमने या लक्ष्य को भेदने की अभिलाषा नजर आती है। डॉ अरविंद सिंह को मैंने हमेशा त्रिभुजी के रूप में ही पाया है। त्रिभुजी पत्रकार के प्रमुख तीन अंग होते हैं सत्य के संग, सामान्य जनता की ओर तथा नएपन की उपलब्ध संसाधनों में पहचान। 

त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह अपने पत्रकारिता जीवन में सत्य का साथ पकड़कर समय-समय पर सत्य का साथ दिया। पत्रकारिता में सत्य को दस्तावेजी रूप देने के लिए इन्होंने "सामयिक ब्लिट्ज" नामक साप्ताहिकी का प्रकाशन वाराणसी से आरम्भ किया। यहां त्रिभुजी पत्रकारिता का एक पक्ष "सत्य" प्रमाणित हो रहा है। दूसरा पक्ष है सामान्य जनता की ओर बढ़ना। यहां सामान्य जनता की विभिन्न परिभाषाएं हो सकती हैं किंतु यदि वाराणासी को ध्यान में रखकर सामान्य जनता की पहचान की जाए तो ग्रामीण जनों का पक्ष प्रमुख रहेगा। इस पक्ष को प्रमाणित करता है त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह का नियमित अपने साप्ताहिकी "सामयिक ब्लिट्ज" को निःशुल्क कुछ गांव को उपलब्ध कराना। प्रसंगवश उल्लेख किया जा रहा है कि ग्रामीण साप्ताहिकी की प्रतीक्षा उत्सुकतापूर्वक करते हैं। उपलब्ध संसाधनों में नएपन का प्रमाण इस त्रिभुजी पत्रकार के वाराणसी में आयोजित विभिन्न कार्यक्रम तथा अनेक मंदिर निर्माण, गरीबोंनको भोजन एवं कंबल आदि वितरण से जुड़ा है।

वाराणसी के स्पंदनों को जितनी कुशलता से इस त्रिभुजी पत्रकार ने अपनी पुस्तकों में समेटा है ऐसा उदाहरण वर्तमान में कहीं देखने को नहीं मिल रहा है। प्रत्येक अच्छे और बड़े काम में एक धुन होती है लय होती है जिसके आधार पर कार्यों में लयबद्धता बनी रहती है। यदि इन त्रिभुजी पत्रकार महोदय की धुन की बात करें तो वह हैं वाराणसी के सांसद  और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी तथा लय है विशेषकर वाराणसी के समग्र विकास गति। पिछले कुछ वर्षों से लगातार पुस्तकों का प्रकाशन वाराणसी के पल-पल, छिन-छिन का पारदर्शी दस्तावेज सा है। यह पुस्तक पत्रकार की डायरी की त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह के काशी के प्रति समर्पण और अनुराग को दर्शाता है। यह पुस्तक भी एक पारदर्शी दस्तावेज की तरह है। 

धीरेन्द्र सिंह

कवि और ब्लॉगर

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

रिश्ते

रिश्तों की डोर में न मिलता ओर-छोर
भोर जिंदगी का बंदगी करे भी तो क्या
सूर्य किरणें जगाती सजाती हैं निसदिन
पक्षियों की चहचआहट लगे क्या नया






संवेदनाएं सिमट रहीं चिमटी से उगें भाव
कामनाएं टिड्डी दल मन के फसल का क्या
प्रतियोगिता में स्वार्थ का समय-समय हवन
धुआं उठता बहुत घनेरा हवा का इसमें क्या

इंटरनेट से ही प्रायः अपनों से होती भेंट
दरवाजे पर दें दस्तक द्वार खुल रहा क्या
दो-तीन दिन ठहर लिए तो वर्ष भर छुट्टी
बर्तन को कोई साझा अब कर रहा है क्या

यह प्रवाह है समय का जय-जय तो कीजिए
एक उम्र चुकाने का समय रह गया ही क्या
ढल जाना समय संग जैसे उड़ती चले पतंग
रुख मोड़ने की जिद में कुछ मिल सका है क्या।

धीरेन्द्र सिंह
25.07.2026
08.16

डायरी क्यों

 डायरी क्यों

एक स्वाभाविक प्रश्न सहज ही इस पुस्तक के प्रबुद्ध पाठक के मन में उभर सकता है कि पत्रकार की डायरी क्यों ? इसे कदापि न स्वीकारा जाए कि इस पुस्तक के लेखक व पत्रकार की यह कोई निजी डायरी है। सामान्यतया प्रत्येक पत्रकार की अपनी डायरी होती है जिसके आधार पर वह पत्रकारिता को गतिशील बनाने में होता है। यदि इस पुस्तक विशेष की बात की जाए तो यह डायरी सार्वजनिक जीवन के सार्वजनिक समाचार का सार्वजनिक हित सूचक है। ज्ञातव्य है कि प्रत्येक पत्रकार की अपनी डायरी होती है किंतु कभी-कभी ऐसे व्यक्तित्व का प्रादुर्भाव होता है कि एकल व्यक्तित्व आधारित डायरी निर्मित हो जाती है।

"माँ गंगा ने बुलाया है" यह आस्थापूर्ण वाक्य भारतीय जनमानस के पटलनपर एक चेहरा उभरता है जिसे विश्व नरेंद्र मोदी के नाम से पहचानता है। काशी में इतना प्रबल, प्रखर और प्रियग्राही वाक्य गंगा तट पर नहीं गूंजा था। इसे वाक्य कहना भी इस वाक्य में निहित आस्था, सम्मान और समर्पण के प्रति न्यायोचित नहीं होगा। यह एक वाक्यबनाहीं बल्कि वाराणसी के लिए विशेष तौर पर एक सूक्ति बन गया था जो अब भी बनारस की हवाओं में गूंज रहा था। यहीं से पत्रकार दृष्टिकोण ने चेताया कि अब काशी में कुछ अति विशिष्ट होने की प्रबल संभावनाएं है। पत्रकारिता धर्म ने नरेंद्र मोदी को वाराणासी में गहनता से समझना और प्रत्येक गतिविधियों को सहेजना आरम्भ किया और निर्मित हो गयी पत्रकार की डायरी जो आपके समक्ष प्रस्तुत है।

डायरी की यह प्रस्तुति धरा पर गंगा अवतरण के उल्लेख के बिना अपूर्ण कहा जा सकता है। भगीरथ या भागीरथ की घोर तपस्या और दृढ़ निश्चय के बल पर ब्रह्मा के सुझाव पर शंकर ने अपनी जटा के द्वारा गंगा के असाधारण वेग को नियंत्रित कर धरा पर प्रवाहित किया। जटा जो वर्तमान में बुद्धिबल और दृष्टिकोण बल के समानार्थी है उसका प्रदर्शन नरेंद्र मोदी ने काशी में किया। इस बल के परिणामस्वरूप वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर का ही निर्माण नहीं हुआ बल्कि अयोध्या में राम मंदिर भी अपनी भव्यता और दिव्यता के साथ पुनर्स्थापित हुआ। यदि कहा जाए कि सनातन धर्म के लिए नरेंद्र मोदी का प्रयास भगीरथ प्रयास था तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

इसे योगायोग कहा जाए या सुखद संयोग कि जिस कुल में भगीरथ का जन्म हुआ वही कुल इस पुस्तक के लेखक का भी है। परंपराओं के गौरव का उल्लेख हर कोई करता है इसलिए प्रसंगवश इस तथ्य का भी उल्लेख किया गया। गंगा सदियों से काशी से सटी हुई गतिमान हैं किंतु नरेंद्र मोदी के वाराणसी का सांसद बनने के बाद जो अभिमान काशी को हुआ है वह भगीरथ प्रयास ही तो है। बनारसी साड़ी की तरह नरेंद्र मोदी काशी को नए धागे से बुनते और संवारते गए जिससे भारत देश ही नहीं बल्कि विश्व का भी ध्यानाकर्षण हुआ। बदला हुआ आकर्षक काशी पहले से बहुत अधिक लोगों को आकर्षित कर रही है। तमिल संगमम के द्वारा उत्तर भारतौर दक्षिण भारत के बीचेक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक पुल निर्मित करना नरेंद्र मोदी की ही दूरदर्शिता है।

समय कभी टूटता नहीं है बल्कि वह परिवर्तित होता है नए रंग और ढंग में और निरंतर गतिमान रहता है। इस गतिमान समय पर काशी की मूल प्रवृत्ति को बरकरार रखते हुए नई चित्रकारी कर देना नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्तित्व के लिए ही संभव है। बनारस नरेंद्र मोदी को नव रचयिता के रूप में भी जानता है। एक पत्रकार घटित लगभग सभी घटनाओं का साक्षी होता है। तथ्य ही नहीं बल्कि सत्य आधारित तथ्य को समाज के समक्ष प्रस्तुत करना पत्रकार का धर्म है। एक पत्रकार की दृष्टि जब समाज और उसके परिवेश में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की सफल उपलब्धियों का क्रम निर्मित करता है तब कहीं जाकर एक पत्रकार की डायरी सजती है। उल्लेखनीय है कि गंगा और शिव आधारित काशी है जिसे नरेंद्र मोदी ने संवारा है अतएव भगीरथ, शिव, गंगा, विश्वनाथ धाम, अयोध्या का राम मंदिर आदि डायरी के प्रेतक ऊर्जा हैं। आपके समक्ष इस डायरी को प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता हो रही है।

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

निर्मुक्त हो जीवन

आस जब तुम्हारी है प्यास जब तुम्हारी है
कहो क्यों न करूँ मैं फिर तुम्हारी अर्चना
सृष्टि जब दुलारी है दृष्टि की जब लयकारी है
कहो क्यों न हृदय तब करे मुग्धित गर्जना






शक्ति की सब करें अर्चना अद्भुत है सर्जना
पुष्प, दीप यही सब सीख क्यों नही हो कामना
ध्यान का ही गान चलता जीवन है इसमें पलता
कहो क्यों न हो व्यथित कथित का हो सामना







स्वयं को बांधकर अभिलाषाएं बांटकर गतिशील
कहो क्यों न करूं में फिर बंधनों का मर्दना
सत्य हो तुम शिष्ट हो पर एक परिशिष्ट हो
कहो क्यों न नव पृष्ठ रचूं लेकर प्रखर रचना







कठिन नहीं शब्द हैं भाव भी नहीं हैं स्तब्ध
कहो फिर क्यों न गढूं शब्द निहित अभ्यर्थना
बोलती ही तुम कितनी संतुलन के बाद भी
उन्मुक्त जीवन के लिए निर्मुक्त हो जीवन व्यंजना।







धीरेन्द्र सिंह
24.07.2026
05.49
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मंगलवार, 21 जुलाई 2026

पथिक हूँ

मैं ही कारवां, मैं ही गति, मैं ही पथिक हूँ
संघर्ष है, समस्या हैं किंतु मस्त व्यथित हूँ




जग जाग रहा लगता पर प्रायः उनींदा है
दृग ताक रहा अक्सर पर स्वप्न सरीखा है
कुछ कर्म कुछ भाग्य से लगता समर्थित हूँ
संघर्ष है, समस्या है किंतु मस्त व्यथित हूँ

जो भी जुड़ा चलता रहा कुछ रिश्ते चुरा
निरपेक्ष मैं रहा पर कह गया मुझको बुरा
मैं जैसा था वैसा हूँ वह कहते परिवर्तित हूँ
संघर्ष है, समस्या है किंतु मस्त व्यथित हूँ

कांटे नहीं तो गुलाब की परिकल्पना कठिन
बांटे नहीं तो श्वासों की अभ्यर्थना मलिन
शुचिता से जी रहा हूँ समाधान समर्पित हूँ
संघर्ष है, समस्या है किंतु मस्त व्यथित हूँ।

धीरेन्द्र सिंह
22.07.2026
08.37

सोमवार, 20 जुलाई 2026

स्वीकार्य जिंदगी

समझकर भी नासमझ सी है कार्य बंदगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी




जुड़े हुए हैं जो कुछ मुड़े भी लगते वो
अपनेपन की भावना में रहता जीवन बो
सब कुछ सहज हो जैसे भीतर तो शर्मिंदगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी

दांतों के बीच जीभ कटती है पर न बोलती
कड़वाहट भी हो कितनी जिह्वा मीठा बोलती
सहन के गगन में रहे परिवेश परिवार बुलन्दगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी

सबका जीवन अलग भिन्न तंत्र-मंत्र, आराधना
अपनों की खातिर जीना पिघलती सी कामना
झर चुके हैं खुद लुटे हैं पर अपनों बीच हदबन्दगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी।

धीरेन्द्र सिंह
21.07.2026
11.10

आप हैं बस सोचती

सींचता है हृदय हरदम बनकर पुनीत पावन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन

आप नयनों में नहीं झांकती बस ताकती है
मेघ पुतली में सघन हैं सत्य यह नहीं मानती हैं
नयन भर नमी हमेशा पलकों का रहता है छावन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन

चमकती हैं पुतलियां होता है जब नेह गर्जन
आप ही कारण हैं आप ही हैं भाव बूंद नर्तन
झमाझम भाव वर्षा में हो जाता जलमग्न तन आंगन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन

हृदय सूर्य सा दग्ध मेरा आप भावना का सागर
वाष्पित होती मन में बसती रचती रहती बादर
हृदय बरसता लिए सहजता और भींगता दामन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन।

धीरेन्द्र सिंह
21.07.2026
03.49

शनिवार, 18 जुलाई 2026

आत्मिक संघर्ष

पकड़ना चाहते इतना पर कितना छूटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है




प्यार के हिलोरे हैं अनुराग के बेचैन किनारे
वह अपना है तो अनवरत अपने को दुलारें
जिंदगी उपद्रव भी लगे और समय लूटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है

बादलों सा उड़ता नभ से जुड़ता चित्त चंचल
कभी बाहों का घेरा तो कभी उड़ता आँचल
विचारों में बंधा जीवन अपने में ही घुटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है

धधकती आग भीतर पर मंद होता प्रकाश है
वृष्टि की चर्चे बहुत हैं पर दिखती नई प्यास है
तन की कहें मन की सुने व्यक्ति इसमें लुटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है।

धीरेन्द्र सिंह
19.07.2026
16.42

जीवन

मिल रहे हैं दर्द मगर मर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं




हैं जो अपने क्यों लगे गलत पनपने
लगाव था निभाव भविष्य के सपने
फिसल गए स्वार्थ का यूँ तर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं

भावुकता भर स्वभाव वही हाव-भाव
अपनों के बीच खोजते पहचानी छांव
ऐसे बन गयी दूरियां लिए कर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं

मन है टूटता फिर बनता जैसे कोशिकाएं
अपनों का दर्द कितना कोई ना बता पाए
जीना यही है जीवन दर्द यूँ दर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं।

धीरेन्द्र सिंह
18.07.2026
20.27

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

मनभावन

मन के पालने में अभिलाषाओं का बिछावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है




चल पड़े हैं लोग निर्धारित श्रेष्ठता की चाह में
निज श्रेष्ठता अचर्चित अचंभित पड़े राह में
मन पालना का झूलना लगे प्रतिपल पावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है

झूलना नियति है या झूले की स्वाभाविक गति है
भविष्य की चिंताएं हैं यही आज की नियति है
वर्तमान भ्रमित करता न्यायोचित तथ्य जलावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है

एक ही समाज की एकमत नहीं लगती बोलियां
एक सिद्ध मार्ग लगे दर्द निवारण के लिए गोलियां
प्रगति है प्रताप है जीवन कई अज्ञात बुझावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है।

धीरेन्द्र सिंह
17.07.2026
19.00

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

सत्य-असत्य

सत्य पिघला सरलता से तरलता का बोध है
असत्य का प्रयास है पर सत्य का जयघोष है




प्रदर्शन, विज्ञापन विभिन्न तरह की बनती रील
क्षद्म हवा का झोंका निर्मित पतंग को देते ढील
जनमानस की चेतना में काल्पनिक असंतोष है
असत्य का प्रयास है पर सत्य का जयघोष है

सोशल मीडिया महाभारत में भांति-भांति योद्धा
अनचीन्हे से अस्त्र-शस्त्र से निर्मित होती श्रद्धा
धर्मशास्त्र से राजनीतिशास्त्र प्रचलित कोष है
असत्य का प्रयास है पर सत्य का जयघोष है

व्यक्ति अपनी लंबाई से छुपाए अपनी बिवाई
दर्द-दर्द बहका-भटका क्या कर पाएगी दवाई
कर्म कहार कांधे डोली में अभिलाषा निर्दोष है
असत्य का प्रयास है पर सत्य का जयघोष है।

धीरेन्द्र सिंह
मूल लेखन :-16.07.2026 
19.08
समूह में पोस्ट:- 17.07.2026

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

धड़कन-धड़कन

कहीं न कहीं तो बंधना मन के लिए जरूरी है
साँसों का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है

पग भी चले थे राह में कंकड़ियों से नित उलझते
कई लक्ष्य गए गुजर कथ्य जीवन के भी समझते
सबकुछ बसा है दिल में उदासी तो कभी मगरूरी है
साँसों का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है

जीवन के कटोरे में भर-भर के मिले है दूध-भात
कटोरे को है रहता भरता कोई तो हितैषी अज्ञात
हर सांस जो चले साथ कोई रिश्ता हो, ना धूरी है
सांसो का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है

बंधता है मन जहां वही लगता सुखकर ठाँव है
यदि देखें गहनता से तो मन भी तन का निभाव है
हर तड़पन एक यात्रा, लगती पूरी कभी अधूरी है
सांसो का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है।

धीरेन्द्र सिंह
15.07.2026
08.40