मंगलवार, 28 जुलाई 2026
कहाँ हो
तुम मुझसे ख़फ़ा होकर दगा दे गई
आज
तथ्य कह रहा है कि सत्य नाराज है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है
अस्तित्व
कुछ गीत गुनगुनाइए प्रतीत तो हो
अस्तित्व प्रश्नचिन्हित कोई गीत तो हो
रविवार, 26 जुलाई 2026
जेन-जी और भाषा
जेन-जी हुजूम जंतर-मंतर परिवर्तनीय ले जिज्ञासा
सुनने वाले हो गए हतप्रभ देखकर इनकी भाषा
शनिवार, 25 जुलाई 2026
त्रिभुजी पत्रकार
त्रिभुज का अपना विशेष महत्व है जो दर्शाता है कि जिस को से भी देखी जाए उर्ध्वगामी ही दिखती है। पत्रकार यदि त्रिभुजी रूप में कार्यरत रहते हैं तो वह सामाजिक चेतना को विभिन्न आयाम देते हैं जिससे समाज यथोचित प्रगति, सहमति और प्रदर्शन कर पाता है। त्रिभुज का एक दूसरा रूप भी है जिसमें पंख पसारे व्योम को चूमने या लक्ष्य को भेदने की अभिलाषा नजर आती है। डॉ अरविंद सिंह को मैंने हमेशा त्रिभुजी के रूप में ही पाया है। त्रिभुजी पत्रकार के प्रमुख तीन अंग होते हैं सत्य के संग, सामान्य जनता की ओर तथा नएपन की उपलब्ध संसाधनों में पहचान।
त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह अपने पत्रकारिता जीवन में सत्य का साथ पकड़कर समय-समय पर सत्य का साथ दिया। पत्रकारिता में सत्य को दस्तावेजी रूप देने के लिए इन्होंने "सामयिक ब्लिट्ज" नामक साप्ताहिकी का प्रकाशन वाराणसी से आरम्भ किया। यहां त्रिभुजी पत्रकारिता का एक पक्ष "सत्य" प्रमाणित हो रहा है। दूसरा पक्ष है सामान्य जनता की ओर बढ़ना। यहां सामान्य जनता की विभिन्न परिभाषाएं हो सकती हैं किंतु यदि वाराणासी को ध्यान में रखकर सामान्य जनता की पहचान की जाए तो ग्रामीण जनों का पक्ष प्रमुख रहेगा। इस पक्ष को प्रमाणित करता है त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह का नियमित अपने साप्ताहिकी "सामयिक ब्लिट्ज" को निःशुल्क कुछ गांव को उपलब्ध कराना। प्रसंगवश उल्लेख किया जा रहा है कि ग्रामीण साप्ताहिकी की प्रतीक्षा उत्सुकतापूर्वक करते हैं। उपलब्ध संसाधनों में नएपन का प्रमाण इस त्रिभुजी पत्रकार के वाराणसी में आयोजित विभिन्न कार्यक्रम तथा अनेक मंदिर निर्माण, गरीबोंनको भोजन एवं कंबल आदि वितरण से जुड़ा है।
वाराणसी के स्पंदनों को जितनी कुशलता से इस त्रिभुजी पत्रकार ने अपनी पुस्तकों में समेटा है ऐसा उदाहरण वर्तमान में कहीं देखने को नहीं मिल रहा है। प्रत्येक अच्छे और बड़े काम में एक धुन होती है लय होती है जिसके आधार पर कार्यों में लयबद्धता बनी रहती है। यदि इन त्रिभुजी पत्रकार महोदय की धुन की बात करें तो वह हैं वाराणसी के सांसद और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी तथा लय है विशेषकर वाराणसी के समग्र विकास गति। पिछले कुछ वर्षों से लगातार पुस्तकों का प्रकाशन वाराणसी के पल-पल, छिन-छिन का पारदर्शी दस्तावेज सा है। यह पुस्तक पत्रकार की डायरी की त्रिभुजी पत्रकार डॉ अरविंद सिंह के काशी के प्रति समर्पण और अनुराग को दर्शाता है। यह पुस्तक भी एक पारदर्शी दस्तावेज की तरह है।
धीरेन्द्र सिंह
कवि और ब्लॉगर
शुक्रवार, 24 जुलाई 2026
रिश्ते
रिश्तों की डोर में न मिलता ओर-छोर
भोर जिंदगी का बंदगी करे भी तो क्या
सूर्य किरणें जगाती सजाती हैं निसदिन
पक्षियों की चहचआहट लगे क्या नया
डायरी क्यों
डायरी क्यों
एक स्वाभाविक प्रश्न सहज ही इस पुस्तक के प्रबुद्ध पाठक के मन में उभर सकता है कि पत्रकार की डायरी क्यों ? इसे कदापि न स्वीकारा जाए कि इस पुस्तक के लेखक व पत्रकार की यह कोई निजी डायरी है। सामान्यतया प्रत्येक पत्रकार की अपनी डायरी होती है जिसके आधार पर वह पत्रकारिता को गतिशील बनाने में होता है। यदि इस पुस्तक विशेष की बात की जाए तो यह डायरी सार्वजनिक जीवन के सार्वजनिक समाचार का सार्वजनिक हित सूचक है। ज्ञातव्य है कि प्रत्येक पत्रकार की अपनी डायरी होती है किंतु कभी-कभी ऐसे व्यक्तित्व का प्रादुर्भाव होता है कि एकल व्यक्तित्व आधारित डायरी निर्मित हो जाती है।
"माँ गंगा ने बुलाया है" यह आस्थापूर्ण वाक्य भारतीय जनमानस के पटलनपर एक चेहरा उभरता है जिसे विश्व नरेंद्र मोदी के नाम से पहचानता है। काशी में इतना प्रबल, प्रखर और प्रियग्राही वाक्य गंगा तट पर नहीं गूंजा था। इसे वाक्य कहना भी इस वाक्य में निहित आस्था, सम्मान और समर्पण के प्रति न्यायोचित नहीं होगा। यह एक वाक्यबनाहीं बल्कि वाराणसी के लिए विशेष तौर पर एक सूक्ति बन गया था जो अब भी बनारस की हवाओं में गूंज रहा था। यहीं से पत्रकार दृष्टिकोण ने चेताया कि अब काशी में कुछ अति विशिष्ट होने की प्रबल संभावनाएं है। पत्रकारिता धर्म ने नरेंद्र मोदी को वाराणासी में गहनता से समझना और प्रत्येक गतिविधियों को सहेजना आरम्भ किया और निर्मित हो गयी पत्रकार की डायरी जो आपके समक्ष प्रस्तुत है।
डायरी की यह प्रस्तुति धरा पर गंगा अवतरण के उल्लेख के बिना अपूर्ण कहा जा सकता है। भगीरथ या भागीरथ की घोर तपस्या और दृढ़ निश्चय के बल पर ब्रह्मा के सुझाव पर शंकर ने अपनी जटा के द्वारा गंगा के असाधारण वेग को नियंत्रित कर धरा पर प्रवाहित किया। जटा जो वर्तमान में बुद्धिबल और दृष्टिकोण बल के समानार्थी है उसका प्रदर्शन नरेंद्र मोदी ने काशी में किया। इस बल के परिणामस्वरूप वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर का ही निर्माण नहीं हुआ बल्कि अयोध्या में राम मंदिर भी अपनी भव्यता और दिव्यता के साथ पुनर्स्थापित हुआ। यदि कहा जाए कि सनातन धर्म के लिए नरेंद्र मोदी का प्रयास भगीरथ प्रयास था तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
इसे योगायोग कहा जाए या सुखद संयोग कि जिस कुल में भगीरथ का जन्म हुआ वही कुल इस पुस्तक के लेखक का भी है। परंपराओं के गौरव का उल्लेख हर कोई करता है इसलिए प्रसंगवश इस तथ्य का भी उल्लेख किया गया। गंगा सदियों से काशी से सटी हुई गतिमान हैं किंतु नरेंद्र मोदी के वाराणसी का सांसद बनने के बाद जो अभिमान काशी को हुआ है वह भगीरथ प्रयास ही तो है। बनारसी साड़ी की तरह नरेंद्र मोदी काशी को नए धागे से बुनते और संवारते गए जिससे भारत देश ही नहीं बल्कि विश्व का भी ध्यानाकर्षण हुआ। बदला हुआ आकर्षक काशी पहले से बहुत अधिक लोगों को आकर्षित कर रही है। तमिल संगमम के द्वारा उत्तर भारतौर दक्षिण भारत के बीचेक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक पुल निर्मित करना नरेंद्र मोदी की ही दूरदर्शिता है।
समय कभी टूटता नहीं है बल्कि वह परिवर्तित होता है नए रंग और ढंग में और निरंतर गतिमान रहता है। इस गतिमान समय पर काशी की मूल प्रवृत्ति को बरकरार रखते हुए नई चित्रकारी कर देना नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्तित्व के लिए ही संभव है। बनारस नरेंद्र मोदी को नव रचयिता के रूप में भी जानता है। एक पत्रकार घटित लगभग सभी घटनाओं का साक्षी होता है। तथ्य ही नहीं बल्कि सत्य आधारित तथ्य को समाज के समक्ष प्रस्तुत करना पत्रकार का धर्म है। एक पत्रकार की दृष्टि जब समाज और उसके परिवेश में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की सफल उपलब्धियों का क्रम निर्मित करता है तब कहीं जाकर एक पत्रकार की डायरी सजती है। उल्लेखनीय है कि गंगा और शिव आधारित काशी है जिसे नरेंद्र मोदी ने संवारा है अतएव भगीरथ, शिव, गंगा, विश्वनाथ धाम, अयोध्या का राम मंदिर आदि डायरी के प्रेतक ऊर्जा हैं। आपके समक्ष इस डायरी को प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता हो रही है।
गुरुवार, 23 जुलाई 2026
निर्मुक्त हो जीवन
आस जब तुम्हारी है प्यास जब तुम्हारी है
कहो क्यों न करूँ मैं फिर तुम्हारी अर्चना
सृष्टि जब दुलारी है दृष्टि की जब लयकारी है
कहो क्यों न हृदय तब करे मुग्धित गर्जना
शक्ति की सब करें अर्चना अद्भुत है सर्जना
पुष्प, दीप यही सब सीख क्यों नही हो कामना
ध्यान का ही गान चलता जीवन है इसमें पलता
कहो क्यों न हो व्यथित कथित का हो सामना
स्वयं को बांधकर अभिलाषाएं बांटकर गतिशील
कहो क्यों न करूं में फिर बंधनों का मर्दना
सत्य हो तुम शिष्ट हो पर एक परिशिष्ट हो
कहो क्यों न नव पृष्ठ रचूं लेकर प्रखर रचना
कठिन नहीं शब्द हैं भाव भी नहीं हैं स्तब्ध
कहो फिर क्यों न गढूं शब्द निहित अभ्यर्थना
बोलती ही तुम कितनी संतुलन के बाद भी
उन्मुक्त जीवन के लिए निर्मुक्त हो जीवन व्यंजना।
धीरेन्द्र सिंह
24.07.2026
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मंगलवार, 21 जुलाई 2026
पथिक हूँ
मैं ही कारवां, मैं ही गति, मैं ही पथिक हूँ
संघर्ष है, समस्या हैं किंतु मस्त व्यथित हूँ
सोमवार, 20 जुलाई 2026
स्वीकार्य जिंदगी
समझकर भी नासमझ सी है कार्य बंदगी
बचकर भी हंसकर उलझ स्वीकार्य जिंदगी
आप हैं बस सोचती
सींचता है हृदय हरदम बनकर पुनीत पावन
आप हैं बस सोचती बरसता है केवल सावन
शनिवार, 18 जुलाई 2026
आत्मिक संघर्ष
पकड़ना चाहते इतना पर कितना छूटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है
जीवन
मिल रहे हैं दर्द मगर मर्ज तो नहीं
सहनशक्ति जब तलक हर्ज तो नहीं
शुक्रवार, 17 जुलाई 2026
मनभावन
मन के पालने में अभिलाषाओं का बिछावन है
भाव सुप्त भविष्य, पर लगे आज मनभावन है
गुरुवार, 16 जुलाई 2026
सत्य-असत्य
सत्य पिघला सरलता से तरलता का बोध है
असत्य का प्रयास है पर सत्य का जयघोष है
मंगलवार, 14 जुलाई 2026
धड़कन-धड़कन
कहीं न कहीं तो बंधना मन के लिए जरूरी है
साँसों का है कारवां धड़कन-धड़कन की दूरी है
सोमवार, 13 जुलाई 2026
बस प्यार
आपकी परिभाषा कुछ हो पर प्यार है बस प्यार
नयनों का मस्तूल है, हृदय-हृदय सुधि पतवार
रविवार, 12 जुलाई 2026
सेवानिवृत्ति
अपने घर में सबसे बड़ा होना तो सम्मान है
सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है
संपन्नता की ध्वजा व्यवस्थित विधिवत सजा फुरसत की टोपी पहने कहें जिंदगी दे मजा जीवन कहे राग, द्वेष, विषाद का बहे तूफान है सेवानिवृत्ति बाद ढूंढते कहां पड़ा अभिमान है
शनिवार, 11 जुलाई 2026
बात लग गई
बातों बातों में न कैसे बोल थाप लग गई
आग लगी रे आग दिल पर बात लग गई
शनिवार, 4 जुलाई 2026
बारिश नीति
बारिश के फुहारों सी है आपकी अनुभूति
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति
कल्पनाओं में सजती हैं प्रीति की कामनाएं
आकर्षण से रचती हैं रीति की भावनाएं
बात जब अभिव्यक्ति की हो संकोच प्रतीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति
हृदय आत्म से जो ना संबंधित, वह मुखर हैं
कुछ भी कभी भी बोल दे, वह रहगुजर है
धड़कन, तड़पन ऐसे लोगों के लिए अतीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति
बरस रही है झूम आपकी सभी सुंदरता
क्यों हो रही हिचक दिल में पर आतुरता
कैसे लोग कर लेते कईयों से प्रणय प्रीत
अभिव्यक्त हो न सके तो यही चाहत नीति।
धीरेन्द्र सिंह
05.07.2026
11.16
शुक्रवार, 3 जुलाई 2026
उपवन मौन है
डंठलों को पूछता कौन है
उपवन यहां पर भी मौन है
पुष्प का अपार भार है संभाले
कंटकों की धार को भी सँवारे
सुगंध चहुँओर तरंग आध पौन है
उपवन यहां पर भी मौन है
बागबानी में डंठलों को दाना-पानी
पुष्प और कंटक की है जिंदगानी
कैंची कटा पुष्पडंठल सम्मान छौन है
उपवन यहां पर भी मौन है
है न कराहता ना उन्माद दहाड़ता
मौसमी प्रहार को मौन पछाड़ता
डंठल अनदेखे से सपनों का गौन है
उपवन यहां पर भी मौन है।
धीरेन्द्र सिंह
04.07.2026
07.57
गुरुवार, 2 जुलाई 2026
एडमिन-मॉडरेटर
हिंदी के कई समूह लिए कई चक्रव्यूह
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह
समूह सदस्य संख्या अधिक पोस्ट कम
टिप्पणियां गिनी-चुनी लाइक भी बेदम
समूह संचालन अति कठिन चिंतित रह
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह
नया चलन शुरू हुआ सदस्यों को रिझाना
पोस्ट ऐसी हो जिसे पढ़ कामना उभर जाना
यह श्रम है समर्पण है चमकाना समूह मुहँ
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह
कॉपी पेस्ट पर हैं जीवित कई हिंदी समूह
मौलिकता कहां से लाएं सदस्य सुप्त ऊंघ
कितनी करूँ प्रशंसा आसान कार्य नहीं समूह
एडमिन, मॉडरेटर नित बनाते नए व्यूह।
धीरेन्द्र सिंह
03.07.2026
07.22
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मंगलवार, 30 जून 2026
पथप्रदर्शक
भटक रही नव पीढ़ी नए विचारों का ले अम्बार
उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार
सुधारना, संवारना नया प्रचलित यह कारोबार
प्रतिभा स्वयं निखरती पथप्रदर्शक कहें संवार
पिछली पीढ़ी सोचती नव पीढ़ी बुद्धू गंवार
उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार
"मोटिवेशनल स्पीकर" उभरती चतुर प्रक्रिया
वेद-शास्त्र, धर्मग्रंथ की नए शब्दों की क्रिया
नई पीढ़ी की उन्मुक्तता को कहें लगाएं कतार
उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार
हर बीज का अपना विकास निजी है पल्लवन
खाद-पानी-धूप मिले यथेष्ट खुला रहे उपवन
प्रतिभा होती विकसित नव चेतना की हुंकार
उक्तियों की सूक्तियाँ हैं पथप्रदर्शक अपरम्पार।
धीरेन्द्र सिंह
02.07.2026
06.32







