इतना रीता भी नहीं कि
ढूंढू व्यक्ति करने को बात
इतना भरा भी नहीं कि
कर सकूं अनदेखा जज्बात
मन की कूंची है तत्पर
बहुरंगी भावनाओं की सौगात
इतना रीता भी नहीं कि
ढूंढू व्यक्ति करने को बात
इतना भरा भी नहीं कि
कर सकूं अनदेखा जज्बात
मन की कूंची है तत्पर
बहुरंगी भावनाओं की सौगात
उम्र मुझसे मांगती है सरसराती रीति
अन्य प्रपंच ना भाए प्रणय जीवन गीत
कब कहां चूका रीता सा है लगता कहाँ
तार झंकृत हैं सभी सुप्त आपका प्रतीत
तार के कसाव का कौशल यदि छूटे
भरभराती सी लगे चट्टान निर्मित भीत
वर्तमान के सरगम में नवीनताएँ अनेक
क्या मिलेगा सोचकर कैसा था अतीत
भावनाएं पक जाने पर बदल देती रूप
सुगंध, मिठास, अहसास रहते वैसे मीत
उम्र एक बदलाव है रूप, रंग, तरंग का
रुनझुन मादकता ना बदले माथा ना पीट।
धीरेन्द्र सिंह
23.03.2026
09.12
सत्य क्या है सांझ सरल अरुणाई
रात्रि लगे तिमिर किसी को तरुणाई
भाव सहित दृष्टि की बहती सर्जना
जग की विविधता चेतना की परछाईं
महत्व का घनत्व है अपनत्व सघन
गगन का दहन है तपन की रुसवाई
आकर्षण कर घर्षण करता विकर्षण
बदन बहुरंगी अतरंगी द्रवित चतुराई
कामना के पर्व में योजना स्व सर्व
याचना भी रचना करे जैसे पुरवाई
मोह के खोह में देह लगे अति सुबोध
अभिलाषाएं फूट पड़ें वासंती अमराई।
धीरेन्द्र सिंह
22.03.2026
08.12
गोवा
एक संस्कृति
एक सभ्यता
मानवता का
अभिव्यक्ति का
स्वतंत्रता का,
सागत के तट
विशिष्ट पहचान
लिए अपना आसमान
विविध विधान
नए मूल्य विज्ञान
चेतना के,
यहां व्यक्तित्व निर्द्वंद्व
स्वयं को अभिव्यक्त करता
नहीं परतंत्र
यौवन चहुंओर पसरा
भावनाओं का गणतंत्र
स्वयं की सेवा
गोवा,
मदिरा, मैथुन, मनोकामना
कल्पना का यथार्थ सामना
परिधान में परिणय
परिणय में विधान
जीव का सत्य से सामना
उर मेवा
गोवा,
सहज सुविज्ञ बन आइए
स्वयं को स्वयं से छाईए
अंतर्चेतना प्रज्वलित हो
अभिव्यक्त अपने गाइए
आत्मसेवा
गोवा।
धीरेन्द्र सिंह
21.03.2026
21.46
शिव और शक्ति
नारी है भक्ति
सुदृढ, सक्षम, सुकोमल
संरचना की शतदल
युगनिर्माण साक्षी
नारी ही भक्ति
सनातन का आधार
नारी शक्ति प्रकार
आरोहण आसक्ति
नारी ही भक्ति
सांस-सांस नारी रूप
आस-साथ नारी धूप
नारी वैभव, मुक्ति
नारी ही भक्ति
अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष
ध्यानाकर्षण हो सहर्ष
नारी नहीं युक्ति
नारी ही भक्ति 🙏
धीरेन्द्र सिंह
11.18
08.03.2026
रचनाओं को
निरंतर लाइक करना
सम्मान है
रचना और रचनाकार का,
रचनाकार का दायित्व है
लाइक करनेवाले को देना
धन्यवाद
पर कैसे?
लाइक कर्ता के
इनबॉक्स में जाकर
धन्यवाद ज्ञापन
आभार है,
यह प्रणाली
लाइक को नमस्कार है।
धीरेन्द्र सिंह
10.57
08.03.2026
तलहटी से उभरते झोंके उठे हैं
यादें सोई थीं कुछ छूटे उठे हैं
टिमटिमाती आंखों के प्रकाश पुंज
अवलोकन पर दृश्य सब है धुंध
भावनाओं के पथ जगे अनूठे हैं
यादें सोई थीं कुछ छूटे उठे हैं
अब न कसमसाहट ना बेचैनी
निरख मिले राहत हथौड़ी छैनी
शिल्पकार असफल पड़े टूटे हैं
यादें सोई थीं कुछ छूटे उठे हैं
तलहटी व्यक्तिगत आंतरिक श्रृंगार
यहीं से रुनझुन यही से उठे हुंकार
अपनी पगुराहट संग टूटे खूंटे है
यादें सोई थी कुछ छूटे उठे हैं।
धीरेन्द्र सिंह
14.11
07.03.2026
खुद को तलाशिए बिखरे हुए हैं सब
सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब
एक उम्र सबकी है अनुभव लिए हुए
कुछ चिंतित कुछ कहें क्या वह जिए
सबका कहीं अधूरा सा जीवन सबब
सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब
विपरीत जिंदगी को भी पड़ता है जीना
कहीं कौड़िया मिले कहीं रंगीन नगीना
हर एक का अंदाज़ हर एक का अदब
सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब
कहे आत्मा तो मानिए कि निखर गए
जानेगा कैसे कौन कि क्यों बिखर गए
जीवन को पढ़ते-पड़ते मिले अर्थ गजब
सुध ना बिसारिए निखरे हुए हैं जब।
धीरेन्द्र सिंह
06.03.2026
22.34
आरक्षण, आरक्षण
जिसकी चर्चा प्रतिपल-प्रतिक्षण
सुरक्षित कुछ इसमें
कुछ कर रहे आक्रमण
आरक्षण -आरक्षण
संविधान ने बोली बोली
पहुंची ऊपर सर्वहारा टोली
यह भी प्रगति दौर रहा
अब आर्थिक पिछड़े, बोली गोली
करवट रहा बदल कण-कण
कर्म-धर्म-सत्कर्म कहते अपनी बात
विशिष्ट स्थान संग हो विशेष पहचान
यह कैसा बिहान का प्रण
अपना-अपना सबका रण
आरक्षण, आरक्षण
सीमाएं तोड़ रहा आरक्षण
नए पक्ष माँग रहे आरक्षण
क्रिकेट का खेल लोकप्रिय
खिलाड़ी को रखने का प्रण
आरक्षण-आरक्षण।
धीरेन्द्र सिंह
25.02.2026
10.20
चल भी न सकें साथ लेकर बौद्धिक वफादारी
कैसे सींचते हैं आप सुरभित जिंदगी की क्यारी
एक पहल ही तो है सर्जना जगत के सब कार्य
अभिव्यक्ति सत्य है तो भाषा में ना हो दुश्वारी
हिंदी की प्रस्तुतियों में अंग्रेजी में प्रतिक्रियाएं
अंग्रेजी मोह नहीं तो क्या है हिंदी मोह खुमारी
बौद्धिकता के दो चेहरे भाषा में जो अस्पष्टता
हिंदी क्षरण पर चुप रहना गूंगों की तरफदारी
हिंदी के पोस्ट पर अंग्रेजी में थैंक यू लिखना
हिंदी का अपमान इस जीवंतता की है शुमारी
चावल में कंकड़ सा लगता है इतर भाषा शब्द
भाषा की शुद्धता भी शिक्षितों की जिम्मेदारी
विद्वान वह है असफल जिनमें भाषा मिश्रित
आश्रित होने पर लुट जाती है जमींदारी
मुझसे जुडना है तो भाषा संचेतना है प्रथम
वरना अकेले ठीक हूँ करते हिंदी की तरफदारी।
धीरेन्द्र सिंह
25.02.2026
05.20
रूठने की क्या अदा है समझ नहीं आए
दिखती हैं पर लिखती नहीं, लिखते जाएं
शब्दों पर हुई चर्चा भाव का हुआ खर्चा
उन्होंने लिख दिया लिखा मैंने भी पर्चा
हिंदी का सिपाही हूँ अंग्रेजी शब्द क्यों आए
दिखती हैं पर लिखती नहीं, लिखते जाएं
लाइक मेरी रचना को करें तो हैं दिखती
टिप्पणी प्रतिक्रिया ना उनकी तेज थपकी
कहती हैं व्यक्ति विशेष पर लिखा क्यों जाए
दिखती हैं पर लिखती नहीं, लिखते जाएं
बोलीं कि सबको लिखती अंग्रेजी में लिखा
हिंदी के साधक को अंग्रेजी में लिखा दिखा
मेरे द्वारा अब अंग्रेजी में भाषा शास्त्र कहा जाए
दिखती हैं पर लिखती नहीं, लिखते जाएं
वह श्रेष्ठ हैं विदुषी हैं करता हूँ उनका सम्मान
चिंतन की प्रक्रिया में स्तब्ध हुआ जो आसमान
आप यह ना पूछें कौन आदि शक्ति है बताएं
दिखती है पर लिखती नहीं, लिखते जाएं।
धीरेन्द्र सिंह
24.02.2026
20.08
चेतना हुई चपल चहक उठा है सवेरा
एक जागरण रचा, शब्द निपुण चितेरा
चित्त बसा चित्र है अभिनव ना विचित्र
भावनाओं की कलियां कल्पना की मित्र
आपका उदय जीवन निर्मल वलय घेरा
एक जागरण रचा, शब्द निपुण चितेरा
शयनपूर्व मेरी रचनाओं पर दे प्रतिक्रियाएं
भोर चहचहाते शब्द कलरव नित जगाएं
आपका सानिध्य सर्जन सूर्य उदय मुंडेरा
एक जागरण रचा, शब्द निपुण चितेरा
प्रदत्त आपका यह अलंकार "निपुण चितेरा"
महत्व मेरे लेखन का आपने जो यूँ उकेरा
तन अपरिचित मन हर्षित चर्चाओं का डेरा
एक जागरण रचा, शब्द निपुण चितेरा।
धीरेन्द्र सिंह
24.02.2026
05.43
क्या खेल है क्रिकेट
जैसे जंगल का आखेट
लग गया तो लग गया
वरना होता निशाना ठेठ
खूब हंगामा हुआ सब ओर
भारत पर चले ना कोई जोर
सब दे गए अपना विकेट भेंट
कारणों को दें अब तर्क लपेट
साउथ अफ्रीका की टीम
है क्रिकेट की हकीम
चमके गेंद-बल्ले समेत
हल चला जैसे खेत
ऊर्जा, रुपया, समय कर व्यर्थ
इतनी करारी हार का क्या अर्थ
सुपर आठ भारतीय टीम लपेट
साउथ अफ्रीका टीम ने दिया फेंट।
धीरेन्द्र सिंह
23.02.2026
08.09
रात्रि के 11 बज रहे हैं
साउथ अफ्रीका से
हार चुका भारत
टी 20 मैच,
इस पराजय में
याद आयी तुम
जो
करती है संघर्ष खुलकर
और
बदल देती है निर्णय,
यह बताओ
तुम भारतीय क्रिकेट में
क्यों नहीं,
क्या जीत वहीं, जहां
बोले बल्ला
अभिषेक शर्मा का प्रयास,
मुग्धित है क्रिकेट अभिषेक पर
जैसे
उन्मुक्त प्रशंसक हूँ तुम्हारा
जानती हो
समर्पित कोशिश ने ही
हार को
जीत में है संवारा;
सुनो
तुम जिस अंदाज में
आ जाती हो
जेहन में मेरे, संभावनाएं घेरे
चली जाओ न
लिए अपनी यही ऊर्जा
भारतीय क्रिकेट टीम में,
तुम अजेय हो
इसीलिए बिना तुम्हें बोले
तुम्हारी कामना करता हूँ,
अविजित असाधारण रहो
यही कोशिश
यही कामना करता हूँ।
धीरेन्द्र सिंह
22.01.2026
23.01
कोई कैसे खिलता है
कलियों से पूछा तो
बागीचा हंस पड़ा,
पुष्प ने कहा
जिसकी दृष्टि में
जो जंच पड़ा,
उलझन में
काफी देर तक
बागीचे में रहा खड़ा,
खिलना क्या
दृष्टि का विषय है
या कि यह कहीं
संतुष्टि का विषय है,
तर्क उलझाए रहा अड़ा,
बागीचा बोल पड़ा
मात्र किताबी ज्ञान
क्या जाने अनुभव घड़ा,
व्यक्ति रहता है खड़ा
बागीचा में
खिलने का उपाय ढूंढते,
कलियां रहती हैं
मंद-मंद मुस्कराती,
पुष्प रहते हैं बिखेरते
सुगंध, रंग अनेक,
व्यक्ति करते रहता है
खिलने का प्रयास।
धीरेन्द्र सिंह
22.02.2026
06.19
भाषा कोंपल उगती नई नई
हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा हुई
21 फरवरी का यह दिन निर्धारण
बहु मातृभाषा आधारित उच्चारण
भाषा भी विपणन की प्रत्याशा हुई
हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा हुई
मातृभूमि से सन्नद्ध रहती मातृभाषा
हिंदी संग सम्बद्ध हैं भारतीय भाषा
वसुधैव कुटुम्बकम लिए आशा नई
हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा हुई
राजभाषा कार्यालयों में रही कराह
राष्ट्रभाषा हिन्दी बोलनेवालों की चाह
मातृभूमि में हिंदी को कई निराशा हुई
हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा हुई
बांग्लादेश की पहल यूनेस्को का स्वीकार
रजत जयंती दिवस बीता ना सुनी हुंकार
बहुभाषा प्रयोग यूनेस्को की अभिलाषा हुई
हिंदी अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा हुई।
धीरेन्द्र सिंह
21.02.2026
09.52
प्रतिरोध में अर्धनग्न हो बोल चली जुबां
अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता में किए क्या युवा
विश्व के विभिन्न दिग्गजों से पूर्ण मंडपम
एक वर्ग युवा का अचानक हुआ नंगनम
देश में आमंत्रित विश्व अतिथियों को छुवा
अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता में किए क्या युवा
वसुधैव कुटुम्बकम है पारम्परिक देश नारा
ए आई ने विश्व संवारने को भारत से पुकारा
टी शर्ट उतारकर युवा देने लगे वादा बद्दुआ
अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता में किए क्या युवा
ए आई में विश्व नेतृत्व की भारत की तैयारी
एक वर्ग के युवा के मंडपम में की दुश्वारी
भारत के कुछ युवा उद्वेलित अविवेकी धुआं
अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता में किए क्या युवा।
धीरेन्द्र सिंह
20.02.2026
20.46
कोरा कागज ही दिल तो रहता है
जब कोई दिलदार मिल जाता है
नई अनुभूतियों के स्पंदन से उभर
नए कोने से नया फूल खिल जाता है
शुरू होती हैं शालीनभरी सूक्तियाँ कई
शब्द, भाषा में भी चमक-दमक आता है
भाव के अर्थ कई निकालता है नित मन
एक अनजाना भी करीब कैसे आता है
प्यार बस एक बार ही होता है अर्धसत्य
तथ्य जीवन के परिणाम नए लाता है
मन अनुरूप मिल जाती अभिव्यक्तियाँ तो
एक गुलाबी सा आवरण सा छा जाता है
हो सायास कुछ प्रयास नई कोशिश भी
तर्ज तब फ़र्ज़ बन खुदगर्ज हो जाता है
अब इसे भाव समझें या कि असभ्यता
खिलता है मन तो दीवाना सा कह जाता है।
धीरेन्द्र सिंह
20.02.2026
06.45
गलगोटिया विश्वविद्यालय का आतिथ्य है
रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है
मौलिकता की हो रही है भूख हड़ताल
नैतिकता की इसमें करे कौन पड़ताल
आवरण आकर्षक लगे क्षद्म व्यक्तित्व है
रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है
भूत-भविष्य नहीं वर्तमान की है बातें
हिंदी वाले समझें आग सा न इसे बांटे
चीन का रोबोट कुत्ता में क्या लालित्य है
रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है
सजता है मंच रहते बैठे कई हिंदी डॉक्टर
उबासी लेती पुस्तकों पर बातें तथ्य हटकर
बजती हैं थकी तालियां ऐसा ही कृतित्व है
रोबोट कुत्ता ऐसा जैसा हिंदी साहित्य है।
धीरेन्द्र सिंह
19.02.2026
08.15
आप मेरे मन में
होती हैं उदित कई बार
जैसे सागर से उभरे
सूर्य लिए ऊर्जा द्वार
तर्क की कसौटियां लुभावनी
भावना तो बयार पावनी
आप भी पुरवैया बयार
सुगंध की लिए कतार
मन में उभरे लिए छटाएं
भाल तक पहुंच गुनगुनाएं
स्पंदित हो जगे सहस्त्रधार
यही है आपके उभरने की कतार
तड़के खुली पलकें था प्रकाश
मन आलोकित सत्य करता तलाश
आप उभरें मन तत्पर करे करार
कल्पनाओं को करे कौन स्वीकार।
धीरेन्द्र सिंह
18.02.2026
04.46
अपने लिए जो रचता हूँ
जुड़ खूब उससे सजता हूँ
लचकती डाल सा मोड़ लेता हूँ
फिर वह रचना छोड़ देता हूँ
नित संपर्कियों को पढ़ता हूँ
उत्कर्ष हो ध्येय लेकर रचता हूँ
भटकते भाव लेकर ओढ़ लेता हूँ
फिर वह रचना छोड़ देता हूँ
प्रतिष्ठा को कनिष्ठा सा समझता हूँ
निष्ठा को समझ ऊर्जा दहकता हूँ
अगन के दहन में दिए जोड़ लेता हूँ
फिर वह रचना छोड़ देता हूँ
न छोडूं तो कैसे जी सकता हूँ
अटक जाऊं धीमी आंच पकता हूँ
निरन्तर नित नया रच दौड़ जाता हूँ
फिर वह रचना छोड़ जाता हूँ।
धीरेन्द्र सिंह
17.02.2026
10.31
अस्वीकार जब तिरस्कार हो
बिन बोले तब धिक्कार हो
मुहँ मोड़ना होता है तभी
जब संचित घड़ा प्रतिकार हो
तत्क्षण का विरोध अस्थाई
रोष संग यह साथ निभाई
अनियंत्रित उठता गुबार हो
जब संचित घड़ा प्रतिकार हो
अपनापन कोई भेद न माने
ऊंच-नीच हो जाय अनजाने
आकर देहरी अस्वीकार हो
जब संचित घड़ा प्रतिकार हो
अर्थ का अनर्थ निकाला जाए
भाव कलुषता डाल भड़काए
जब छूटता लगे अधिकार हो
जब संचित घड़ा प्रतिकार हो।
धीरेन्द्र सिंह
14.02.2026
16.09
कूद-फांद कर निनाद
जाने कौन छुपा मांद
समय बदल रहा क्या
अभय मचल रहा क्या
पिघल रहा अब विषाद
जाने कौन छुपा मांद
शब्द हैं कालिख पुते
भाव घृणा को जपे
असुरा गूंजे है निनाद
जाने कौन छुपा मांद
शब्दभेदी क्या चले बाण
एकलव्य हैं कई निष्णात
तड़पन बने धड़कन संवाद
जाने कौन छुपा मांद।
धीरेन्द्र सिंह
14.01.2026
06.18
जी रहे हैं खुल जीवन जुगत भरी चतुराई में
और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में
अपने दिल की धड़कन की चिंता सबको है
अपने खिल हो जाएं पुलकित निजता वो है
क्या-क्या रहे छुपाते जीवन की तुरपाई में
और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में
यादें रंग-बिरंगी फीके प्रभाव में करें आलोड़न
पीड़ाएं दुबकाए कोने हृदय करे प्रायः प्रभु भंजन
जीवन कितना दिया -लिया पारस्परिक बहुराई में
और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में
क्या समझे कितना समझे जब चिंतन हो उथले
जिसको जितना समझा जीवन वैसे थापे उपले
जीवन जोड़-घटाना कर भरी अकुलाहट रंगराई में
और किसके पास क्या है उम्र की परछाईं में।
धीरेन्द्र सिंह
13.01.2026
14.45
शब्दों की धार पर
कामनाओं की तपन
विचार भी चलें कैसे
धारदार हुई जो अगन
स्वार्थ एकमात्र सिद्धि लगे
चाहतों का हो जतन
विचार भी चलें कैसे
धारदार हुई जो अगन
जिसकी लाठी उसकी भैंस
यह मुहावरा प्रचलित सघन
विचार भी चलें कैसे
धारदार हुई जो अगन
जनचेतना नित घायल होती
मनवेदना कलुषित उपवन
विचार भी चलें कैसे
धारदार हुई जो अगन।
धीरेन्द्र सिंह
09.01.2026
18.21