सोमवार, 2 नवंबर 2026

जानी-जानी

"इस घड़े से लोटा निकाल के"
यह भाव है कितने सवाल के



कई वीडियो में यही बसे बानी
"जानी-जानी पिला दे पानी"
शराब लुप्त घड़ा बवाल के
यह भाव है कितने सवाल के

संगीत शक्ति से शब्द खिलते
गायन बुद्धि से भाव मचलते
द्विअर्थी लेखन विरोध बवाल के
यह भाव है कितने सवाल के

भोजपुरी लेखन का है प्रभाव
टपोरी लेखन का वीडियो निभाव
सब ज़मझें साहित्य रुग्ण हाल के
यह भाव है कितने सवाल के।

धीरेन्द्र सिंह
03.11.2026
11.00

भोर

दृष्टि चाहिए वृष्टि प्यार की चहुंओर
मन की स्थिति ही लाती जीवन भोर



अमावस सी रात व्यक्ति सोच आधारित
पूर्णिमा की आँच शक्ति ओज आपूरित
सब यहीं सबका यहीं पर ओर छोर
मन की स्थिति ही लाती जीवन भोर

चुनौतियों कठिनाईयों से होता घायल
विपरीत हवाओं का होता वही कायल
आत्मबल से दबाता जाता जीवन शोर
मन की स्थिति ही लाती जीवन भोर

ईश्वरीय अंश जीव ईश्वर को खोजता
मानव अमूल्य जन्म परम्परा से नोचता
फल की कामना ना देखे टहनियों के बौर
मन की स्थिति ही लाती जीवन भोर।

धीरेन्द्र सिंह
03.11.2026
04.42

रविवार, 1 नवंबर 2026

चलो न

चलो न प्रकृति द्वार मिल श्रृंगार करेंगे
चेतना के चमन का मिल पुकार करेंगे

एकल नहीं कुछ संभव द्वय का दरकार
युग्म ही जीवन सुगंधमय हो हर द्वार
रंगबिरंगे भावनाओं में चमत्कार करेंगे
चेतना के चमन का मिल पुकार करेंगे

एक ढर्रे पर जीवन जीने के अभ्यस्त
प्रतिदिन वही कार्य कहते सब हैं व्यस्त
निर्धारित राहों का मिल परिष्कार करेंगे
चेतना के चमन का मिल पुकार करेंगे

अनेक पक्ष अमावस्या के प्रभाव से ग्रसित
सुख-सुविधा सभी पर आत्मा कहीं ग्रसित
शुद्ध आत्मा तक पहुंचकर अभिसार करेंगे
चेतना के चमन का मिल पुकार करेंगे।

धीरेन्द्र सिंह
02.11.2026
05.03

शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

मानवता

प्रदर्शन है दर्शन है इसी में ठेलमठेल है
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है



मानवता अति विशिष्ट मानव उपयोगी चीज
नैतिकता गति परिशिष्ट समाज में दिखे खीज
आदर्श और सिद्धांत चर्चा के प्रचलित भेल हैं
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है

मुट्ठीभर लोग हैं जीवन उत्थान के प्रयास में
शेष व्यस्त हैं उभरती विभिन्न अपनी प्यास में
खरीद लो मानवता का हर समय का "सेल" है
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है

नई पीढ़ी रहा सीख सजग भौतिक सुख मूल्य
धर्म-कर्म भी हैं दिखते परलोक भाव अमूल्य
मनुष्यता में भी लगे मनुष्य वर्गीकृत बेमेल हैं
जो चाहत वह मिल जाए इसी का खेल है।

धीरेन्द्र सिंह
01.11.2026
06.22

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

नाच रे तन नाच

 नाच रे तन नाच मन नाच रहा जैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे

जिंदगी उत्सवों की बेचैन प्रणाली है
मन सोच रहा क्या खनकती प्याली है
लिखा गया है जो उसे बाँच रहा कैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे

लेने को लंबित अभी फैसले बहुत हैं
मन क्यों अचंभित सिलसिले बहुत हैं
उम्र की स्लेट पर क्यों हिसाब ऐसे-तैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे

यह तन ही तो है अनुभूतियों का चितेरा
कामनाओं की धुन पर सरगमों का डेरा
मन ऊर्जा अनंत है खुद को जांच रहा कैसे
आँच तेज है खुद को आँक रहा कैसे।

धीरेन्द्र सिंह
31.10.2026
03.57

इतना क्या सोचना

हम भी इस तरह अब बहकने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं



भाव उठते हैं जैसे इत्रदानियाँ सजी हो

धुन सारंगी और तबले में मिल रची हो
खयाल घुंघरुओं सा अब छमकने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं

खुद की दीवानगी के फलसफे हैं निराले
ज़िंदगी गुनगुना रही है चाहत के नए प्याले
पुरवैया सा तन बहे चुप दर्द उभरने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं

यह आवारगी है या जीने का अंदाज नया
कोई बेचारगी है या बंधा नगीना साज बयां
इतना क्या सोचना दिल से जगने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं।

धीरेन्द्र सिंह
30.10.2026
19.43

बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

विचारिए

ध्येय क्या है लिखने का यह भी विचारिए
फिर अनुभवों को अभिव्यक्ति में निखारिए



अकारण कोई भी अक्सर लिखता नहीं है

शब्दों के सुसज्ज़ा संग जो दिखता यही है

लेखन के आदर्श, सिद्धांत को निथारिए
फिर अनुभवों को अभिव्यक्ति में निखारिए

यह सुझाव नहीं शिक्षा नहीं हिंदी की पीड़ा है
लिखना छपना फिर ना दिखना हिंदी क्रीड़ा है
हिंदी भाषा में निराशा है यह कैसे है उच्चारिए
फिर अनुभवों को अभिव्यक्ति में निखारिए

जहां भी लिखते-लिखती हों वहां पर करें गौर 
सभी फलदार वृक्ष वही कोई डाल हो भरे बौर 
लेखन माँजिए शब्द साधिए आप तो स्वीकारिए
फिर अनुभवों को अभिव्यक्ति में निखारिए।

धीरेन्द्र सिंह
28.10.2026
16.44

सोमवार, 26 अक्टूबर 2026

देवी-देवता

जीवन और समाज के प्रति होती सबकी देयता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता



संस्कार के संसार में सुघड़ बनने का निज प्रकार
मन चाहे जिसको देना, दे जाता है जीवन आधार
नहीं वह सोचता कर्म लाभ दे स्वार्थ की उपादेयता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता

आधार किसी को तो कोई होता है परम निराधार
रचा देना सजा देना ही होता है आकर्षक श्रृंगार
कर्म की कर्मठता से समाज बनता देख योग्यता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता

इस भाव में उलझन कहां निर्मल मन से तो सोचिए
एक नहीं कई देवता मिले होंगे भूले हैं तो खोजिए
कह दूं आप देवी-देवता क्या इसमें भी कोई शक्यता
कितना सरल होता है मानव से बन जाना देवता।

धीरेन्द्र सिंह
27.10.2026
10.05

रविवार, 25 अक्टूबर 2026

कैसे चित्रकार हो

लेखन में यदि लय नहीं कैसे शब्दकार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो

यह रचनाकार पर व्यक्तिगत नहीं आक्षेप है
हिंदी लेखन सरस आसक्तिगत हो निक्षेप है
हिंदी पाठक और बढ़ें हिंदी लेखन रसदार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो

प्यार के वर्णन में क्या केवल वासना झंकार
प्यार ऊर्जा आत्मा का जीवन का है श्रृंगार
प्यार सज्जित शब्दों में जीवन भाव बहार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो

प्यार में भी तर्क है दर्शन है जीवन चिंतन है
व्यक्ति त्याग कर अकेली साधना क्या मंथन है
ईश्वर जैसा भव्य दिव्य देहधारी व्यक्ति दुलार हो
भाव रूखे तर्क आधारित कैसे चित्रकार हो।

धीरेन्द्र सिंह
26.10.2026
09.24


फिर ना आई

इल्दीहा दिल दिया बिल भी तो दिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया

खूब बातें दिल मिल बांटे ना कुछ छांटे
हृदय क्या विलय क्या होते क्या हैं नाते
उसका काम उसका नाम भाव हल्दिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया

तब खिला एकबार मिला टूटा सिलसिला
प्रणय रुग्ण भाव लगा गई थी तिलमिला
कर्म अठखेलियाँ नहीं वार्ता भाव बहा दिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया

इल्दीहा शब्द नहीं हृदय वेदना का चिंघाड़
भावना में तैरे बिना तत्क्षण प्यार लगे पहाड़
संवेदना अशिक्षित थी मिलन बिल तक जिया
मिलने ना आई भभके दिल का दिया ।

धीरेन्द्र सिंह
26.10.2026
08.55

शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

जीवन

कामनाएं दौड़ रहीं पर मन तो नियंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है

सपनों के शीर्ष पर भाव सुगंधित पड़े हैं
यथार्थ में संभव नहीं सामाजिक धड़े है 
पर प्रयास आस लिए बढ़ता अनियंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है

स्व को रोका है जीवन की असुविधाओं में
चाह बलवती फिर भी होती विपदाओं में
मन कहता स्वागत है हर भाव निमंत्रित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है

जीवन समझ नहीं आया बस जीवन जीते हैं
विपरीत यदि कुछ होता हंस कहते रीते है 
इतना क्षद्म जीवन में राह लगे निबंधित है
मानव क्या अभिशापित या अभिमंत्रित है।

धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
21.33

चरित्र

चरित्र के चर्चे इतने इसका न कोई चित्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र



कुछ भी न रहा गोपनीय इलेक्ट्रॉनिक गति
सुख भी हो सोचनीय तात्कालिक जो मति
बहलाना-फुसलाना भ्रमित करना छिड़क इत्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र

रामायण, महाभारत के मिलते हैं ऐसे पात्र
युग बांचता इन्हें पर लगे नासमझ सा छात्र
युगों से अपनों से छल सत्यता का नहीं जिक्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र

अपने हैं जो क्रमशः बदलते हैं ढलते जाते हैं
भीतर बना दूरी करीबी भ्रम सजा भरमाते हैं
अपनापन मित्रता भी लगे भेदक लिए फिक्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र।

धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
20.49

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

यौवन

देह दरबार है प्रपंच का अखबार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है



देह सरकार ना बदले रहता यह प्रयास
दिखाते देह का साम्राज्य जिम के खास
कैसे "शो केस" देह क्या बाजार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है

स्वस्थ तन अब है गठित मांसपेशियां
निरोगी कम हैं कटाव की ले युक्तियां
स्वस्थ तनमन तो प्रसन्नता का दरबार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है

दीर्घायु तक अब तो जमा रहता यौवन
रहन-सहन संयमित चयनित हैं भोजन
यौवन पर उम्र का नहीं रहता अख्तियार है
सल्तनत भव्य यौवन की सरकार है।

धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
06.22

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

शब्द भाव - वडापाव

शब्द खींसे निपोर चल रहे ऐसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे



शब्द वड़ा सा चटक होना चाहे
भाव पाव सा नरम होना चाहे
चाह चटनी की धुन रहे कैसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे

नहीं गेहूं का आटा रहता है मैदा
वड़ा में आलू, बेसन तेल कायदा
अल्पाहार सड़क किनारे शब्द ऐसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे

शब्द की ऊष्मा सामान्य हो जाए
वडापाव गरम नहीं तो ना खा पाएं
भाषा सड़कों की लगे चिल्लर पैसे
भाव बस पाव सा लग रहे जैसे।

धीरेन्द्र सिंह
23.10.2026
08.15

ईश्वर

प्यार की आराधना किए नहीं ईश्वरीय भक्ति में निमग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखादेखी में हैं कई मग्न



धर्म भी जलवायु अनुसार है निधारित जीवन शैली
कहीं की परम्परा मीठी लगे कहीं की लगे है कसैली
अपनी-अपनी परंपराओं के ज्ञानी-ध्यानी कई संलग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखदेखी में हैं कई मग्न

बिन भाषा शब्दार्थ समझे नित घंटों करें उसका उवाच
जीवन मनुष्य को तथ्य दर्शाता पर मानते नहीं उसे साँच
लौकिकता में भी ईश्वर परालौकिक कथ्य मिले भग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखदेखी में हैं कई मग्न

आधुनिकता में प्रकृति दूर भौतिकता के लिए हैं गरूर
पूजापाठ जितना अधिक उतने कष्ट जीवन के हों दूर
जीवन ईश्वर प्यार भक्ति है चाह समर्पण से व्यक्ति संलग्न
मानवता में ईश्वर मिला नहीं देखदेखी में हैं कई मग्न।

धीरेन्द्र सिंह
22.10.2026
15.41

बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

उम्र साठ

उम्र 60 से अधिक तनमन में स्वस्थ झंकार
कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार



प्यार गहन गगन है प्यार है गहरा जलधार

बहुत जिंदगी जीनेवाले समझें छल मझधार

पगी कल्पना दुलकी चलना बातें अपरम्पार

कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार


साठ का पाठ लिए अपना अभिनव सा ठाठ

पारदर्शिता इसमें रहती कूड़ा करकट ले छाँट

एक ठहराव पूरा निभाव नहीं कोई अधिकार

कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार


साठा सो पाठा यह सत्य सदियों से चलता है

जीवन शैली उत्तम हुई जिसमें प्यार चहकता है

स्वस्थ शरीर मन स्वस्थ अधीर मांग रहा अभिसार

कैसे रोक सकेगी उम्र ऐसे में छलकता प्यार।


धीरेन्द्र सिंह

21.10.2026

21.31

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

परछाई

दिल को इस तरह याद यूँ आपकी आयी
चिंहुक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं

आप बहुमूल्य हैं हृदय कह रहा है निडर
श्राप किसने दिया बाधित हुई प्रेम डगर
जिंदगी तन्मय पर अचानक कैसे भरमाई
चिहुंक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं

यह टूटे प्रेम का भाव नहीं बाधित प्रवाह
सरपट प्रवाह में उभरे कई परिचित डाह
आप लड़खड़ा समझीं अभिव्यक्ति तुरपाई
चिह्यूंक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं

किसी जीवंत व्यक्तित्व को खुद में समेटना
मस्तिष्क समझ रहा दिल में उठ रही वेदना
आप अन्य में मशगूल कैसे चेतना को निभाई
चिंहुक कर चमक उठीं आप मेरी परछाई

पुरुष हूँ दम्भ सुप्तावस्था में भी लगे प्रखर
आप से पहल ना हो तो त्यजन वह डगर
यादों में जब आप आईं भूल गया ठकुराई
चिहुंक कर चमक उठीं आप मेरी परछाईं।

धीरेन्द्र सिंह
29.10.2026
21.07

सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

दशहरा

मर्यादा में जीवन के त्याग दिए कई धुन श्रावण
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण



ज्ञान, ध्यान, उत्थान के ख्यातिप्राप्य अनुरागी
शिव को अपना सिर अर्पण करनेवाला त्यागी
ऐसे योगी की सत्ता के रुग्ण कर दिए सब चाँवड़
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण

दशहरा त्यौहार है या जीवन शैली का अभिसार
दग्ध परीक्षा तन- मन कौशल का परखे श्रृंगार
घर त्यागा, सत्ता भी, पत्नी छली गई निज प्रांगड़
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण

अब भी समाज में राम सरीखे सीता जैसी दृढ़ता
रामायण सा युद्ध निरंतर हो रही पराजित मूढ़ता
हर मन राम-सीता सा अगन-गगन रघुवंश सा प्रण
राम के कष्ट भूल कहते हैं कि जलता है रावण।

धीरेन्द्र सिंह
20.10.2026
06.07


रविवार, 18 अक्टूबर 2026

दो किनारे

जैसे तैसे उड़ाते पैसे नदी धार है होता

दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता


चलन है मगन होकर गगन प्यार का रंगना
बाबू, सोना जैसे शब्द कहां सजनी व सजना
डुबकियां लगती कभी तिनके सा दिन होता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता

कितनों से किया प्रेम कितने "एक्स" हैं यार
प्यार का बाजारीकरण समावेश कहां है प्यार
धड़कन की तड़पन में चाह श्रृंगार नहीं होता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता

विवाह बंधन और प्यार हो यह है बात पुरानी
प्यार बुखार है चढ़ता-उतरता तन से बेईमानी
मन विकल्प है तलाशता अवसरों को देता न्योता
दो किनारे नहीं मिलते ऐसे प्यार है होता।

धीरेन्द्र सिंह
19.10.2026
05.13

यह कैसा प्रमाणपत्र ?

यह कैसा प्रमाणपत्र ?


प्रमाणपत्र

विद्यार्थियों को 

उनकी योग्यता को

प्रमाणित कर विद्यालय द्वारा

दिया जाता है

पर

कुछ हिंदी समूह भी

प्रमाणपत्र बांट रहे

ना जाने किस योग्यता से

जांच रहे;


कौन हैं 

ऐसे प्रमाणपत्र देनेवाले,

क्या मानक हैं ?

किसी को

कुछ नहीं मालूम

बस

प्रमाणपत्र बंट रहे नियमित,


यह और कुछ नहीं

समूह विशेष का

विपणन है

और समूह के 

कुछ प्रमुख का

स्व-विज्ञापन,

व्यक्ति की

श्रेष्ठता साबित करना

हिंदी जगत का

लाइलाज रोग है,


यदि इस रुग्ण प्रथा को

बंद नहीं किया जा सकता

तो वंचित रखें

मेरी रचनाओं को

प्रमाणपत्र के अनावश्यक बोझ से,

रचना वह होती हैव

जो प्रशंसा, समीक्षा, टिप्पणी की

अभिलाषी तो है पर

किसी भी स्तर के 

प्रमाणपत्र की निर्मोही है।


धीरेन्द्र सिंह

18.10.2026

19.52

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

हौसले

खुरच-खुरच कर दीवारों को नए रंग के लिए
हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए



आदतें नई संवरती हैं यदि होता है प्रजातंत्र

आए दिन मुनादी होती है मिल गया नया मंत्र

एक हंगामा कई तख्तियों का प्रबंध लिए

हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए


दीवारें शक्ति हैं शौर्य है बतौर सिरमौर हैं

खुरचना प्रजातंत्र का कहें परिष्कृत तौर है

हुजूम झूमकर झंकार करे उमंग के लिए

हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए


बदल देंगे चेहरा सभी दीवार के प्रकार का

भोजन में प्रमुख वही ऐसी सोच है अचार का

नई सोच नएं मुद्दे कहां ढूंढे प्रपंच के लिए

हौसले बढ़ते रहे फैसले की तरंग के लिए।


धीरेन्द्र सिंह
17.10.2026
03.13


गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

शस्त्र

शोषक और शोषित
इसी से जग पोषित



मानव का इतिहास
युद्ध, संघर्ष की बात
असत्य है नहीं रोपित
इसी से जग पोषित

कर्म और भाग्य लड़ें
उदाहरण हैं कई पड़े
कर्म रथ होता भूपति
इसी से जग पोषित

शस्त्र ही में शास्त्र है
शास्त्र शस्त्र क्षात्र है
शस्त्र विहीन शोषित
इसी से जग पोषित

कोई भी नहीं निहत्था
भ्रमित करते हैं जत्था
सौम्य रहें लगे रोषित
इसी से जग पोषित।

धीरेन्द्र सिंह
16.10.2026
06.09

बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

हिंदी समूह

परंपरा की सीमाओं में
बंधकर जीनेवाले
जीते जाते हैं जीवन
बंधकर, अनुकरण कर
जहां एक निर्धारित
गति होती है
स्वीकार्य चलन की
सहमति होती है
जहां अविष्कार नहीं होते
परिष्कार होते हैं;

परंपराएं नहीं करतीं प्रयोग
सुयोग से जो प्राप्त
उसीका है योग
परिवर्तन करो तो
बोल पड़ेंगे लोग;

फेसबुक अधिकांश समूह
भेड़चाल चल रहे हैं
उससे मेरा बेहतर समूह
हर हाल कह रहे हैं,
दस-पन्द्रह लिखनेवाले
हर समूह में हैं लिखते
अपना बड़ा सा फोटो लगा
हर समूह यही दिखते;

समूहों की होती मंथर गति
सदस्यों की संख्या दर्शाने की रीति
प्रयोगधर्मिता को नहीं अपनाते
अपनी ताल ठोक-पीटकर
समूह को हांकते हुए चलाते।

धीरेन्द्र सिंह
14.10.2026
17.59



मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

भाषा

 असहमति

अस्वीकरण नहीं होती

और सहमति

स्वीकार्यता नहीं होती

फिर इन शब्दों का

महत्व क्या

जब शब्द की मूल अभिव्यक्ति

ही बाधित हो;


शब्द अनेक हैं जो

अपने मूल अर्थ खो रहे

प्रयोगकर्ता

खिचड़ी भाषा संग सो रहे,

कौन शब्दों की खेत में

भाव की फसलों का

करेगा रखवाली ,

सब भाषा क्षेत्र में

हो रहे सुविधाभोगी;


कसमसाती भावनाओं को

उफनते शब्दों के द्वारा

कह देने की आदत,

मिश्रित शब्द अर्थ को

दे रही है जन्म,

खिचड़ी भाषा का चलन है

बोलचाल में ऐसे है

जैसे तूफानी नदी;


भाषाएं टूट रही हैं

शब्द दरक रहे हैं

अभिव्यक्तियां रुग्ण हो रहीं

और प्रयोगकर्ता

इन सबसे अनभिज्ञ

खिचड़ी भाषा में

भविष्य तलाश रहे हैं।


धीरेन्द्र सिंह

14.10.2026

07.17

सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

गांव में

घने वृक्ष संग सघन पत्तियों की छांव में
जल्दी सोना तड़के उठना होता गांव में



शाम छह बजे अंधियारे का होता साम्राज्य
गतिविधियां धीमी होतीं फिर सन्नाटा विराज्य
युवा विस्थापित हो रहे मुद्रा अर्जन भाव में
जल्दी सोना तड़के उठना होता गांव में

अर्धरात्रि बीते खुल जाती पलकें अलसायी
घड़ी बोलती डेढ़ बजे हैं नींद क्यों उकताई
कितने करवट कितने सिलवट निद्रा निभाव में
जल्दी सोना तड़के उठना होता गांव में 

बिजली का उजियारा है सुप्त परिवेश सारा है
दिन भी खाली-खाली अति मंथर पांव पसारा है
खेत-खलिहान बिक रहे हैं खरीददार उसी ठाँव में
जल्दी सोना तड़के उठना होता गांव में।

धीरेन्द्र सिंह
13.10.2026
04.05

वह पल

आप इतनी मौन हैं कि कई वर्ष पिघल गए
वह पल वहीं रुका है जहां स्पंदन दहल गए



अनियंत्रित हुआ था कौन दोनों नहीं जानते
एक-दूजे पर आरोपों की बंदूक हैं तानते
मति भ्रष्ट थी या की बहकावे में बहल गए
वह पल वहीं रुका है जहां स्पंदन दहल गए

तीसरे नेत्र की ज्वाला का ज्वलंत प्रमाण हैं
बिन बोले एक शब्द अभिव्यक्तिय बाण हैं
एक चुप हजार चुप होकर रंगत बदल गए
वह पल वहीं रुका है जहां स्पंदन दहल गए

आकंठ तक आपका ही कंठ था मुखरित
आलंबन मध्य साथ का ढंग था विसरित
विश्वास है इस दौर में आप अति धवल भए
वह पल वहीं रुका है जहां स्पंदन दहल गए।

धीरेन्द्र सिंह
12.10.2026
14.23

रविवार, 11 अक्टूबर 2026

घायल

लकड़ी के चूल्हे पर बुदबुदाता चावल
भोजन को भांप रहा है कब से घायल



लकड़ियां कम हैं पर अग्नि लपक जारी

बर्तन को छू ले भोजन पकने की तैयारी

चीख रहा और लकड़ी चिल्ला रहा अटल
भोजन को भांप रहा है कब से घायल

हर समय का इसका सधा एक चलन है
हो-हल्ला, हंगामे का इसका भी सदन है
थोड़ी अव्यवस्था से चाहे बनें इसके कायल
भोजन को भांप रहा है कब से घायल

ना तन से ना मन से कहीं पर भी घायल
चावल को गला कर विजय की है पहल
आवाज जोर से आकर्षित जो रहे टहल
भोजन को भांप रहा कब से घायल।

धीरेन्द्र सिंह
13.10.2026
07.54

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

नवरात्रि

आदिशक्ति वंदना देहभक्ति अभिव्यंजना
शौर्य की सृष्टि है युद्ध मात्र विडंबना



नवरात्र के सभी पात्र विश्व के हैं क्षात्र
शक्ति उद्भवन पल्लवन विजय सुपात्र
भक्ति आराधना से गूंज उठे हर अंगना
शौर्य की सृष्टि है युद्ध मात्र विडंबना

मन कुलषित ले भाव, उल्लसित प्रभाव
ऐसे होते कपटी और धूप पिघलती छांव
मर्दन मात्र विकल्प यदि लेशमात्र समझ ना
शौर्य की सृष्टि है युद्ध मात्र विडंबना

व्रत, उपवास, भक्ति मात्र मन की ना शुद्धि
नीतिकौशल, रणकौशल में भी होती वृद्धि
शक्ति जिसकी उच्च आसक्ति की प्रवंचना
शौर्य की सृष्टि है युद्ध मात्र विडंबना।

धीरेन्द्र सिंह
11.10.2026
03.51

बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

धाराएं उन्मत्त हैं

जमीन जिद कर सादगी की है बात कह रही
धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रहीं नदी



व्योम के रंग में परिवर्तन का हो रहा प्रयास

भीड़ यह नई लग रही प्रयोजन हैं कुछ खास

दिन समीक्षक बन रही बोल कैसी रही सदी

धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रही नदी


चप्पुओं का बहुत जोर है जल में भी शोर है

उजाले के समक्ष लौ कहे उसका अंजोर है

असमंजस में किनारा क्यों चर्चित शताब्दी

धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रही नदी


जनभाषा बीच मुखर हो उठी वीडियो भाषा

सबकुछ ढल जाता अनुरूप जैसी हो आशा

क्या सत्य क्या असत्य मच रही है खुदबुदी

धाराएं उन्मत्त हैं खड़ी चुनौती दे रही नदी।

धीरेन्द्र सिंह
10.41
08.10.2026

गोदौलिया

आप आकर गोदौलिया में मुझसे न मिलीं
यह एक बात या राह अदाओं की खिली



गोदौलिया में बेंच पर बैठा आपसे चैट किया
झूमर, बैग वाले के पास हूँ फोटो से बता दिया
वाराणासी में अनुभूतियां झलकती हैं दिली
यह एक बात या राह अदाओं की।खिली

कुछ देर तक चैट में अपना सब बता दिया
विचारों के लेनदेन से जला भाव का दिया
धूप तेज दोपहर में शाम बारिश झूम मिली
यह एक बात या राह अदाओं की खिली

शाम फोटो भेज आपने कहा आप वहीं थीं
व्यक्तिगत मिलना न चाहीं शायद मुझमें कमी
शाम वर्षा झड़ी बीच मेरी पलकें भी थीं गीली
यह एक बात या राह अदाओं की खिली।

धीरेन्द्र सिंह
08.10.2026
09.34

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

यादों में

आप यादों में इस कदर तो आइए
एक चेहरे पर नजर जैसे दौड़ाइए



हर आहट में बेचैनी सी छटपटाहट
कामनाओं में भी होती है घबराहट
स्वप्न बनकर मन को ऐसे भरमाइए
एक चेहरे पर नजर जैसे दौड़ाइए

आप एक याद एक फरियाद युक्त
थाप जीवन की बिन आप उत्सुक
हवा सुगंध मिली जैसे महक जाइए
एक चेहरे पर नजर जैसे दौड़ाइए

कहां भटक गए या मुझे भूल गए
तलवे से हृदय तक शुष्क शूल हुए
इतनी उपेक्षा प्रतीक्षा जैसे न लहराइए
एक चेहरे पर नजर जैसे दौड़ाईए।

धीरेन्द्र सिंह
07.10.2026
06.46



शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

मन

मन मोह के दर्पण का अनुरागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है

अकुलाहट भरी अभिव्यक्तियों की भीड़
कुलबुलाहट धरी आसक्तियाँ का नीड़
कर्म के नियुक्तियों में बड़भागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है

कब चल पड़े अनचीन्ही डगर बौराया
चाहत का चादर में लिए मोहमाया
हर कदम मन का लगे बागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है

मन घूमता है जैसे घूमते हैं ग्रह, नक्षत्र
मन ढूंढिए मिल जाता है भटकते सर्वत्र
मन भी तो चाँद सा निर्मल दागी है
तन, मन की धुन का नियत रागी है।

धीरेन्द्र सिंह
03.10.2026
04.59

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

यश-अपयश


यश-अपयश प्रभु हाँथ सबने पढ़ा है
क्या जीबन में सब कुछ ईश गढ़ा ह

व्यक्ति की आसक्तियाँ लांघती भित्तियां
कौन जाने किस गति में कौनसी नीतियां
अनपढ़ भी यज्ञ लगे लिखा-पढ़ा है
क्या जीवन में सब कुछ ईश गढ़ा है

बर्तन सा बज रहे हैं आजकल के परिवार
नर्तन करते भाव कर न पाते ठीक श्रृंगार
सजना-संवरना कृत्रिम में मानव पड़ा है
क्या जीवन में सब कुछ ईश गढ़ा है

प्रारब्ध और कर्म संग धर्म की आपाधापी
हर राह में इध्वर दिव्यलोक की हो मापी
ईश्वरीय परिवेश सृजन में आलोचना अड़ा है
क्या जीवन में सब कुछ ईश गधा है।

धीरेन्द्र सिंह
02.10.2026
05.42

बुधवार, 30 सितंबर 2026

थपथपाहट

दर्द, कसमसाहट, छटपटाहट मिले आहट
जिंदगी ढूंढती प्यार यार की थपथपाहट



जग क्या है दूसरों के भावनाओं की चाहत
अकेला रहे व्यक्ति तो आसक्ति की गर्माहट
विलय होना क्या मानव मन की है नर्माहट
जिंदगी ढूंढती प्यार यार की थपथपाहट

किसी के होने मात्र से मन होता सुगंधित
क्या ऐसे रिश्ते सहज या होते हैं आयातित
किसी की चाह में होती क्यों है घबराहट
जिंदगी ढूंढती प्यार यार की थपथपाहट

सभी अपने जीवन को चाहें खूब सजाना
पर न आता सबको सही वक्त चाह जताना
मिला न मन भरा मिलन की है बड़बड़ाहट
जिंदगी ढूंढती प्यार यार की थपथपाहट।

धीरेन्द्र सिंह
01.10.2026
07.03


मंगलवार, 29 सितंबर 2026

आप उपवन

आपने कुछ शब्द लिखा भींग गया मन
इतनी सुगंध तरलता भरी आप उपवन



अंदाज आपका कैसे सबसे अलग है लगता
पर्वत से जैसे मद्धम गति बहता हुआ झरना
आप कौन हैं क्या हैं कैसे झंकृत मन आंगन
इतनी सुगंध तरलता भरी आप उपवन

लिखते ही रहतीं आप पोस्ट करते रहती हैं
जंगल में जैसे उन्मुक्त हवा बहते रहती है
भाव झोंके आपके रंग सुंदर करें हैं चमन
इतनी सुगंध तरलता भरी आप उपवन

इस उपवन में मनभाव को मिलता विश्रांति
आप लगन भाव की अधरों की मधुर कांति
एक खयाल आप मेरी कल्पना की दहन
इतनी सुगंध तरलता भरी आप उपवन।

धीरेन्द्र सिंह
30.09.2026
07.22

रविवार, 27 सितंबर 2026

एक तिनका

जलधारा, जीवनधारा
प्रकृति जीव आधारा
संगृहित भाव जगे
सुदूर से कोई पुकारा






भावनाओं की सरणी
कामनाएं जल सकारा
किसका वेग प्रबल है
तट किनारे प्रवाह ललकारा

हे नदी तू सखी
हम दोनों की धारा
दोनों प्रवाहित युगों सदी
मनुष्यता को है संवारा

आज मन विचलित लगे
प्रणय ने है हुंकारा
एक तिनका उनके मन का
सहेज मुझे दे जलधारा।

धीरेन्द्र सिंह
28.09.2026
10.10

उम्र का ढक्कन

प्रणय की लौ पर उम्र का ढक्कन लगा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है



लौ न बुझती उम्र दहकता बहकता बेचैन
पौ न फटती प्रीत की उमड़ते घुमड़ते नैन
कौन बांधा प्रीत सरणी सांस में यौवन बंधा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है

कह रहे उम्र बड़ी पूजा-पाठ भजन की घड़ी
चेतनाएं चुलबुली हो चाहती लगन की अड़ी
प्यार में ईश्वर नहीं क्या भक्ति का दोहन लगा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है

अंकल आंटी, दादा-दादी सुदूर की जैसे घाटी
जीवन हलचल मुक्त हुए सन्यास की है परिपाटी
हृदय उम्र से दूर लपक-लचक धुन अगन मचा है
हृदय ब्रेड सा जला ढेर सा मक्खन लगा है।

धीरेन्द्र सिंह
28.09.2026
07.02

शनिवार, 26 सितंबर 2026

कौन किससे

कौन किससे निबद्ध है कहाँ कैसे आबद्ध है
यह चतुराई का संपर्क है या व्यक्ति प्रारब्ध है



यह मुझे सहयोग दे वह पूर्ण अपना समर्थन

सुविधा लाभ मिला करे होता रहे आवर्तन

आदर्श, सिद्धांत, नैतिकता लगता स्तब्ध है

यह चतुराई का संपर्क है या व्यक्ति प्रारब्ध है


अधिकांश पढ़ते रहते अपने धर्म की पुस्तक

सारांश तक झलके नहीं कामनाओं की दस्तक

धर्म भाव सब एक कहें इसपर चर्चा निःशब्द है

यह चतुराई का संपर्क है या व्यक्ति प्रारब्ध है


विपक्ष, विरोध हंगामे का प्रयोग सब उपद्रव

भौतिकता की चमक-दमक फिर भी पराभव

अंतर्मन की ज्योति बुझ रही गुट लयबद्ध है

यह चतुराई का संपर्क है या व्यक्ति प्रारब्ध है।


धीरेन्द्र सिंह

27.09.2026

08.25

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

मनुष्य

रोपता नहीं हूँ बल्कि छींटता हूँ
ढकेलता नहीं बल्कि खींचता हूँ
पल्लवन संभावना जहां भी दिखे
मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ






मनुष्य हूँ प्रबुद्ध हूँ संयुक्त हूँ

आत्मा अजर अमर से युक्त हूँ

चुनौतियां मिले आंख न मींचता हूँ

मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ


प्यार ले शुमार हूँ एक खुमार हूँ

व्यक्ति-व्यक्ति गढ़ सकूं कुम्हार हूँ

मनुष्यता का ना कोई रिक्तता हूँ

मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ


व्यक्ति का अस्तित्व हूँ नियुक्ति हूँ

मनुष्य हूँ मानवता की आसक्ति हूँ

मैं, तुम, यह, वह विलग कर उन्मुक्तता हूँ

मनोयोग से उन्मुक्त सींचता हूँ।


धीरेन्द्र सिंह

26.09.2026

08.18
 

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

कौन छूटा

कौन टूटा, कौन रूठा जग की यह बात है
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है



साथ चलता कौन है यह लोकप्रिय भ्रम है
भीड़ हो या नाते-रिश्ते पसरे बहुत वहम हैं
कौन  छूछा, कौन भूखा सदियों के हालात हैं
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है

चल रहे अकेले अनुभूति कहे सब साथ हैं
लक्ष्य भिन्न-भिन्न हैं लगे एकलाक्षीय बारात है
कौन लूटा, कौन झूठा जग में यही चर्चा नाद है
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है

विश्व यह माया है सबसे झूठी यह काया है
स्वार्थ जहां थम गया ठौर वही मन भाया है
कौन अनूठा, कौन अटूटा चलता यही विवाद है
कौन छूटा, कौन ठूँठा हद तोड़ने की बात है।

धीरेन्द्र सिंह
25.09.2026
05.30

बुधवार, 23 सितंबर 2026

यह कैसे रचनाकार

 समूह में
जब कभी भी
पढ़ता हूँ
प्रकाशित पुस्तक की
कोई रचना 
या कोई अंश
दया आती है रचनाकार पर
शेष नहीं रहा लेखन अंश,











बुरा लग गया ?
क्यों रचनाकार जी
समूह क्या 
शीत भंडार गृह है
जहां वर्षों पहले रचित को
भंडारण के लिए डाला जाता है
या कि रचनाकार जी
नया मौलिक लेखन से भी नाता है ?












रचनाकार हैं, कल्पनाशील हैं
फिर अपनी रचना का
बने क्यों वकील हैं ?
चिपका देते हैं पुरानी रचना
समूह का उद्देश्य नहीं सामान्य
रचे विगत साहित्य का ढकना,
क्या चूक गए हो रचनाकार
भूतकाल की रचना विज्ञापन
करतेअनचीन्ही झंकार,













समूह में
जब कभी भी
पढ़ता हूँ पूर्व प्रकाशित रचना
रचनाकार का प्रचार-प्रसार लगे
जिसकी सूख गई है कल्पना
बीते कल लिए आज में सजना।









धीरेन्द्र सिंह

23.09.2026

13.21
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मंगलवार, 22 सितंबर 2026

यह भारत है

बहुबोली, बहुभाषाएँ संग हैं नव आशाएं

धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए


धर्म संकुचित करने पर कुछ लोग आमादा
भाषा जिसमें उभर रही है ओढ़े भाव लबादा
राष्ट्रीयता के ओर-छोर पर तिरंगा है लहराए
धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए

प्रजातंत्र है मौलिक अधिकारों की आजादी
यह क्या भाषा-धर्म की इतनी प्रखर मुनादी
मानवता का सेतु सुहाना ऐसे कैसे बनाएं
धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए

सर्वभाव, सर्वधर्म, सर्वभाषा के हैं अनुरागी
यह भारत है हिलमिल, झिलमिल का रागी
कुछ हंगामे, कुछ हलचल को मुद्दा ना बनाएं
धर्म प्रमुख बना दावेदार देश क्या बताए।

धीरेन्द्र सिंह
23.09.2026
06.04


सोमवार, 21 सितंबर 2026

आपके नाते

मजबूर कर रही हैं आपकी बातें
दिल झुक रहा है आपके नाते



हर पोस्ट आपकी भावना दर्शाती

क्या सोचती जाएं आप है बतलाती

कुछ कल्पना आपकी कुछ बीती बातें

दिल झुक रहा है आपके नाते


मन महक उठता है बहक उगता है

भावनाओं की भूख में चहक चुगता है

आप उभर उठती हैं संभावना बांधे

दिल झुक रहा है आपके नाते

आप क्या हैं किसकी हैं फर्क नहीं
जीवंत हृदय स्वामिनी हैं तर्क नहीं
बस आकर्षण आपका दिल मेरा साधे
दिल झुक रहा है आपके नाते।

धीरेन्द्र सिंह
22.09.2026
03.59

रविवार, 20 सितंबर 2026

लौटा दिया

मुझे ना बुलाती मुझे ना सुनाती
है दुनिया में अपने दुनिया सजाती
है गुस्सा बहुत देखना नहीं चाहे
लगन है यह मेरी मुझी से छुपाती






बहुत था जतन थे बहुत से भी वादे
गगन में सहन था बादल थी सजाती
थे हतप्रभ निरख सज्जा सब विहंगम
धुन अपने में थी बढ़ती मुझको छुपाती

दरवाजे से मुझको लौटा दिया था
पहले देहरी मेरे आगमन पर थी सजाती
क्यों आए चले जाओ बोल थी खड़ी
क्षद्म नाराजगी में वेदना को।छुपाती

कई वर्ष बीते यादों से हैं ना रीते
जिंदगी भी है जिंदगी को सजाती
कुछ ना टूटा ना छूटा स्पंदन वही है
धड़कन अक्सर है अब तड़पन छुपाती।

धीरेन्द्र सिंह
21.09.2026
08.21

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

ऑनलाइन प्यार

भावनाएं उभरती हैं अभिव्यक्तियां अपरम्पार
श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार



गुण कोई होता है कर लेता सहज आकर्षित

हर भाव, सुगम भाव चाहने को रहता व्यथित

मिल जाता कोई अनुकूल, उठता भाव गुबार

श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार


मोबाइल के स्क्रीन पर हर बात लगे रसभीनी

शब्दों के फुहार में मिले सुगंध प्रीति नव चिन्ही

हृदय धड़कता विनय से कहता मीठा लगे दुलार

श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार


जब चाहें तब चाह उकेरे दिन हो या रात, सबेरे

अभिलाषाएं अनंत हैं क्यों बंदिश में खुद को घेरें

दूरी चाहे कितनी हो मजबूरी का ना रहे बुखार

श्रृंगार बरसता है जब हो जाता ऑनलाइन प्यार।


धीरेन्द्र सिंह

19.09.2026
06.59