सोमवार, 24 अगस्त 2026

रिश्ते

कुछ छूट गया खुद से कुछ छूट रहा है
जोड़ने को जीवन कोशिश में टूट रहा है
एक व्यक्ति नहीं व्यक्ति रिश्तों का झुंड है
छूटता हृदय नयन से अपनत्व ढूंढ रहा है






कमियां तो सब में है नर्मियों की है जरूरत
शब्दों में नमी जोर हो निभाव घुट रहा है
अहं के शंख से युद्ध की ही निकले ललकार
तर्कों से कब चला जीवन लगे उठ रहा है

मनभाव में अलाव प्रतियोगिता तो जलन भी
श्रेष्ठता की अंधी दौड़ में यथार्थ ऊंघ रहा है
शिक्षा की डिग्रियां जितनी ऊंचा तो उठे व्यक्ति
स्वार्थ की परिधि में घिरा गड़ा खूँट रहा है

कौन गलत कौन सही समझना नहीं आसान
दो में से एक सुविज्ञ जो मौन ठूंठ रहा है
सहने की हो क्षमता तो जीवन सौम्य, सुंदर है
लड़ने की गति में रिश्ता जीवन लूट रहा है।

धीरेन्द्र सिंह
25.08.2026
06.51



रविवार, 23 अगस्त 2026

गीत

गीत ही है जिंदगी गीत ही आधार है
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है



हौसले के फैसले चुनौतियों के वलबले
मीत के गीत उपलब्धियों के सिलसिले
प्रीति की प्रतीति ही बिहँसता संसार है
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है

मन स्पंदित श्वास सुगंधित परिवेश तरंगित
अर्चना की सर्जना में विलगाव है प्रतिबंधित
तार मन के जुड़ गए तो स्वर नए उपहार हैं
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है

कामनाएं घास सी उगती हैं मरती हर दिन
क्या बताएं चाह सजती हैं बिखरती छिन-छिन
एक तृष्णा एक बेचैनी गुप्त निज मनधार है
मीत ही है बंदगी मीत ही जग प्यार है।

धीरेन्द्र सिंह
24.08.2026
07.57