शनिवार, 18 जुलाई 2026

आत्मिक संघर्ष

पकड़ना चाहते इतना पर कितना छूटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है




प्यार के हिलोरे हैं अनुराग के बेचैन किनारे
वह अपना है तो अनवरत अपने को दुलारें
जिंदगी उपद्रव भी लगे और समय लूटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है

बादलों सा उड़ता नभ से जुड़ता चित्त चंचल
कभी बाहों का घेरा तो कभी उड़ता आँचल
विचारों में बंधा जीवन अपने में ही घुटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है

धधकती आग भीतर पर मंद होता प्रकाश है
वृष्टि की चर्चे बहुत हैं पर दिखती नई प्यास है
तन की कहें मन की सुने व्यक्ति इसमें लुटता है
मुस्कराता तन खड़ा पर मन कितना टूटता है।

धीरेन्द्र सिंह
19.07.2026
16.42

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें