रिश्तों की डोर में न मिलता ओर-छोर
भोर जिंदगी का बंदगी करे भी तो क्या
सूर्य किरणें जगाती सजाती हैं निसदिन
पक्षियों की चहचआहट लगे क्या नया
संवेदनाएं सिमट रहीं चिमटी से उगें भाव
कामनाएं टिड्डी दल मन के फसल का क्या
प्रतियोगिता में स्वार्थ का समय-समय हवन
धुआं उठता बहुत घनेरा हवा का इसमें क्या
इंटरनेट से ही प्रायः अपनों से होती भेंट
दरवाजे पर दें दस्तक द्वार खुल रहा क्या
दो-तीन दिन ठहर लिए तो वर्ष भर छुट्टी
बर्तन को कोई साझा अब कर रहा है क्या
यह प्रवाह है समय का जय-जय तो कीजिए
एक उम्र चुकाने का समय रह गया ही क्या
ढल जाना समय संग जैसे उड़ती चले पतंग
रुख मोड़ने की जिद में कुछ मिल सका है क्या।
धीरेन्द्र सिंह
25.07.2026
08.16
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें