मंगलवार, 28 जुलाई 2026

आज

तथ्य कह रहा है कि सत्य नाराज है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है



सच में बदल रहा या हवा का है बदलाव
टहनियों को रहे काट दौड़-भाग रहा छांव
परिवर्तन की लहर है या परितृप्त साज है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है

कितना जटिल है जो है को बदल देना
फट जाता कहीं दूध बना लेते हैं छेना
युक्तियों की सूक्तियाँ भी लाजवाब हैं
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है

सघन को सहन का वहन करना ही होगा
दहन की तपन में यूँ ना कहीं जलना होगा
समझिए न मनुष्य का प्रखर कितना ताप है
कल तक था नहीं हो रहा जो आज है।

धीरेन्द्र सिंह
28.07.2026
21.15

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