कुछ छूट गया खुद से कुछ छूट रहा है
जोड़ने को जीवन कोशिश में टूट रहा है
एक व्यक्ति नहीं व्यक्ति रिश्तों का झुंड है
छूटता हृदय नयन से अपनत्व ढूंढ रहा है
कमियां तो सब में है नर्मियों की है जरूरत
शब्दों में नमी जोर हो निभाव घुट रहा है
अहं के शंख से युद्ध की ही निकले ललकार
तर्कों से कब चला जीवन लगे उठ रहा है
मनभाव में अलाव प्रतियोगिता तो जलन भी
श्रेष्ठता की अंधी दौड़ में यथार्थ ऊंघ रहा है
शिक्षा की डिग्रियां जितनी ऊंचा तो उठे व्यक्ति
स्वार्थ की परिधि में घिरा गड़ा खूँट रहा है
कौन गलत कौन सही समझना नहीं आसान
दो में से एक सुविज्ञ जो मौन ठूंठ रहा है
सहने की हो क्षमता तो जीवन सौम्य, सुंदर है
लड़ने की गति में रिश्ता जीवन लूट रहा है।
धीरेन्द्र सिंह
25.08.2026
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