उलझन
अपने विश्व की उलझन में दगा दे देना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना
कश्तियाँ दोनों की मगन साथ-साथ थीं
हस्तियां अपनी भी सबरंग बेहिसाब थीं
कुतर दिया समाज ने जुड़ाव दे पैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना
अपने विश्व में भी हैं आधे-अधूरे व्यक्तित्व
अपने को देखे या सहेजे तीरे अस्तित्व
टपक रहे हैं भाव पर मुस्कराहट के छैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना
क्षद्म व्यवहार रूप भी तो लगे बहुरूपिया
महल की बात करे जीर्ण हो रही कुटिया
प्यार अवसर है स्नेह सुप्त ताल की मैना
कितना आसान है अपने को सजा दे देना।
धीरेन्द्र सिंह
26.04.2026
10.24
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