भावनाओं के पुष्पों से, हर मन है सिजता
अभिव्यक्ति की डोर पर, हर मन है निजता
शब्दों की अमराई में, भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई में,एक तड़पन है निज़ता।
भावनाओं के पुष्पों से, हर मन है सिजता
अभिव्यक्ति की डोर पर, हर मन है निजता
शब्दों की अमराई में, भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई में,एक तड़पन है निज़ता।
Nijatata काव्य
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शनिवार, 25 अप्रैल 2026
उलझन
अपने विश्व की उलझन में दगा दे देना कितना आसान है अपने को सजा दे देना
कश्तियाँ दोनों की मगन साथ-साथ थीं हस्तियां अपनी भी सबरंग बेहिसाब थीं कुतर दिया समाज ने जुड़ाव दे पैना कितना आसान है अपने को सजा दे देना
अपने विश्व में भी हैं आधे-अधूरे व्यक्तित्व अपने को देखे या सहेजे तीरे अस्तित्व टपक रहे हैं भाव पर मुस्कराहट के छैना कितना आसान है अपने को सजा दे देना
क्षद्म व्यवहार रूप भी तो लगे बहुरूपिया महल की बात करे जीर्ण हो रही कुटिया प्यार अवसर है स्नेह सुप्त ताल की मैना कितना आसान है अपने को सजा दे देना।
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