गुरुवार, 25 जून 2026

नाते तोड़ गयी

वह मुझे छोड़ गई और नाते तोड़ गयी
यह टूटन है क्या, नहीं विश्वास होता है
जीवन है जागृत है, उसपर आश्रित है
कुछ न बोली चल दी कहीं ऐसा होता है






हृदय में हाहाकार कैसा मृदुल अत्याचार
दर्द है, दुख है पर संभावना को न्योता है
मन ने किया समर्पण दिखला दी दर्पण
कुछ न बोली चल दी ऐसा कहीं होता है

वह मेरी भोर थी और महकती साँझ थी
आंच जिंदगी पर चलाई तेज सरौता है
घाव है दर्द है हमदर्द मन पर नहीं रोता है
कुछ न बोली चल दी कहीं ऐसा होता है

उससा जग में कही मिलटी न कोई दूजी 
सूझी क्या उसको टूटन ही मात्र मौका है
जितना मुझे सँवारी उससे न बढ़ सक कभी
कुछ न बोली चल दी ऐसा कहीं होता है।

धीरेन्द्र सिंह
26.06.2026
08.06


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें