भावनाएं जग रही हैं अपनी ताल में
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में
व्यक्ति है अकेला या घिरा है समाज से
बस द्वंद्व लगे जीवन सामाजिक अंदाज से
परवश जी रहा है घिरा सामाजिक हाल में
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में
कड़ियाँ की कई लड़ियाँ लगती हैं बढियां
यहां यह वहां वह संबंधों की है फुलझड़ियाँ
आतिशबाजी यदाकदा होती मन चौपाल में
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में
धरती पर बसा है और गगन की चाह है
रिमझिम हैं फुहारें पर अगन की आह है
आंखें समाज की जैसे तांत्रिक कपाल मैं
समाज चितेरा है लगा अपनी चाल में।
धीरेन्द्र सिंह
13.08.2026
10.08
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