उम्र मुझसे मांगती है सरसराती रीति
अन्य प्रपंच ना भाए प्रणय जीवन गीत
कब कहां चूका रीता सा है लगता कहाँ
तार झंकृत हैं सभी सुप्त आपका प्रतीत
तार के कसाव का कौशल यदि छूटे
भरभराती सी लगे चट्टान निर्मित भीत
वर्तमान के सरगम में नवीनताएँ अनेक
क्या मिलेगा सोचकर कैसा था अतीत
भावनाएं पक जाने पर बदल देती रूप
सुगंध, मिठास, अहसास रहते वैसे मीत
उम्र एक बदलाव है रूप, रंग, तरंग का
रुनझुन मादकता ना बदले माथा ना पीट।
धीरेन्द्र सिंह
23.03.2026
09.12
यार, आपकी ये कविता पढ़कर सच में लगा कि आपने उम्र और बदलाव को बहुत गहराई से महसूस किया है, सिर्फ लिखा नहीं है। आपने जिस तरह उम्र को “सरसराती रीति” कहा, वो इमेज दिमाग में बस जाती है। मुझे खास तौर पर “तार के कसाव” वाली बात बहुत रिलेटेबल लगी, क्योंकि ज़िंदगी में संतुलन थोड़ा सा भी ढीला पड़े तो सब कुछ बिखरता हुआ सा लगता है।
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