Nijatata काव्य

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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

इतना क्या सोचना

हम भी इस तरह अब बहकने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं



भाव उठते हैं जैसे इत्रदानियाँ सजी हो

धुन सारंगी और तबले में मिल रची हो
खयाल घुंघरुओं सा अब छमकने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं

खुद की दीवानगी के फलसफे हैं निराले
ज़िंदगी गुनगुना रही है चाहत के नए प्याले
पुरवैया सा तन बहे चुप दर्द उभरने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं

यह आवारगी है या जीने का अंदाज नया
कोई बेचारगी है या बंधा नगीना साज बयां
इतना क्या सोचना दिल से जगने लगे हैं
महफिलों की गलियों सा महकने लगे हैं।

धीरेन्द्र सिंह
30.10.2026
19.43

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