Nijatata काव्य

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शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

चरित्र

चरित्र के चर्चे इतने इसका न कोई चित्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र



कुछ भी न रहा गोपनीय इलेक्ट्रॉनिक गति
सुख भी हो सोचनीय तात्कालिक जो मति
बहलाना-फुसलाना भ्रमित करना छिड़क इत्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र

रामायण, महाभारत के मिलते हैं ऐसे पात्र
युग बांचता इन्हें पर लगे नासमझ सा छात्र
युगों से अपनों से छल सत्यता का नहीं जिक्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र

अपने हैं जो क्रमशः बदलते हैं ढलते जाते हैं
भीतर बना दूरी करीबी भ्रम सजा भरमाते हैं
अपनापन मित्रता भी लगे भेदक लिए फिक्र
कब चरित्र हनन हो समझते हैं सब मित्र।

धीरेन्द्र सिंह
24.10.2026
20.49

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