Nijatata काव्य

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सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

वह पल

आप इतनी मौन हैं कि कई वर्ष पिघल गए
वह पल वहीं रुका है जहां स्पंदन दहल गए



अनियंत्रित हुआ था कौन दोनों नहीं जानते
एक-दूजे पर आरोपों की बंदूक हैं तानते
मति भ्रष्ट थी या की बहकावे में बहल गए
वह पल वहीं रुका है जहां स्पंदन दहल गए

तीसरे नेत्र की ज्वाला का ज्वलंत प्रमाण हैं
बिन बोले एक शब्द अभिव्यक्तिय बाण हैं
एक चुप हजार चुप होकर रंगत बदल गए
वह पल वहीं रुका है जहां स्पंदन दहल गए

आकंठ तक आपका ही कंठ था मुखरित
आलंबन मध्य साथ का ढंग था विसरित
विश्वास है इस दौर में आप अति धवल भए
वह पल वहीं रुका है जहां स्पंदन दहल गए।

धीरेन्द्र सिंह
12.10.2026
14.23

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