भावनाओं के पुष्पों से, हर मन है सिजता
अभिव्यक्ति की डोर पर, हर मन है निजता
शब्दों की अमराई में, भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई में,एक तड़पन है निज़ता।
भावनाओं के पुष्पों से, हर मन है सिजता
अभिव्यक्ति की डोर पर, हर मन है निजता
शब्दों की अमराई में, भावों की तरूणाई है
दिल की लिखी रूबाई में,एक तड़पन है निज़ता।
Nijatata काव्य
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बुधवार, 23 सितंबर 2026
यह कैसे रचनाकार
समूह में जब कभी भी पढ़ता हूँ प्रकाशित पुस्तक की कोई रचना या कोई अंश दया आती है रचनाकार पर शेष नहीं रहा लेखन अंश,
बुरा लग गया ? क्यों रचनाकार जी समूह क्या शीत भंडार गृह है जहां वर्षों पहले रचित को भंडारण के लिए डाला जाता है या कि रचनाकार जी नया मौलिक लेखन से भी नाता है ?
रचनाकार हैं, कल्पनाशील हैं फिर अपनी रचना का बने क्यों वकील हैं ? चिपका देते हैं पुरानी रचना समूह का उद्देश्य नहीं सामान्य रचे विगत साहित्य का ढकना, क्या चूक गए हो रचनाकार भूतकाल की रचना विज्ञापन करतेअनचीन्ही झंकार,
समूह में जब कभी भी पढ़ता हूँ पूर्व प्रकाशित रचना रचनाकार का प्रचार-प्रसार लगे जिसकी सूख गई है कल्पना बीते कल लिए आज में सजना।
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