किस समाज की यह अवहेलना है
समाज से समाज को क्यों खेलना है
तख्तियों पर लिख गए हैं भाव कई
विचार से विचारों को लगे ठेलना है
धूप तपती दहकती बह रही है कहीं
चाँदनी का धर्म क्या हरदम बहकना है
व्यक्ति के लिए व्यक्ति ही है जरूरी भी
व्यक्तित्व रहे बना रंग अपना दमकना है
समाज ही साम्राज्य समाज ही विवाद
समाज की तरह जीवन को बेलना है
अवहेलना की कीमत चुकाते कई वर्ग
जो बढ़ चुके हैं आगे उन्हें क्या कहना है
तख्तियों का दौर है यही एक तौर है
बतौर शोर के यही सब तो करना है
युक्तियों की नियुक्तियों में कूटनीति है
नीति के रीति से कई भीत को ढहना है।
धीरेन्द्र सिंह
10.08.2026
09.03
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