Nijatata काव्य

मंगलवार, 28 जुलाई 2026

कहाँ हो

तुम मुझसे ख़फ़ा होकर दगा दे गई
मंज़िल का ना पता क्या सदा दे गई

गूंज है अनुगूंज है दूरस्थ की सूझ है
पुंज भावनाओं का परिणाम अबूझ है
नाराजगी भी ऐसी कैसी अदा दे गई
मंजिल का ना पता क्या सदा दे गई

पलकों में नमी है तुम्हारी ही कमी है
अलकों में सितारों की महफ़िल जमी है
अनुभूतियां आसक्ति की वफ़ा दे गई
मंजिल का ना पता क्या सदा दे गई

कुछ कहती कुछ सताती हैं यह सदाएं
तुम कहाँ हो कैसे दिल का हाल बताएं
जीवन के राग बीच धुन धता दे गई
मंजिल का ना पता क्या सदा दे गई।

धीरेन्द्र सिंह
29.07.2026
06.49

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